19वीं सदी के उत्तरार्ध में दुनिया ने एक ऐसी भीषण प्राकृतिक आपदा का सामना किया, जिसके बारे में अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। वर्ष 1876 से 1878 के बीच आए वैश्विक अकाल ने एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कई हिस्सों में भारी तबाही मचाई।
नई दिल्ली: दुनिया के मौसम वैज्ञानिकों की नजर एक बार फिर प्रशांत महासागर में विकसित हो रही जलवायु घटना अल नीनो (El Niño) पर टिकी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्राकृतिक मौसमी चक्र आने वाले महीनों में भारत सहित एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों के मौसम को प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो मानसून की तीव्रता को कमजोर कर सकता है, जिससे कृषि, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, जुलाई से सितंबर के बीच अल नीनो का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दे सकता है। यही वह समय होता है जब भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने चरम पर रहता है और देश की अधिकांश कृषि गतिविधियां वर्षा पर निर्भर होती हैं।
क्या है अल नीनो?
अल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जो मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने पर विकसित होती है। सामान्य परिस्थितियों में समुद्र के ऊपर चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की ओर धकेलती हैं, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं तो गर्म पानी पूर्वी हिस्से में फैलने लगता है।
समुद्र के तापमान में यह बदलाव वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है, जिसका असर दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा और तापमान के पैटर्न पर पड़ता है। भारत में इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव मानसून की बारिश पर देखा जाता है।
भारत के मानसून पर क्या होगा असर?
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो के दौरान भारतीय मानसून सामान्य से कमजोर हो सकता है। शुरुआती संकेत बताते हैं कि कई क्षेत्रों में वर्षा सामान्य स्तर से कम दर्ज की गई है और यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो जुलाई, अगस्त और सितंबर में बारिश की मात्रा प्रभावित हो सकती है। कम वर्षा का सीधा असर जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, पेयजल आपूर्ति और सिंचाई की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि केवल अल नीनो ही मानसून का निर्धारण नहीं करता। हिंद महासागर की अन्य मौसमी प्रणालियां, विशेष रूप से इंडियन ओशन डाइपोल (IOD), इसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकती हैं।
कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती
भारत की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। खरीफ सीजन के दौरान धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई मानसूनी वर्षा पर आधारित होती है। यदि बारिश सामान्य से कम रहती है, तो फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से वे क्षेत्र जहां सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं, वहां किसानों को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में वर्षा आधारित खेती अधिक होने के कारण इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
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इतिहास से मिलने वाली सीख
अल नीनो कोई नई घटना नहीं है। इतिहास में कई बार इसने वैश्विक मौसम को प्रभावित किया है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में आए एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में गंभीर सूखा और खाद्य संकट की स्थिति उत्पन्न हुई थी। हालांकि, आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों, मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों और बेहतर कृषि प्रबंधन के कारण आज दुनिया पहले की तुलना में ऐसी परिस्थितियों का बेहतर सामना करने में सक्षम है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक घटनाओं से सबक लेकर जल प्रबंधन और कृषि योजना को मजबूत करना आवश्यक है।
अल नीनो की तीव्रता कैसे मापी जाती है?
मौसम वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के एक विशेष क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान को लंबे समय के औसत से तुलना करके अल नीनो की तीव्रता का आकलन करते हैं। सामान्य तौर पर:
- 0.5 से 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को कमजोर अल नीनो माना जाता है।
- 1 से 1.5 डिग्री तक मध्यम।
- 1.5 से 2 डिग्री तक मजबूत।
- 2 डिग्री से अधिक की वृद्धि को बहुत मजबूत या सुपर अल नीनो की श्रेणी में रखा जाता है।
वैज्ञानिक लगातार समुद्री तापमान और वायुमंडलीय गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं ताकि संभावित प्रभावों का बेहतर अनुमान लगाया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो के संभावित प्रभावों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय रहते तैयारी करके नुकसान कम किया जा सकता है।










