लखनऊ के प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्र अमीनाबाद में नकली दवाओं के कारोबार को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। औषधि विभाग (ड्रग विभाग) की जांच में सामने आया कि कुछ दवा कारोबारी रद्द हो चुके लाइसेंस और फर्जी बिक्री बिलों के सहारे दवाओं का कारोबार चला रहे थे। इस गंभीर मामले में अमीनाबाद के पांच कारोबारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग, औषधि प्रशासन और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। जांच एजेंसियां अब पूरे नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि नकली दवाओं का यह कारोबार कितने समय से चल रहा था और इसमें कितने लोग शामिल हैं।
प्रारंभिक जांच के अनुसार आरोपी कारोबारी बंद हो चुकी या रद्द किए गए लाइसेंस का इस्तेमाल कर दवाओं की खरीद-बिक्री दिखा रहे थे। इसके लिए फर्जी इनवॉइस और नकली बिल तैयार किए जाते थे ताकि रिकॉर्ड में सब कुछ वैध दिखाई दे। जबकि वास्तविकता में दवाओं की सप्लाई नियमों के विपरीत की जा रही थी। कई मामलों में बिना वैध दस्तावेजों के दवाएं गोदामों से दुकानों तक पहुंचाई जा रही थीं। अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ दस्तावेजों में गड़बड़ी का मामला नहीं बल्कि लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा गंभीर अपराध है।
औषधि निरीक्षकों ने जब संबंधित दुकानों के स्टॉक रजिस्टर, खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, जीएसटी से जुड़े दस्तावेज, लाइसेंस और बिलों का मिलान किया तो कई बड़ी अनियमितताएं सामने आईं। जांच में पता चला कि जिन लाइसेंसों के आधार पर दवाओं का कारोबार दिखाया जा रहा था, उनमें से कुछ पहले ही निरस्त किए जा चुके थे। इसके बावजूद उन्हीं लाइसेंसों के नंबर का उपयोग कर दवाओं की खरीद और बिक्री का रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा था। अधिकारियों ने इसे सुनियोजित धोखाधड़ी करार दिया है।
जांच टीम का मानना है कि यह किसी एक दुकान तक सीमित मामला नहीं है। आशंका है कि कई कारोबारी मिलकर एक संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहे थे। फर्जी बिलों के जरिए दवाओं की आवाजाही दिखाई जाती थी, जिससे जांच एजेंसियों को गुमराह किया जा सके। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इन दवाओं की सप्लाई किन-किन जिलों और मेडिकल स्टोरों तक की गई। यदि जांच में अन्य जिलों के नाम सामने आते हैं तो वहां भी कार्रवाई की जाएगी।
एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने संबंधित कारोबारियों से जुड़े दस्तावेज, कंप्यूटर रिकॉर्ड, बिल बुक, बैंक लेनदेन और गोदामों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि कहीं इस नेटवर्क में दवा निर्माता कंपनियों, थोक विक्रेताओं या ट्रांसपोर्टरों की भी भूमिका तो नहीं रही। यदि जांच में किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नकली या अमानक दवाएं मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं। ऐसी दवाओं के सेवन से बीमारी ठीक होने के बजाय और गंभीर हो सकती है। कई मामलों में मरीजों की जान तक खतरे में पड़ जाती है। यही कारण है कि औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत ऐसे मामलों में कड़ी सजा और आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है।
औषधि विभाग ने आम लोगों से भी अपील की है कि दवा खरीदते समय हमेशा अधिकृत मेडिकल स्टोर से ही दवा लें और खरीदारी का पक्का बिल जरूर प्राप्त करें। यदि किसी दवा की पैकिंग, कीमत, निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट या गुणवत्ता को लेकर कोई संदेह हो तो इसकी सूचना तुरंत औषधि विभाग या स्थानीय प्रशासन को दें। अधिकारियों का कहना है कि लोगों की सतर्कता से ऐसे अवैध कारोबार पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।
विभाग के अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि आने वाले दिनों में राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश के अन्य जिलों में दवा कारोबारियों के यहां विशेष जांच अभियान चलाया जाएगा। जिन दुकानों पर रिकॉर्ड में गड़बड़ी, बिना लाइसेंस कारोबार या फर्जी बिलों का इस्तेमाल मिलता है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। जरूरत पड़ने पर लाइसेंस निरस्त करने, दुकान सील करने और आपराधिक मुकदमा दर्ज करने जैसी कार्रवाई भी की जाएगी।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर दवा कारोबार में पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय-समय पर रिकॉर्ड का डिजिटल सत्यापन, स्टॉक की नियमित जांच और लाइसेंस की ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जाए तो इस तरह की धोखाधड़ी को काफी हद तक रोका जा सकता है। फिलहाल पुलिस और औषधि विभाग की संयुक्त जांच जारी है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।