Ganga Floodplain: सुप्रीम कोर्ट की बिहार सरकार को सख्त चेतावनी, अतिक्रमण हटाने के लिए आखिरी 8 सप्ताह

Ganga Floodplain मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को पटना में नौजर घाट से नूरपुर घाट तक अतिक्रमण हटाने के लिए आखिरी बार 8 हफ्ते दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को पटना में नौजर घाट से नूरपुर घाट के बीच गंगा के बाढ़ क्षेत्र में बने सभी अवैध ढांचों और अतिक्रमण को हटाने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है।

पटना: गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को एक बार फिर सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने राज्य सरकार को कार्रवाई पूरी करने के लिए आखिरी आठ सप्ताह का समय दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अवधि के बाद भी यदि उसके निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं हुआ, तो बिहार के मुख्य सचिव और संबंधित अधिकारियों को अदालत में बुलाया जा सकता है। साथ ही, आदेश की अवहेलना की स्थिति में अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी भी दी गई है।

मामले की सुनवाई जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ कर रही है। अदालत का यह निर्देश पटना में नौजर घाट से नूरपुर घाट के बीच गंगा के बाढ़ क्षेत्र में मौजूद कथित अवैध ढांचों और स्थायी अतिक्रमण को हटाने से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया आठ सप्ताह का समय?

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 21 जुलाई को बिहार सरकार को छह सप्ताह के भीतर कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। अदालत का उद्देश्य गंगा के बाढ़ क्षेत्र में बने उन ढांचों और अतिक्रमण को हटाना था, जिन्हें पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में अवैध माना जा रहा है। 28 सितंबर को सुनवाई के दौरान बिहार के महाधिवक्ता एस. डी. संजय ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत के निर्देश पर कुछ कार्रवाई की है, लेकिन पूरा अनुपालन अभी नहीं हो सका है।

राज्य सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद गंगा नदी का जलस्तर बढ़ गया था। इसके कारण संबंधित इलाका पानी में डूब गया और अतिक्रमण हटाने का अभियान आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया। हालांकि, अदालत ने इस स्थिति पर असंतोष जताते हुए सरकार को अंतिम अवसर दिया। पीठ ने साफ किया कि अब आठ सप्ताह के बाद कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा।

अधिकारियों को तलब करने की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई के दौरान उसे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की पूरी अनुपालन रिपोर्ट चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि यदि उसके आदेशों का पालन नहीं किया गया तो बिहार के मुख्य सचिव समेत अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए कहा जा सकता है।अदालत की ओर से अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। इसका मतलब है कि अगली सुनवाई तक राज्य सरकार को निर्धारित क्षेत्र में अदालत के निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई पूरी करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

एनजीटी के आदेश से जुड़ा है मामला

यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के जून 2020 के एक आदेश से जुड़ा है। शीर्ष अदालत में दाखिल याचिका में एनजीटी के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील बाढ़ क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण और स्थायी अतिक्रमण के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गंगा के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण और अतिक्रमण को लेकर पर्यावरणीय चिंताओं पर भी ध्यान दिया गया है। बाढ़ क्षेत्र प्राकृतिक रूप से नदी के अतिरिक्त जल के फैलाव और निकासी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में स्थायी निर्माण को लेकर पर्यावरण और बाढ़ प्रबंधन से जुड़े सवाल उठते रहे हैं।

निजी जमीन पर निर्माण का दावा करने वालों को भी निर्देश

सुनवाई के दौरान कुछ लोगों की ओर से हस्तक्षेप याचिकाएं भी दाखिल की गईं। इन याचिकाओं में दावा किया गया कि संबंधित निर्माण उनकी निजी जमीन पर हैं और वे गंगा के बाढ़ क्षेत्र में नहीं आते। पीठ ने ऐसे पक्षकारों को सक्षम प्राधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने की अनुमति दी है। हालांकि, इसके लिए उन्हें जमीन के स्वामित्व से संबंधित दस्तावेज, निर्माण की मंजूरी और अन्य जरूरी अनुमतियां पेश करनी होंगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आवश्यक दस्तावेजों के बिना ऐसे किसी भी दावे पर विचार नहीं किया जाएगा। इससे यह साफ है कि निजी स्वामित्व का दावा करने वाले लोगों को भी अपने निर्माण की वैधता साबित करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड प्रस्तुत करने होंगे।

Leave a comment