गयाजी में चल रहे पितृपक्ष मेले के दौरान शुक्रवार को आस्था और परंपरा का ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने घाट पर मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। रूस, यूक्रेन और जर्मनी से आए 22 विदेशी श्रद्धालुओं ने फल्गु नदी के देवघाट पर अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान किया। विदेशी श्रद्धालुओं ने सनातन परंपरा के अनुसार विधि-विधान से कर्मकांड पूरा किया और पितरों को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित किया।
पितृपक्ष के दौरान गयाजी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख धार्मिक स्थल बन जाता है। यहां बड़ी संख्या में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने पहुंचते हैं। इसी धार्मिक आस्था से प्रभावित होकर रूस, यूक्रेन और जर्मनी के 22 श्रद्धालु भी गयाजी पहुंचे हैं। इन विदेशी श्रद्धालुओं ने देवघाट पर पहुंचकर स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार पितृकर्म की शुरुआत की।
फल्गु नदी के देवघाट पर जब विदेशी श्रद्धालु पिंडदान और तर्पण कर रहे थे, तो वहां मौजूद लोगों के लिए यह दृश्य खास आकर्षण का केंद्र बन गया। अलग-अलग देशों से आए लोगों को भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुरूप कर्मकांड करते देखकर घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं में भी उत्सुकता दिखाई दी। इन श्रद्धालुओं ने धार्मिक विधियों को समझते हुए पूरे श्रद्धाभाव के साथ अनुष्ठान में हिस्सा लिया।
जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, रूस, यूक्रेन और जर्मनी से आए इन 22 विदेशी श्रद्धालुओं का नेतृत्व बनारस के पंडित लोकनाथ गौड़ कर रहे हैं। उनकी देखरेख में श्रद्धालु गयाजी की प्राचीन पिंडदान परंपरा के अनुसार अलग-अलग कर्मकांड कर रहे हैं। पंडित लोकनाथ गौड़ की अगुवाई में इन विदेशी मेहमानों को पितृकर्म की विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी दी जा रही है और उसी के अनुसार अनुष्ठान कराया जा रहा है।
विदेशी श्रद्धालुओं का यह धार्मिक कार्यक्रम केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहेगा। वे करीब तीन दिनों तक गयाजी में रहेंगे और अलग-अलग पिंडवेदियों पर पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करेंगे। इस दौरान गया के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर जाकर पिंडदान की परंपरा के अनुसार कर्मकांड किए जाने हैं।
गयाजी में पितृपक्ष के दौरान पिंडदान की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है। फल्गु नदी के तट पर स्थित देवघाट समेत विभिन्न पिंडवेदियों पर देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लोग यहां अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करते हैं। इसी परंपरा के कारण पितृपक्ष मेले के दौरान गयाजी में श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ जुटती है।
इस बार विदेशी श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने पितृपक्ष मेले की अंतरराष्ट्रीय तस्वीर को भी सामने रखा है। इससे पहले भी अलग-अलग देशों से आने वाले श्रद्धालु गयाजी में पिंडदान और तर्पण करते रहे हैं। वर्ष 2023 में भी जर्मनी, रूस, यूक्रेन समेत कई देशों से आए विदेशी नागरिकों द्वारा गया में पितृकर्म किए जाने की खबर सामने आई थी।
रूस और यूक्रेन से आए श्रद्धालुओं की मौजूदगी इसलिए भी चर्चा में रही कि दोनों देशों से जुड़े लोग अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों के लिए धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं। गयाजी की धार्मिक परंपरा से जुड़कर इन लोगों ने अपने पूर्वजों को याद किया और उनकी शांति के लिए पिंडदान किया। वहीं जर्मनी से आए श्रद्धालुओं ने भी भारतीय परंपरा के अनुसार तर्पण और पिंडदान में हिस्सा लिया।
गयाजी में विदेशी श्रद्धालुओं द्वारा किए जा रहे पितृकर्म को देखने के लिए देवघाट पर लोगों की भीड़ भी जुटी। घाट पर मौजूद स्थानीय लोगों और दूसरे श्रद्धालुओं के बीच विदेशी मेहमानों के पिंडदान को लेकर चर्चा होती रही। तीन दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान विदेशी श्रद्धालु गयाजी की अलग-अलग पिंडवेदियों पर पहुंचेंगे और अपने पितरों के लिए निर्धारित कर्मकांड पूरा करेंगे।
गयाजी का पितृपक्ष मेला हर वर्ष देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और विभिन्न पिंडवेदियों से जुड़ी धार्मिक परंपराओं के कारण यहां पितृकर्म करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और धार्मिक विधियों के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
इस पूरे आयोजन में रूस, यूक्रेन और जर्मनी के 22 श्रद्धालुओं की भागीदारी ने यह दिखाया कि गयाजी की पिंडदान परंपरा में विदेशी लोग भी रुचि लेकर यहां पहुंच रहे हैं। देवघाट पर पितरों का तर्पण करते विदेशी श्रद्धालुओं का दृश्य पितृपक्ष मेले के दौरान आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहा।












