Global तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच experts ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे जल्दबाजी से बचें और धीरे-धीरे equity में निवेश बढ़ाएं। गिरते बाजार में भी long-term returns के अच्छे अवसर बन सकते हैं।
Stock Market: वैश्विक स्तर पर चल रहे तनाव और पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात के बीच निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह निवेश करने का सही समय है या अभी दूरी बनाए रखना बेहतर होगा। बाजार में हालिया गिरावट और अनिश्चितता के बावजूद कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह समय पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। सही रणनीति अपनाकर निवेशक आने वाले समय में अच्छे रिटर्न हासिल कर सकते हैं।
3पी इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के मुख्य निवेश अधिकारी प्रशांत जैन और सह-फंड मैनेजर अश्वनी कुमार ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे जल्दबाजी में बड़े फैसले लेने के बजाय धीरे-धीरे इक्विटी में निवेश बढ़ाने पर विचार करें। उनका मानना है कि मौजूदा बाजार परिस्थितियां जोखिम के साथ अवसर भी लेकर आई हैं।
धीरे-धीरे निवेश बढ़ाने की सलाह
एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि निवेशकों को अपने risk profile को समझते हुए अगले कुछ हफ्तों में step-by-step तरीके से निवेश बढ़ाना चाहिए। एक साथ बड़ी रकम लगाने के बजाय phased investment रणनीति अपनाना बेहतर रहेगा।
इस तरह की रणनीति से निवेशक market volatility के प्रभाव को कम कर सकते हैं। जब बाजार गिरता है तो कम कीमत पर खरीदारी का मौका मिलता है, और जब बाजार सुधरता है तो औसत लागत कम होने का फायदा मिलता है। इसलिए अनिश्चित माहौल में patience और discipline सबसे जरूरी होते हैं।
निफ्टी वैल्यूएशन और रिटर्न की संभावना
एक्सपर्ट्स के अनुसार, निफ्टी का मौजूदा valuation एक साल आगे की अनुमानित आय के लगभग 17.5 गुना पर है, जो न तो बहुत महंगा है और न ही बहुत सस्ता। इसे एक balanced valuation कहा जा सकता है।
उनका अनुमान है कि मध्यम अवधि में बाजार से करीब 12 प्रतिशत का CAGR (Compound Annual Growth Rate) रिटर्न मिल सकता है। यह रिटर्न उन निवेशकों के लिए आकर्षक हो सकता है जो लंबी अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं।
इसके साथ ही, बाजार में re-rating की संभावना भी बताई गई है। पिछले 18 महीनों में लार्ज-कैप शेयरों में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आई है, जबकि स्मॉल और मिडकैप शेयरों में इससे भी ज्यादा गिरावट देखी गई है। इस गिरावट ने valuations को अधिक आकर्षक बना दिया है।
बाजार में गिरावट के बाद अवसर
हाल के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से निफ्टी 50 में करीब 8.2 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहीं, निफ्टी स्मॉलकैप 250 इंडेक्स लगभग 6.9 प्रतिशत नीचे आया है। यह गिरावट कई निवेशकों के लिए चिंता का कारण है, लेकिन एक्सपर्ट्स इसे long-term opportunity के रूप में देख रहे हैं।
जब बाजार में correction आता है, तो अच्छी कंपनियों के शेयर भी कम कीमत पर मिलते हैं। ऐसे में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह accumulation का समय हो सकता है। हालांकि, इसके लिए सही स्टॉक्स का चयन और धैर्य जरूरी है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर
मार्च महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII ने भारतीय बाजार से करीब 88,180 करोड़ रुपये की निकासी की है। यह बड़ी बिकवाली बाजार पर दबाव का एक बड़ा कारण रही है।
हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह स्थिति स्थायी नहीं है। जैसे ही वैश्विक हालात स्थिर होंगे और युद्ध का तनाव कम होगा, विदेशी निवेशक फिर से भारतीय बाजार की ओर रुख कर सकते हैं। भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और growth potential उन्हें आकर्षित कर सकती है।
घरेलू निवेशकों की मजबूत भूमिका
इस समय बाजार में घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DII एक मजबूत सहारा बनकर उभरे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में DIIs की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है।
प्राथमिक बाजार यानी IPO के जरिए आने वाली कंपनियों में से कई फिलहाल घाटे में चल रही हैं। ऐसे में इनसे जुटाई जाने वाली पूंजी में कमी आ सकती है। इसका मतलब यह है कि निवेशकों का पैसा सेकंडरी मार्केट की ओर ज्यादा जाएगा। यह trend बाजार के लिए सकारात्मक हो सकता है क्योंकि इससे शेयर बाजार में liquidity बनी रहेगी और कीमतों को समर्थन मिलेगा।
कच्चे तेल की कीमतों का प्रभाव
मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल यानी crude oil की कीमतों में तेजी आई है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि निफ्टी में शामिल कंपनियों का exposure उन सेक्टर्स में ज्यादा नहीं है, जो तेल की कीमतों से सीधे प्रभावित होते हैं।
तेल विपणन कंपनियां, पेंट, सिरैमिक्स, शहरी गैस वितरण, ऑटोमोबाइल, एयरलाइंस, सीमेंट और खाद्य प्रसंस्करण जैसे सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन ये बाजार का छोटा हिस्सा हैं। इसके अलावा, कंपनियां समय के साथ बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं। इसलिए इसका असर आमतौर पर अस्थायी होता है।
महंगाई के खिलाफ सुरक्षा के रूप में शेयर
एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि शेयर बाजार महंगाई यानी inflation के खिलाफ एक अच्छा बचाव प्रदान करता है। जब कीमतें बढ़ती हैं, तो कंपनियों की आय और राजस्व भी उसी के अनुसार बढ़ते हैं।
इसका मतलब है कि लंबी अवधि में इक्विटी निवेश महंगाई को मात देने में मदद कर सकता है। इसलिए अस्थायी गिरावट को देखकर घबराने के बजाय निवेशकों को अपने long-term goals पर ध्यान देना चाहिए।
तेल कीमतों का दीर्घकालिक अनुमान
वित्त वर्ष 2025-26 में कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल रही है। हालांकि, भविष्य में कीमतों का अनुमान लगाना आसान नहीं है, खासकर जब वैश्विक स्तर पर तनाव बना हुआ हो।
अगर वित्त वर्ष 2027 तक तेल की कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती हैं, तो भारत का तेल आयात बिल 45 से 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, लेकिन अभी यह केवल एक अनुमान है।










