विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने सितंबर में अब तक यानी 1 से 19 सितंबर के बीच भारतीय बाजार से 23,676 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की है। एनालिस्ट्स के मुताबिक, इससे पहले जुलाई और अगस्त में एफपीआई भारतीय बाजार में शुद्ध खरीदार रहे थे।
Foreign Investors Selling: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। सितंबर 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार के सेकेंडरी मार्केट से करीब 23,676 करोड़ रुपये की निकासी की है। यह आंकड़ा 1 से 19 सितंबर के बीच का है। इससे पहले जुलाई और अगस्त में विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजार में शुद्ध खरीदार बने हुए थे।
बाजार विश्लेषकों के अनुसार, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल और ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता विदेशी निवेशकों के रुख को प्रभावित कर रही हैं। हालांकि, प्राइमरी मार्केट में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी अभी भी बनी हुई है।
प्राइमरी मार्केट में जारी है विदेशी निवेश
विदेशी निवेशकों ने सितंबर में अब तक प्राइमरी मार्केट में लगभग 2,703 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इसके साथ ही वर्ष 2026 में प्राइमरी मार्केट के जरिए FPI का कुल निवेश करीब 48,550 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. वी.के. विजयकुमार के अनुसार, प्राइमरी मार्केट में विदेशी निवेश का जारी रहना यह संकेत देता है कि सेकेंडरी मार्केट में कमजोरी के बावजूद नए इश्यू और चुनिंदा अवसरों को लेकर निवेशकों की रुचि बनी हुई है।
प्राइमरी मार्केट में निवेश के दौरान विदेशी संस्थागत निवेशक कंपनियों के वैल्यूएशन, ग्रोथ की संभावनाओं और भविष्य की कमाई जैसे पहलुओं पर ध्यान दे सकते हैं। वहीं, सेकेंडरी मार्केट में शेयरों की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक जोखिमों का सीधा प्रभाव देखने को मिलता है।

कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
पिछले सप्ताह भारतीय शेयर बाजार दबाव में रहा। रिपोर्टों के अनुसार, सेंसेक्स 0.65 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,294.46 अंक पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी में 0.22 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई और यह 23,346.40 अंक पर बंद हुआ। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई स्तरों पर चुनौती पैदा कर सकती हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में महंगा कच्चा तेल आयात बिल बढ़ा सकता है, जिससे महंगाई, चालू खाते और रुपये की स्थिति पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
ऊर्जा की कीमतों में लगातार तेजी से कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है। इसका असर विभिन्न क्षेत्रों की लाभप्रदता और निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है। इसी वजह से विदेशी निवेशक जोखिम वाले बाजारों में अपनी हिस्सेदारी घटाने का फैसला कर सकते हैं।
ग्लोबल बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों का असर
विदेशी निवेशकों के फैसलों पर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति का भी प्रभाव रहता है। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियों में निवेश अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकता है। इससे उभरते बाजारों से पूंजी निकासी का दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया गया है।
ऐसे फैसले वैश्विक लिक्विडिटी और ब्याज दरों की दिशा को लेकर अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं। हालांकि, किसी भी बाजार पर प्रभाव कई आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।












