जोधपुर में मौसम के लगातार बदलाव, एसी के अधिक उपयोग और वायरल संक्रमणों के कारण खांसी-जुकाम के मरीज बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार एडिनोवायरस और एंट्रोवायरस की वजह से गले, आंख और कान के संक्रमण के मामले भी सामने आ रहे हैं।
जोधपुर: आमतौर पर खांसी, जुकाम और गले के संक्रमण को सर्दियों की बीमारियां माना जाता है, लेकिन राजस्थान के जोधपुर सहित कई क्षेत्रों में इस बार गर्मी के मौसम में भी ऐसे मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में बड़ी संख्या में लोग खांसी, जुकाम, गले में खराश, आंखों में संक्रमण और कान संबंधी समस्याओं की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव, एयर कंडीशनर (AC) का बढ़ता उपयोग और कुछ विशेष वायरल संक्रमण इस स्थिति के प्रमुख कारण बनकर उभरे हैं। डॉक्टरों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में गर्मियों के दौरान इस तरह के संक्रमणों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
मौसम में अचानक बदलाव बढ़ा रहा संक्रमण का खतरा
चिकित्सकों का मानना है कि इस वर्ष मौसम का असामान्य व्यवहार लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रहा है। एक ओर दिन के समय तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, वहीं दूसरी ओर अचानक बारिश होने पर तापमान में 8 से 10 डिग्री तक की गिरावट आ जाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार शरीर को लगातार बदलते तापमान के अनुरूप खुद को ढालने में समय लगता है। जब यह बदलाव बहुत तेजी से होता है, तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे वायरल संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म और ठंडे वातावरण के बीच बार-बार आने-जाने से श्वसन तंत्र पर दबाव पड़ता है, जिससे सर्दी-जुकाम जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
एसी और बाहरी गर्मी का अंतर बना जोखिम
आधुनिक जीवनशैली में एयर कंडीशनर का उपयोग लगभग हर घर, कार्यालय और वाहन में बढ़ चुका है। डॉक्टरों के अनुसार लगातार ठंडे वातावरण में रहने के बाद अचानक तेज गर्मी में निकलना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
कई लोग घर या कार्यालय में 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले कमरों में लंबे समय तक रहते हैं। इसके बाद जब वे बाहर निकलते हैं, जहां तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक होता है, तो शरीर को अचानक तापमान परिवर्तन का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का तापमान अंतर श्वसन मार्ग की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है और वायरस को संक्रमण फैलाने का अवसर देता है।
एडिनोवायरस और एंट्रोवायरस बन रहे प्रमुख कारण
डॉक्टरों ने हाल के मामलों में कुछ वायरल संक्रमणों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया है। इनमें विशेष रूप से एडिनोवायरस और एंट्रोवायरस का उल्लेख किया जा रहा है।
एडिनोवायरस एक ऐसा वायरस है जो श्वसन तंत्र, आंखों और पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसके संक्रमण से बुखार, गले में दर्द, खांसी, जुकाम और आंखों में लालिमा जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

वहीं एंट्रोवायरस भी कई प्रकार की वायरल बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। यह वायरस बच्चों और बुजुर्गों को अधिक प्रभावित कर सकता है तथा हल्के संक्रमण से लेकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान समय में सामने आ रहे कई मामलों में इन दोनों वायरसों के लक्षण देखने को मिल रहे हैं।
गले के साथ आंख और कान में भी संक्रमण
इस बार संक्रमण का पैटर्न सामान्य सर्दी-जुकाम से कुछ अलग दिखाई दे रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक बड़ी संख्या में ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं जिनमें एक साथ कई अंग प्रभावित हो रहे हैं।
मरीजों में गले में खराश, खांसी और नाक बहने के साथ-साथ आंखों में जलन, लालिमा और पानी आने की शिकायत भी देखी जा रही है। कुछ मामलों में कान दर्द और कान के संक्रमण की समस्या भी सामने आई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकेत देता है कि संक्रमण केवल श्वसन तंत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर के अन्य हिस्सों को भी प्रभावित कर रहा है।
अस्पतालों की ओपीडी में बढ़ा मरीजों का दबाव
जोधपुर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। चिकित्सकों के अनुसार मेडिकल ओपीडी में आने वाले लगभग 20 प्रतिशत मरीज वर्तमान में खांसी, जुकाम और संबंधित संक्रमणों की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि अधिकांश मामलों में लक्षण हल्के हैं और उचित देखभाल से मरीज कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं। हालांकि छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह
डॉक्टरों ने लोगों को बदलते मौसम में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, संतुलित आहार लेना और पर्याप्त नींद लेना रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है।
इसके अलावा एसी का तापमान बहुत कम रखने से बचना चाहिए और बाहर निकलते समय शरीर को धीरे-धीरे तापमान परिवर्तन के अनुरूप ढालना चाहिए। संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर भीड़भाड़ वाले स्थानों से दूरी बनाना और आवश्यक होने पर चिकित्सकीय परामर्श लेना जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य पर बढ़ता असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम पैटर्न और जलवायु परिवर्तन का असर अब मानव स्वास्थ्य पर अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। पहले जिन बीमारियों को किसी विशेष मौसम से जोड़ा जाता था, वे अब वर्ष के अन्य समय में भी देखने को मिल रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में ऐसे संक्रमणों की आवृत्ति और बढ़ सकती है, इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और लोगों दोनों को नई परिस्थितियों के अनुरूप तैयार रहना होगा।











