हरियाणा में 11 मेयरों की वैधता पर सवाल, कानून और नियमों में टकराव

हरियाणा में मेयरों के प्रत्यक्ष चुनाव और नगर निगम अधिनियम की धारा 53 के बीच विरोधाभास से 11 मेयरों की वैधानिक स्थिति पर बहस तेज हुई।

हरियाणा में 2018 से मेयरों का प्रत्यक्ष चुनाव हो रहा है, लेकिन नगर निगम अधिनियम की धारा 53 में अब भी अप्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान मौजूद है। इस कानूनी विरोधाभास ने 11 नगर निगमों के मेयरों की वैधानिक स्थिति को लेकर बहस छेड़ दी है।

चंडीगढ़: हरियाणा में नगर निगम मेयरों के चुनाव को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी विसंगति सामने आई है। राज्य में पिछले साढ़े सात वर्षों से मेयरों का प्रत्यक्ष चुनाव कराया जा रहा है, जबकि संबंधित कानून की एक प्रमुख धारा अब भी अप्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान करती है। इस विरोधाभास को लेकर कानूनी विशेषज्ञों ने सरकार से तत्काल संशोधन की मांग की है।

कानून और चुनाव प्रक्रिया के बीच सामने आया विरोधाभास

हरियाणा में वर्ष 2018 से नगर निगम मेयरों का चुनाव सीधे जनता के वोटों से कराया जा रहा है। वर्तमान में राज्य के सभी 11 नगर निगमों में प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित मेयर कार्यरत हैं। हाल ही में अंबाला, पंचकूला और सोनीपत के नव-निर्वाचित मेयरों ने शपथ भी ग्रहण की है, जबकि इससे पहले अन्य नगर निगमों में भी प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर पद संभाल चुके हैं।

हालांकि अब यह सवाल उठ रहा है कि जिस कानूनी आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव कराए जा रहे हैं, उसमें एक महत्वपूर्ण खामी अब भी बनी हुई है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 की धारा 53 में आज भी यह उल्लेख है कि आम चुनाव के बाद निर्वाचित पार्षद अपने बीच से मेयर का चुनाव करेंगे। यानी कानून में अभी भी अप्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था दर्ज है।

2018 में बदली व्यवस्था, लेकिन कानून नहीं हुआ पूरी तरह संशोधित

जानकारों के अनुसार सितंबर 2018 में राज्य सरकार ने मेयरों के प्रत्यक्ष चुनाव का रास्ता साफ करने के लिए संशोधन किए थे। इसके बाद प्रदेश में सीधे जनता द्वारा मेयर चुने जाने लगे। लेकिन इसी दौरान अधिनियम की धारा 53 में आवश्यक संशोधन नहीं किया गया।

धारा 53 के अनुसार नगर निगम के चुनाव के बाद पहली बैठक में पार्षद अपने बीच से मेयर का चयन करेंगे। इतना ही नहीं, बराबर मत होने की स्थिति में लॉटरी के माध्यम से विजेता तय करने का प्रावधान भी अब तक कानून में मौजूद है। दूसरी ओर, नवंबर 2018 में नियम 71 में बदलाव कर यह व्यवस्था लागू कर दी गई कि पहली बैठक में सीधे निर्वाचित मेयर और पार्षदों को शपथ दिलाई जाएगी।

यहीं से अधिनियम और नियमों के बीच स्पष्ट टकराव की स्थिति पैदा हो गई।

कानूनी विशेषज्ञों ने जताई चिंता

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के अधिवक्ता हेमंत कुमार ने इस विसंगति को गंभीर बताते हुए कहा है कि नियम किसी भी स्थिति में अधिनियम से ऊपर नहीं हो सकते। न्यायिक सिद्धांत भी यही कहते हैं कि यदि किसी अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों में विरोधाभास हो, तो अधिनियम के प्रावधान को प्राथमिकता दी जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इस विषय पर कोई कानूनी चुनौती दी जाती है तो यह मामला विवाद का कारण बन सकता है। इसी वजह से सरकार से धारा 53 में संशोधन कर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की जा रही है।

नए विधेयक पर टिकी नजर

जानकारी के अनुसार दिसंबर 2025 में हरियाणा विधानसभा ने नया नगर निकाय विधेयक पारित किया था, जिसमें इस त्रुटि को दूर करने का प्रयास किया गया है। हालांकि यह विधेयक अभी राष्ट्रपति की स्वीकृति का इंतजार कर रहा है और कानून के रूप में लागू नहीं हुआ है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि न केवल नया कानून लागू किया जाए, बल्कि पुराने अधिनियम में भी आवश्यक संशोधन कर इसे पूर्व प्रभाव से लागू किया जाए। इससे वर्ष 2018 के बाद हुए सभी प्रत्यक्ष मेयर चुनावों को स्पष्ट और मजबूत कानूनी आधार मिल सकेगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

यह विवाद केवल तकनीकी कानूनी त्रुटि तक सीमित नहीं है। वर्तमान में हरियाणा के 11 नगर निगमों में प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर कार्यरत हैं और उनकी वैधानिक स्थिति पर किसी प्रकार का सवाल भविष्य में प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है।

इसी कारण विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को जल्द से जल्द कानून और नियमों के बीच मौजूद इस विरोधाभास को समाप्त करना चाहिए, ताकि स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली पर किसी प्रकार का कानूनी संशय न रहे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी तरह निर्विवाद बनी रहे।

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