हिमाचल प्रदेश में IAS, IPS और IFS कैडर की संख्या घटाने के प्रस्ताव को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। सरकार की ओर से खर्च कम करने और प्रशासनिक ढांचे को तर्कसंगत बनाने के उद्देश्य से ऑल इंडिया सर्विसेज के कैडर की समीक्षा की जा रही है। इसी बीच प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव पीसी फारका ने प्रस्ताव के संभावित असर को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर IAS कैडर की स्वीकृत संख्या कम की जाती है तो इसका सीधा असर HAS अधिकारियों के प्रमोशन और राज्य सेवा से IAS में इंडक्शन पर पड़ सकता है।
हिमाचल सरकार की ओर से कैडर को कम करने की प्रक्रिया वित्तीय दबाव के बीच शुरू की गई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पहले IAS कैडर की स्वीकृत संख्या 153 से घटाकर 147 करने का प्रस्ताव सामने आया था। बाद की रिपोर्ट में सरकार की ओर से IAS के 23 पद कम कर स्वीकृत संख्या 153 से 130 करने की बात कही गई है। इसी तरह IFS कैडर में भी बड़ी कटौती का प्रस्ताव है। IFS की संख्या 118 से घटाकर 83 करने की बात कही गई है। IPS कैडर, जिसमें करीब 96 पद बताए गए हैं, को भी भविष्य में तर्कसंगत बनाने की जरूरत सरकार की ओर से जताई गई है।
सरकार का तर्क है कि हिमाचल प्रदेश पर भारी वित्तीय दबाव है और प्रशासनिक ढांचे में अनावश्यक खर्च को कम करना जरूरी है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी कहा है कि राज्य को इतनी बड़ी नौकरशाही की जरूरत नहीं है और अधिकारियों की संख्या को काम की वास्तविक जरूरत के अनुसार तय किया जाना चाहिए। सरकार का मानना है कि कैडर में कटौती से लंबे समय में वेतन और प्रशासनिक खर्च कम किया जा सकेगा।
लेकिन इस प्रस्ताव का दूसरा पहलू राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के करियर से जुड़ा है। HAS यानी हिमाचल प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों में से कुछ अधिकारियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत IAS में प्रमोशन या इंडक्शन का अवसर मिलता है। यदि IAS कैडर की कुल स्वीकृत संख्या घटती है तो प्रमोशन कोटे के लिए उपलब्ध पदों की संख्या पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। यही मुद्दा अब प्रशासनिक हलकों में चर्चा का प्रमुख कारण बना हुआ है।
पूर्व मुख्य सचिव पीसी फारका की आपत्ति इसी संभावित असर को लेकर है। उनका तर्क है कि IAS कैडर छोटा होने पर राज्य सेवा के अधिकारियों के लिए IAS में जाने के अवसर सीमित हो सकते हैं। यानी केवल सीधे UPSC से आने वाले IAS अधिकारियों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि राज्य सेवा से IAS में शामिल होने वाले अधिकारियों के लिए उपलब्ध पद भी कैडर की कुल संरचना से जुड़े होते हैं।
हिमाचल में IAS कैडर की मौजूदा स्थिति को देखें तो केंद्र सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी 2024 को राज्य के IAS कैडर की अधिकृत संख्या 153 थी और 113 अधिकारी पद पर मौजूद थे। इसी आंकड़े में IPS की अधिकृत संख्या 94 और IFS की 114 बताई गई थी।
यही वजह है कि कैडर कम करने का फैसला केवल अधिकारियों की संख्या घटाने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसका प्रभाव भर्ती, पदोन्नति, वरिष्ठता, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और राज्य सेवा के अधिकारियों के करियर पथ पर भी पड़ सकता है। यदि स्वीकृत पदों की संख्या कम होती है तो भविष्य में खाली होने वाले पदों और प्रमोशन के अवसरों की गणना भी उसी आधार पर करनी होगी।
HAS अधिकारियों के लिए IAS में इंडक्शन एक महत्वपूर्ण करियर अवसर माना जाता है। राज्य प्रशासनिक सेवा में काम करने वाले अधिकारी लंबे समय तक जिला प्रशासन, राजस्व, विकास और शासन से जुड़े विभिन्न पदों पर जिम्मेदारी निभाते हैं। इनमें से पात्र अधिकारियों को नियमों के तहत IAS में शामिल होने का मौका मिलता है। ऐसे में IAS कैडर में कमी होने पर इस प्रक्रिया की गति और उपलब्ध अवसरों पर असर पड़ने की आशंका स्वाभाविक है।
हालांकि इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्र सरकार हिमाचल के नए कैडर प्रस्ताव को किस रूप में मंजूरी देती है और प्रमोशन कोटे की गणना किस आधार पर होती है। कैडर की अंतिम स्वीकृति और संबंधित नियमों के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि HAS अधिकारियों के लिए IAS इंडक्शन के कितने पद उपलब्ध रहेंगे।
इस पूरे विवाद में सरकार का वित्तीय तर्क भी महत्वपूर्ण है। हिमाचल पहले से ही भारी कर्ज और बढ़ते राजस्व व्यय की चुनौती से जूझ रहा है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार एक IAS या IFS अधिकारी पर सालाना खर्च करीब 45 से 50 लाख रुपये तक हो सकता है। ऐसे में कैडर में कटौती से सरकार को लंबे समय में करोड़ों रुपये की बचत की उम्मीद है।
सरकार इस बचत का इस्तेमाल विकास और कल्याणकारी योजनाओं में करने की बात कर रही है। यानी सरकार की नजर केवल अधिकारियों की संख्या कम करने पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक खर्च को कम करके सीमित संसाधनों को दूसरी प्राथमिकताओं में लगाने पर है। आर्थिक दबाव के बीच यह तर्क सरकार के लिए महत्वपूर्ण है।
दूसरी तरफ प्रशासनिक विशेषज्ञों का सवाल है कि अधिकारियों की संख्या कम करने से कहीं ऐसा न हो कि मौजूदा अधिकारियों पर काम का दबाव बढ़ जाए। हिमाचल भौगोलिक रूप से पहाड़ी राज्य है और यहां कई जिलों में दुर्गम क्षेत्र हैं। प्राकृतिक आपदाओं, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों के कारण प्रशासनिक अधिकारियों की जरूरत कई क्षेत्रों में बनी रहती है।
इसी वजह से कैडर की समीक्षा में केवल वित्तीय बचत को आधार बनाना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। अधिकारियों की वास्तविक जरूरत, जिलों की संख्या, प्रशासनिक जिम्मेदारियां, केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले अधिकारियों की संख्या और राज्य में उपलब्ध मानव संसाधन जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
हिमाचल में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति भी कैडर व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रिपोर्टों के अनुसार करीब दो दर्जन IAS अधिकारी और एक दर्जन से ज्यादा IPS तथा IFS अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। ऐसे में राज्य में उपलब्ध अधिकारियों की वास्तविक संख्या और स्वीकृत कैडर के बीच अंतर भी प्रशासनिक योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि कैडर कम होता है तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य में जरूरी पदों पर पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध रहें। खासकर जिलों के उपायुक्त, सचिवालय, विभागाध्यक्ष और अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर अधिकारियों की उपलब्धता प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही राज्य सेवा के अधिकारियों को पदोन्नति के पर्याप्त अवसर मिलते रहें, यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
हाल के वर्षों में हिमाचल सरकार ने IAS अधिकारियों की पदोन्नति भी की है। जनवरी 2025 में चार 2009 बैच के IAS अधिकारियों को सचिव स्तर पर पदोन्नत किया गया था और 13 अन्य IAS अधिकारियों को भी अगले स्तर का पे मैट्रिक्स दिया गया था। इससे पता चलता है कि राज्य प्रशासन में पदोन्नति का ढांचा लगातार आगे बढ़ रहा है।
ऐसे में कैडर कम करने से भविष्य में वरिष्ठ पदों के लिए उपलब्ध जगहों की संख्या भी चर्चा का विषय बन सकती है। एक ओर सरकार खर्च कम करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर अधिकारियों की पदोन्नति और करियर प्रगति को भी बनाए रखना होगा। यही संतुलन इस पूरे प्रस्ताव को जटिल बनाता है।
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर IAS कैडर छोटा होता है तो प्रमोशन के लिए इंतजार का समय बढ़ेगा या नहीं। कम पदों की स्थिति में पात्र अधिकारियों की सूची लंबी हो सकती है और इंडक्शन की प्रक्रिया में अधिक समय लग सकता है। हालांकि अंतिम प्रभाव केंद्र की मंजूरी और लागू नियमों के बाद ही स्पष्ट होगा।
दूसरी ओर सरकार यह भी कह सकती है कि कैडर का आकार वास्तविक जरूरत के अनुरूप होना चाहिए और केवल प्रमोशन के अवसर बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पद स्वीकृत नहीं किए जा सकते। प्रशासनिक व्यवस्था में पदों की संख्या काम के बोझ और जरूरत के आधार पर तय करने का तर्क भी इसी आधार पर दिया जा रहा है।
IAS, IPS और IFS तीनों ऑल इंडिया सर्विसेज हैं और इनके कैडर से संबंधित अंतिम व्यवस्था में केंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इन सेवाओं के अधिकारियों का कैडर राज्य स्तर पर काम करने के बावजूद केंद्रीय नियमों और कैडर व्यवस्था से जुड़ा रहता है। इसलिए हिमाचल सरकार के प्रस्ताव के बाद केंद्र की मंजूरी भी महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल हिमाचल में कैडर घटाने को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। सरकार इसे आर्थिक दबाव के बीच खर्च घटाने और प्रशासनिक ढांचे को छोटा व प्रभावी बनाने का उपाय बता रही है, जबकि विरोध या चिंता जताने वाले पक्ष इसका असर अधिकारियों की उपलब्धता और राज्य सेवा से IAS में जाने वाले अधिकारियों के अवसरों पर देख रहे हैं।
आने वाले समय में केंद्र सरकार के स्तर पर प्रस्ताव पर होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। अगर IAS कैडर को 153 से घटाकर 130 करने का प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो इसके साथ प्रमोशन कोटे और HAS अधिकारियों के इंडक्शन पर भी विस्तृत समीक्षा की जरूरत होगी। वहीं IFS के 118 से 83 पद किए जाने के प्रस्ताव का प्रभाव वन विभाग और राज्य की प्रशासनिक जरूरतों पर भी देखा जाएगा।
इस मुद्दे पर अंतिम तस्वीर तभी साफ होगी जब कैडर की संशोधित संख्या, पदों का वितरण और प्रमोशन से जुड़े नियम स्पष्ट होंगे। तब यह पता चलेगा कि सरकार की बचत कितनी होगी और राज्य सेवा के अधिकारियों के करियर पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश में IAS, IPS और IFS कैडर घटाने के प्रस्ताव ने प्रशासनिक हलकों में बहस छेड़ दी है। सरकार इसे बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच खर्च कम करने और नौकरशाही को जरूरत के मुताबिक छोटा करने का कदम बता रही है। वहीं पूर्व मुख्य सचिव पीसी फारका समेत आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि IAS कैडर घटने से HAS अधिकारियों के प्रमोशन और IAS में इंडक्शन के अवसर कम हो सकते हैं। अब प्रस्ताव पर केंद्र की मंजूरी और संशोधित कैडर संरचना से ही स्पष्ट होगा कि इसका राज्य प्रशासन और अधिकारियों के करियर पर कितना असर पड़ता है।












