अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने आइसलैंड को सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान बताया। आर्कटिक में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अमेरिका वहां सहयोग बढ़ाना चाहता है। दोनों देशों ने सुरक्षा के साथ ऊर्जा, डेटा सेंटर और दवा उद्योग पर भी चर्चा की।
वॉशिंगटन: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने आइसलैंड की यात्रा के दौरान कहा है कि उनका देश लंबे समय से इस उत्तरी अटलांटिक द्वीपीय राष्ट्र को सुरक्षा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान मानता रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका, रूस और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच रूबियो का यह बयान दोनों देशों के सुरक्षा संबंधों के महत्व को रेखांकित करता है। रूबियो सोमवार को आइसलैंड की राजधानी रेक्याविक पहुंचे और मंगलवार को प्रधानमंत्री क्रिस्ट्रून फ्रॉस्टाडोट्टिर तथा विदेश मंत्री थोर्गेर्दुर कैत्रिन गुनार्सदोतिर के साथ बातचीत की। दोनों पक्षों के बीच सुरक्षा के अलावा भू-तापीय ऊर्जा, डेटा सेंटर और दवा उद्योग जैसे आर्थिक एवं रणनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
उनकी यात्रा ऐसे समय हुई है जब अमेरिका आर्कटिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणियों ने भी इस क्षेत्र की भू-राजनीतिक अहमियत को अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
आर्कटिक में बढ़ रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
आर्कटिक क्षेत्र तेजी से वैश्विक शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है। समुद्री मार्गों, ऊर्जा संसाधनों और सैन्य पहुंच के लिहाज से इस क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ा है। अमेरिका अपनी उत्तरी पहुंच को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि रूस की लंबे समय से आर्कटिक में मजबूत सैन्य और आर्थिक मौजूदगी है। चीन भी इस क्षेत्र में आर्थिक और वैज्ञानिक गतिविधियों के जरिए अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
इसी बदलते रणनीतिक वातावरण में आइसलैंड का महत्व बढ़ गया है। उत्तरी अटलांटिक में स्थित होने के कारण यह देश यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच समुद्री तथा हवाई मार्गों के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रूबियो ने कहा कि आइसलैंड लंबे समय से सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चौकी रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों देश ऐसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के अवसर तलाश सकते हैं, जहां दोनों के हित समान हों।
अमेरिका और आइसलैंड के बीच सुरक्षा सहयोग
आइसलैंड की खास स्थिति के बावजूद देश के पास अपनी नियमित सेना नहीं है। वह अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से नाटो और अमेरिका के साथ किए गए द्विपक्षीय रक्षा समझौते पर निर्भर करता है। अमेरिका और आइसलैंड के बीच 1951 में रक्षा समझौता हुआ था। इसके तहत दोनों देशों के बीच लंबे समय से सुरक्षा सहयोग कायम है।
अमेरिकी सेना की केफ्लाविक में लगातार मौजूदगी 2006 तक रही थी। इसके बाद अमेरिका ने वहां अपनी स्थायी सैन्य मौजूदगी समाप्त कर दी और अपने संसाधनों को दुनिया के दूसरे हिस्सों में स्थानांतरित किया। रूबियो ने इस पुराने सैन्य संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय अमेरिकी मौजूदगी समाप्त होने का कारण किसी समस्या का होना नहीं था, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी सैन्य प्राथमिकताओं में बदलाव था।
उनके मुताबिक पिछले दो दशकों में दुनिया की रणनीतिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं।

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की नीति से बढ़ी चर्चा
रूबियो की आइसलैंड यात्रा को ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते रहे हैं और इसे खरीदने या अमेरिका में शामिल करने की संभावना से जुड़े बयान दे चुके हैं।
सितंबर के अंत में अमेरिका ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक सुरक्षा समझौता किया था। इस समझौते के तहत अमेरिका को वहां दो नए सैन्य ठिकाने स्थापित करने की अनुमति मिलने की बात सामने आई है।
ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। ऐसे में वहां अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के विस्तार ने आर्कटिक में बदलते शक्ति संतुलन को लेकर चर्चा को और तेज कर दिया है।
ट्रंप की एआई तस्वीर पर आइसलैंड की आपत्ति
आर्कटिक क्षेत्र को लेकर अमेरिकी रुख के बीच आइसलैंड और अमेरिका के संबंधों में एक विवाद भी सामने आया था। सितंबर की शुरुआत में ट्रंप ने एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार नक्शा साझा किया था, जिसमें उत्तरी अमेरिका, कैरेबियाई क्षेत्र, ग्रीनलैंड और आइसलैंड को कथित तौर पर “संयुक्त राज्य अमेरिका” के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
इस तस्वीर पर आइसलैंड की सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई थी। रेक्याविक ने अमेरिकी राजदूत को तलब किया और तस्वीर को पूरी तरह अनुचित बताया। हालांकि, आइसलैंड की विदेश मंत्री गुनार्सदोतिर ने मंगलवार को संकेत दिया कि इस मुद्दे को अब सुलझा लिया गया है। उन्होंने अमेरिका के साथ संबंध मजबूत बनाए रखने की इच्छा भी जाहिर की।
ग्रीनलैंड पर ट्रंप का रुख जारी
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की दिलचस्पी इसके बाद भी खत्म नहीं हुई है। रविवार को उन्होंने अपने सोशल मीडिया मंच पर एक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार तस्वीर साझा की, जिसमें उनका चेहरा ग्रीनलैंड के संभावित परिदृश्य के ऊपर दिखाई देता है।
तस्वीर के साथ उन्होंने “हैलो, ग्रीनलैंड!” संदेश लिखा। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र को लेकर अमेरिकी नीति पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। आइसलैंड के लिए यह स्थिति संवेदनशील है, क्योंकि वह एक ओर अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भर है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय संप्रभुता और स्वतंत्रता के मुद्दों पर अपनी स्थिति बनाए रखना चाहता है।
यूरोपीय संघ से जुड़ने पर आइसलैंड का फैसला
आइसलैंड की घरेलू राजनीति में भी यूरोप के साथ संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अगस्त के अंत में हुए मतदान में मतदाताओं ने यूरोपीय संघ में शामिल होने को लेकर बातचीत फिर शुरू करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 52.8 प्रतिशत मतदाताओं ने बातचीत दोबारा शुरू करने के खिलाफ मतदान किया, जबकि 47.2 प्रतिशत इसके पक्ष में थे।
यूरोपीय संघ में शामिल होने को लेकर आइसलैंड की बातचीत 2013 से रुकी हुई है। देश ने 1944 में स्वतंत्रता हासिल की थी और उसके बाद से उसने अपनी सुरक्षा नीति में सैन्य तटस्थता और नाटो सहयोग का एक अलग मॉडल अपनाया है।
ऊर्जा और आर्थिक सहयोग पर भी चर्चा
रूबियो और आइसलैंड के नेताओं के बीच बातचीत केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रही। दोनों देशों ने भू-तापीय ऊर्जा, डेटा सेंटर और दवा उद्योग जैसे क्षेत्रों में संभावित सहयोग पर भी चर्चा की।
आइसलैंड अपनी भू-तापीय ऊर्जा क्षमता के लिए जाना जाता है। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति, कीमतों और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को लेकर चिंता बढ़ी है, आइसलैंड की ऊर्जा क्षमता अमेरिका और यूरोप दोनों के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। डेटा सेंटर और दवा उद्योग भी दोनों देशों के बीच भविष्य के आर्थिक सहयोग के संभावित क्षेत्र माने जा रहे हैं।
रूबियो की अगली यात्रा ग्रीस
आइसलैंड के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री ग्रीस की यात्रा पर जाएंगे। वहां वह नाटो सदस्य ग्रीस के साथ रणनीतिक संवाद में हिस्सा लेंगे। बैठकों में क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा प्रमुख मुद्दे रहने की उम्मीद है। ईरान और यूक्रेन से जुड़े युद्धों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियों को उजागर किया है।
ग्रीस दक्षिण-पूर्वी यूरोप में प्राकृतिक गैस के परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में अमेरिका और ग्रीस के बीच ऊर्जा सहयोग भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
ग्रीस में अमेरिकी राजदूत को लेकर विवाद
रूबियो की ग्रीस यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिकी राजदूत किम्बर्ली गिलफॉयल को लेकर संभावित हितों के टकराव की खबरों पर सवाल उठाए गए हैं। मीडिया रिपोर्टों में उनके कथित बयानों और राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा हुई है। इस मामले में अमेरिकी सांसद ग्रेगरी मीक्स ने रूबियो को पत्र लिखकर स्पष्टीकरण मांगा है।
पत्र में एक अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कथित तौर पर गिलफॉयल द्वारा यूरोपीय देशों में “राजनीतिक बदलाव” लाने की संभावना संबंधी टिप्पणी किए जाने पर सवाल उठाया गया है। हालांकि, इन दावों और रिपोर्टों को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया और आगे की जांच को देखना महत्वपूर्ण होगा।
आर्कटिक नीति के लिए महत्वपूर्ण दौर
रूबियो की आइसलैंड यात्रा ऐसे समय हुई है जब आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक सुरक्षा और भू-राजनीति में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अमेरिका अपनी रणनीतिक पहुंच मजबूत करना चाहता है, जबकि रूस और चीन भी इस क्षेत्र में अपने हितों को आगे बढ़ा रहे हैं।
आइसलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे इस प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण बनाती है। हालांकि देश के पास अपनी सेना नहीं है, लेकिन नाटो सदस्यता और अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग उसे क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं। रूबियो के बयान और उनकी यात्रा से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में अमेरिका आइसलैंड और व्यापक उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र के साथ सुरक्षा, ऊर्जा और आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दे सकता है।












