जयशंकर बोले- जब दुनिया पाकिस्तान के साथ थी, रूस भारत के साथ खड़ा था

एस. जयशंकर ने भारत-रूस संबंधों का इतिहास बताते हुए कहा कि जब दुनिया पाकिस्तान के साथ थी, तब रूस ने भारत का समर्थन किया। उन्होंने यूक्रेन युद्ध पर भी बात की।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि जब दुनिया के कई देश पाकिस्तान के साथ खड़े थे, तब रूस ने भारत का समर्थन किया। उन्होंने कश्मीर समेत कई मुद्दों का उल्लेख किया और रूस-यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए बातचीत व कूटनीति पर जोर दिया।

नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत-रूस संबंधों को लेकर कहा है कि दोनों देशों के रिश्ते केवल मौजूदा परिस्थितियों से तय नहीं होते, बल्कि इनके पीछे कई दशकों का इतिहास है। दिल्ली में म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि जब दुनिया के कई देश पाकिस्तान के समर्थन में खड़े थे, तब रूस ने भारत का साथ दिया।

उन्होंने कहा कि भारत और रूस के बीच संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं और नई दिल्ली के लिए मॉस्को के साथ रिश्तों का आकलन केवल वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर नहीं किया जाता। जयशंकर ने पिछले करीब सात दशकों के दौरान कश्मीर सहित कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर सोवियत संघ और रूस के भारत के समर्थन का उल्लेख किया।

कश्मीर मुद्दे पर सोवियत संघ ने किया था वीटो

जयशंकर ने भारत के पक्ष में सोवियत संघ के पुराने रुख का उदाहरण देते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में इस्तेमाल किए गए वीटो का उल्लेख किया। 20 फरवरी 1957 को ऑस्ट्रेलिया, क्यूबा, ब्रिटेन और अमेरिका ने कश्मीर के मुद्दे पर UNSC में एक प्रस्ताव रखा था। इसमें कश्मीर में अस्थायी संयुक्त राष्ट्र बल भेजने के विचार को आगे बढ़ाने की बात कही गई थी।

प्रस्ताव को नौ देशों का समर्थन मिला था, लेकिन तत्कालीन सोवियत संघ ने वीटो कर दिया। इसके कारण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। भारत-रूस संबंधों के इतिहास में इस घटनाक्रम को अक्सर दोनों देशों के बीच रणनीतिक समझ और कूटनीतिक समर्थन के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

1965 के युद्ध में पाकिस्तान को मिला था चीन का समर्थन

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में युद्ध हुआ था। उस दौरान पाकिस्तान को चीन का समर्थन मिला था। चीन ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए अपनी सीमा पर सैनिक तैनात किए थे।

इसके अलावा ईरान और तुर्किये ने भी पाकिस्तान का समर्थन किया था। ईरान की ओर से पाकिस्तान को हथियार और ईंधन उपलब्ध कराने की बात भी सामने आई थी।

इस दौर में दक्षिण एशिया का संघर्ष व्यापक भू-राजनीतिक समीकरणों से जुड़ गया था। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि पाकिस्तान को कई देशों से राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन मिल रहा था।

1971 के बांग्लादेश युद्ध में अमेरिका और चीन पाकिस्तान के साथ

1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण समर्थन मिला। अमेरिका पाकिस्तान के समर्थन में था और उसने अपना युद्धपोत बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा था।

चीन भी पाकिस्तान के साथ खड़ा था। इसी अवधि में ईरान ने भी पाकिस्तान का समर्थन किया। उसने पाकिस्तान के लिए हथियार जुटाने में मदद की और सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई।

इसी पृष्ठभूमि में सोवियत संघ का भारत के साथ खड़ा होना भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।

भारत-रूस संबंध केवल आज की परिस्थितियों पर आधारित नहीं: जयशंकर

जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए रूस के साथ संबंधों को केवल वर्तमान घटनाओं के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनीतिक, रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के संबंध रहे हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की विदेश नीति में ऐतिहासिक अनुभव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका संकेत उन परिस्थितियों की ओर था, जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को रूस का समर्थन मिला था।

भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग भी दशकों पुराना है। हालांकि, बदलती वैश्विक परिस्थितियों में नई दिल्ली लगातार विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत ने बातचीत का रास्ता बताया

जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत के पुराने रुख को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि युद्ध का समाधान बातचीत, कूटनीति और समझौते के जरिए होना चाहिए।

भारत ने शुरुआत से ही रूस और यूक्रेन के बीच संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान का समर्थन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मौकों पर युद्ध को लेकर बातचीत और शांति की जरूरत पर जोर दे चुके हैं।

2022 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि “आज का दौर युद्ध का नहीं है।” भारत ने इस रुख को बाद के वर्षों में भी दोहराया है।

ब्लैक सी, अनाज और ऊर्जा पर भारत ने की बातचीत

जयशंकर के अनुसार, भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों के साथ बातचीत की है। इन चर्चाओं में युद्ध के दौरान ब्लैक सी में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, अनाज और ऊर्जा के निर्यात तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।

भारत का तर्क रहा है कि युद्ध के कारण केवल संबंधित देशों पर ही असर नहीं पड़ता, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। इसलिए संघर्ष को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं।

एक सप्ताह में अमेरिका पर जयशंकर की दूसरी टिप्पणी

जयशंकर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब उन्होंने करीब एक सप्ताह के भीतर दूसरी बार अमेरिका की नीतियों को लेकर टिप्पणी की है। 29 सितंबर को न्यूयॉर्क स्थित एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट में जयशंकर ने भारत की सुरक्षा चिंताओं का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान से आने वाले आतंकवाद को महत्वपूर्ण मुद्दा बताया था।

उन्होंने कहा था कि अगर अमेरिका भारत की इस चिंता को नहीं समझता है तो इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ता है।

इसके बाद 4 अक्टूबर को जयशंकर ने वैश्विक राजनीति में हो रहे बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा दुनिया में दो बड़े बदलाव दिखाई दे रहे हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका अपनी नीतियों के कारण दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है, जबकि चीन का बढ़ता प्रभाव देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ा रहा है।

बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीति

जयशंकर के बयानों से भारत की मौजूदा विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है। भारत एक तरफ रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को बनाए रख रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंधों को आगे बढ़ा रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस की आलोचना करने के बजाय संवाद और कूटनीति पर जोर दिया। वहीं अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत के व्यापार, तकनीक, रक्षा और रणनीतिक सहयोग में भी विस्तार हुआ है।

नई दिल्ली लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि भारत अपनी विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार सुरक्षित रखता है। इसी नीति के तहत भारत अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।

रूस के पुराने समर्थन का फिर दिया संदर्भ

जयशंकर का रूस के पुराने समर्थन का उल्लेख ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक जटिल बना दिया है। ऐसे माहौल में भारत के लिए रूस के साथ पारंपरिक संबंधों को बनाए रखना और साथ ही अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती है।

जयशंकर का संदेश यही रहा कि भारत-रूस संबंधों को केवल मौजूदा भू-राजनीतिक घटनाओं से नहीं समझा जा सकता। इन रिश्तों की नींव कई दशकों पुराने राजनीतिक और रणनीतिक अनुभवों पर आधारित है, जिसमें भारत के अनुसार संयुक्त राष्ट्र सहित कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सोवियत संघ और बाद में रूस का समर्थन शामिल रहा है।

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