जंगल प्रीमियर लीग: कंगारू ने कराया मजेदार क्रिकेट

जंगल प्रीमियर लीग: कंगारू ने कराया मजेदार क्रिकेट

सुंदरवन के जंगल में जानवर बोर हो रहे थे। शिकार और दौड़-भाग के अलावा उनके पास करने को कुछ नया नहीं था। तभी ऑस्ट्रेलिया से घूमकर आया 'कंगू' नाम का कंगारू अपने साथ एक नई चीज़ लाया- क्रिकेट का बल्ला और गेंद। उसने ऐलान किया, 'साथियो! आज हम एक नया खेल खेलेंगे जिसका नाम है क्रिकेट।'

कहानी

पूरे जंगल में उत्साह की लहर दौड़ गई। दो टीमें बनाई गईं। पहली टीम थी 'कंगू के जांबाज' जिसका कप्तान खुद कंगू कंगारू था। दूसरी टीम थी 'शेरू के शेर' जिसका कप्तान जंगल का राजा शेरू था।

मैच के लिए नदी के किनारे एक बड़ा मैदान साफ़ किया गया। अंपायर (निर्णायक) की ज़िम्मेदारी 'टोटो कछुए' को दी गई, क्योंकि वह बहुत धीमा था और कोई भी फ़ैसला जल्दबाज़ी में नहीं करता था। कमेंट्री के लिए 'मिट्ठू तोते' ने माइक (एक लकड़ी का डंडा) संभाल लिया।

टॉस शेरू ने जीता और पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला किया।

कंगू की टीम से बल्लेबाज़ी करने के लिए 'बंटी खरगोश' और 'मोटू हाथी' मैदान में उतरे। शेरू की टीम से गेंदबाज़ी करने आया 'चीकू चीता'।

चीकू चीता ने इतनी तेज़ दौड़ लगाकर गेंद फेंकी कि किसी को गेंद दिखाई ही नहीं दी। 'वुशशश!' गेंद निकल गई। बंटी खरगोश डर के मारे विकेट छोड़कर भाग गया। अंपायर टोटो ने अपनी गर्दन धीरे से बाहर निकाली और पाँच मिनट बाद उंगली उठाकर इशारा किया 'वाइड बॉल'।

अगली गेंद पर बंटी ने शॉट मारा। वह इतनी तेज़ दौड़ा कि जब तक फील्डर गेंद पकड़ते, उसने चार रन दौड़कर पूरे कर लिए। लेकिन बेचारा मोटू हाथी अभी भी आधी पिच पर ही था। सब जानवर हँसने लगे।

अब बारी आई कप्तान कंगू की। कंगू ने आते ही चौकों और छक्कों की बारिश कर दी। वह अपनी पूँछ के सहारे खड़ा होता और ज़ोरदार शॉट लगाता।

उधर फील्डिंग में भी गज़ब हो रहा था। जब कंगू ने हवा में शॉट मारा, तो बाउंड्री पर खड़े 'मोनू बंदर' ने पेड़ की डाली से लटककर कैच पकड़ लिया। शेरू की टीम चिल्लाई, 'आउट! आउट!' लेकिन अंपायर टोटो ने कहा, 'नॉट आउट! पेड़ पर चढ़कर कैच पकड़ना चीटिंग है।'

मैच बहुत रोमांचक हो गया था। आखिरी ओवर में शेरू की टीम को जीतने के लिए 6 गेंदों में 12 रन चाहिए थे। गेंदबाज़ी कर रहा था कंगू। बल्लेबाज़ी पर था 'लंबू जिराफ'।

पहली गेंद पर जिराफ ने अपनी लंबी गर्दन का फायदा उठाया और शॉट मारा, लेकिन गेंद उसकी गर्दन से टकराकर वहीं गिर गई। आखिरी गेंद पर 4 रन चाहिए थे। कंगू ने स्पिन गेंद फेंकी। जिराफ ने ज़ोर से बल्ला घुमाया। गेंद हवा में बहुत ऊँची गई।

सबकी साँसें थम गईं। गेंद बाउंड्री के पार जा रही थी, लेकिन तभी वहाँ 'गोलू भालू' मुँह खोलकर सो रहा था। गेंद सीधे गोलू भालू के खुले मुँह में जा गिरी और फँस गई।

न गेंद बाउंड्री पार गई और न ज़मीन पर गिरी। अंपायर टोटो कछुए ने सर खुजाया। नियम की किताब में ऐसा कुछ नहीं लिखा था। अंत में फैसला हुआ कि मैच 'ड्रा' (बराबर) हो गया है।

सब जानवरों ने खूब ठहाके लगाए। शेरू ने कंगू को गले लगाया और कहा, 'भाई, खेल जो भी हो, मज़ा बहुत आया।' उस दिन के बाद से सुंदरवन में हर रविवार को क्रिकेट मैच खेला जाने लगा, जहाँ बंदर पेड़ से लटक कर तालियाँ बजाते और हाथी अपनी सूँड से पानी छिड़क कर पिच को ठंडा रखता।

सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'खेल में हार-जीत से ज़्यादा ज़रूरी है मिलजुल कर खेलना और मज़े करना। जब हम सब मिलकर कोई काम करते हैं, तो बोरियत ख़त्म हो जाती है और जीवन खुशियों से भर जाता है।'

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