हिंदी दिवस के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह है न्यायिक लेखन में हिंदी के इस्तेमाल को लेकर उनका लंबा और उल्लेखनीय योगदान। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक न्यायमूर्ति गौतम चौधरी अब तक हिंदी भाषा में 38,600 से अधिक निर्णय और आदेश पारित कर चुके हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उच्च न्यायालयों में लंबे समय से न्यायिक कामकाज में अंग्रेजी का व्यापक इस्तेमाल होता रहा है। ऐसे माहौल में बड़ी संख्या में मुकदमों के फैसले और आदेश हिंदी में लिखना अपने आप में अलग तरह का उदाहरण माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश हैं। हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार उनका जन्म 9 नवंबर 1964 को हुआ था और वे बार से न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने 12 दिसंबर 2019 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के पद पर कार्यभार संभाला। आधिकारिक प्रोफाइल में उन्हें बलिया जिले का प्रशासनिक न्यायाधीश भी बताया गया है। उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख 8 नवंबर 2026 दर्ज है।
हिंदी में न्यायिक निर्णय लिखने के मामले में उनका नाम कई वर्षों से सामने आता रहा है। वर्ष 2021 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने अपने लगभग 20 महीने के कार्यकाल में ही हिंदी में 2,200 से अधिक निर्णय दिए थे। उस समय रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि वह प्रतिदिन लगभग 30 से 35 मुकदमों में हिंदी में निर्णय, आदेश या अंतरिम आदेश देते थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि न्यायिक लेखन में हिंदी को अपनाने की उनकी पहल कोई हाल की गतिविधि नहीं है, बल्कि हाईकोर्ट में नियुक्ति के शुरुआती समय से ही इसका हिस्सा रही है।
इसके बाद सितंबर 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार हिंदी में दिए गए उनके फैसलों की संख्या 13,162 तक पहुंच गई थी। उस समय यह रिकॉर्ड उन्होंने लगभग तीन साल आठ महीने के भीतर बनाया था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि न्यायमूर्ति चौधरी प्रतिदिन करीब 50 से 60 मुकदमों में हिंदी में निर्णय देते थे। यानी कुछ ही वर्षों में हिंदी में उनके न्यायिक लेखन का दायरा लगातार बढ़ता गया।
अब उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में यह संख्या 38,600 से अधिक बताई जा रही है। यानी 2023 में सामने आए 13 हजार से ज्यादा हिंदी निर्णयों के बाद भी उन्होंने बड़ी संख्या में मामलों में हिंदी में आदेश और फैसले लिखना जारी रखा। हिंदी में न्यायिक लेखन को लेकर उनकी निरंतरता ही इस उपलब्धि को खास बनाती है।
न्यायमूर्ति गौतम चौधरी के हिंदी में निर्णय लिखने की चर्चा केवल संख्या तक सीमित नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि न्यायिक फैसले आम लोगों के लिए कितने सहज और समझने योग्य हों। अदालतों में आने वाला हर व्यक्ति कानून की जटिल अंग्रेजी शब्दावली से परिचित हो, यह जरूरी नहीं है। ऐसे में किसी मामले में अदालत ने क्या फैसला दिया, किस आधार पर दिया और उसके क्या प्रभाव होंगे, इसे समझने में स्थानीय भाषा में उपलब्ध न्यायिक आदेश मददगार हो सकते हैं।
भारत में न्याय व्यवस्था बहुभाषी समाज के बीच काम करती है। बड़ी संख्या में लोग हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में अपनी बात समझते और व्यक्त करते हैं। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया में भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल आम नागरिक और न्याय व्यवस्था के बीच संवाद को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है। न्यायमूर्ति गौतम चौधरी के फैसलों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाता है।
उनकी हिंदी में न्यायिक लेखन की यात्रा 20 दिसंबर 2019 से विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जाती है। रिपोर्टों के मुताबिक हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने अपना पहला निर्णय हिंदी में दिया था। इसके बाद उन्होंने इस प्रक्रिया को लगातार जारी रखा।
हिंदी में निर्णय लिखना केवल भाषा बदलने का काम नहीं है। न्यायिक फैसलों में कानून की धाराओं, पूर्ववर्ती निर्णयों, तथ्यों, दलीलों और न्यायिक सिद्धांतों को स्पष्ट और सटीक तरीके से प्रस्तुत करना होता है। इसलिए बड़ी संख्या में फैसले हिंदी में लिखने के लिए कानूनी शब्दावली पर मजबूत पकड़ के साथ-साथ भाषा की स्पष्टता भी जरूरी होती है। इसी वजह से न्यायमूर्ति चौधरी का रिकॉर्ड न्यायिक भाषा के संदर्भ में चर्चा का विषय बना है।
उनके न्यायिक कार्यकाल के दौरान कई तरह के मामलों में हिंदी में आदेश और निर्णय दिए गए। वर्ष 2021 की रिपोर्ट में डॉ. कफील खान से जुड़े मामले में उनके हिंदी निर्णय का भी उल्लेख किया गया था। इसके अलावा जमानत याचिकाओं, पुनरीक्षण अर्जियों और अन्य मामलों में भी उनके हिंदी में आदेश दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।
न्यायमूर्ति चौधरी की कार्यशैली का एक और पहलू यह है कि हिंदी में निर्णय देने के बावजूद उन्होंने न्यायिक कार्य की गति को बनाए रखा। 2023 की रिपोर्ट में उनके प्रतिदिन 50 से 60 मामलों में हिंदी में निर्णय देने की बात कही गई थी। यह आंकड़ा उस समय उनके कार्यभार और हिंदी में न्यायिक लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दिखाता था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की प्रोफाइल उपलब्ध है। इसमें उनका जन्म 9 नवंबर 1964 और हाईकोर्ट में प्रारंभिक नियुक्ति 12 दिसंबर 2019 दर्ज है। आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी सेवानिवृत्ति 8 नवंबर 2026 बताई गई है।
उनकी उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में फैसले उपलब्ध कराने को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। न्यायिक संस्थाओं में भाषा का सवाल सिर्फ हिंदी बनाम अंग्रेजी का नहीं है, बल्कि इसका संबंध न्याय तक आम लोगों की पहुंच से भी जुड़ा है। अगर किसी व्यक्ति को अपने मामले में अदालत के आदेश की भाषा समझ आती है तो वह अपने अधिकारों, जिम्मेदारियों और आगे की कानूनी प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ सकता है।
इसी वजह से न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी के 38,600 से अधिक हिंदी निर्णयों को केवल व्यक्तिगत रिकॉर्ड के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह न्यायिक लेखन में भारतीय भाषा के इस्तेमाल का एक उदाहरण भी है। उनकी पहल ने यह दिखाया है कि उच्च न्यायालय स्तर पर भी जटिल कानूनी मामलों के आदेश और निर्णय हिंदी में लिखे जा सकते हैं।
न्यायिक भाषा में एकरूपता और सटीकता का महत्व भी कम नहीं है। कानून की व्याख्या करते समय किसी भी शब्द का अर्थ महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में हिंदी में फैसला लिखने वाले न्यायाधीश को कानूनी अवधारणाओं को इस तरह प्रस्तुत करना होता है कि उनका मूल अर्थ बरकरार रहे और पढ़ने वाला उसे आसानी से समझ भी सके। न्यायमूर्ति चौधरी के लंबे हिंदी न्यायिक लेखन को इसी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उनके बारे में उपलब्ध प्रोफाइल यह भी बताती है कि वे इलाहाबाद हाईकोर्ट में बार से आए न्यायाधीश हैं। 12 दिसंबर 2019 को नियुक्ति के बाद से उन्होंने अदालत में न्यायिक कार्य किया और हिंदी में फैसले देने के कारण उनकी अलग पहचान बनी।
हाल के वर्षों में उनके कई न्यायिक आदेश राष्ट्रीय स्तर पर भी खबरों में रहे हैं। उदाहरण के तौर पर जनवरी 2026 में न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने एक मामले में कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82 के तहत उद्घोषणा जारी हो जाने मात्र से अग्रिम जमानत पर विचार करने पर पूर्ण रोक नहीं लगती। उन्होंने परिस्थितियों को देखते हुए एक नर्स को अग्रिम जमानत प्रदान की थी।
सितंबर 2025 में उन्होंने मुख्तार अंसारी के बेटे उमर अंसारी को एक आपराधिक मामले में जमानत भी दी थी। रिपोर्ट के अनुसार मामला कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज और हस्ताक्षर के इस्तेमाल से जुड़ा था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद उमर अंसारी की रिहाई का रास्ता साफ हुआ था।
हालांकि उनकी पहचान का सबसे प्रमुख पहलू हिंदी में न्यायिक लेखन ही रहा है। 2021 में 2,200 से अधिक, 2023 में 13,162 और अब 38,600 से अधिक हिंदी निर्णयों और आदेशों का आंकड़ा सामने आना बताता है कि यह प्रयास लगातार आगे बढ़ा। उपलब्ध आंकड़ों में समय के साथ अंतर इसलिए भी दिखाई देता है क्योंकि ये अलग-अलग समय पर दर्ज किए गए निर्णयों और आदेशों की संख्या हैं।
न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की यह उपलब्धि हिंदी के न्यायिक इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गई है। अदालत का फैसला तभी प्रभावी रूप से आम नागरिक तक पहुंचता है जब वह उसे समझ सके। ऐसे में न्यायिक भाषा को सरल, स्पष्ट और नागरिकों के करीब लाने की कोशिश न्याय तक पहुंच के बड़े उद्देश्य से जुड़ जाती है।
38,600 से अधिक हिंदी निर्णयों के आंकड़े के साथ न्यायमूर्ति गौतम चौधरी का नाम अब उन न्यायाधीशों में प्रमुखता से लिया जा रहा है जिन्होंने उच्च न्यायालय में हिंदी को न्यायिक लेखन की भाषा के रूप में लगातार इस्तेमाल किया। उनका कार्यकाल यह दिखाता है कि भारतीय भाषाओं में न्यायिक लेखन की संभावनाएं व्यापक हैं और इसे व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।










