कानपुर का ‘मिनी जामताड़ा’: जंगल में बने गुप्त साइबर ठगी अड्डे का खुलासा, 20 गिरफ्तार

उत्तरप्रदेश के कानपूर जिले के 7 गांवों में साइबर ठगी का बड़ा नेटवर्क पकड़ा गया। जंगल में ऑफिस बनाकर ठगी करने वाले 20 आरोपी गिरफ्तार, 100+ नंबर अब भी सक्रिय।

यूपी के कानपूर जिले के 7 गांवों में साइबर ठगों ने जंगल में ठगी का अड्डा बना रखा था। पुलिस ने 3 महीने की जांच के बाद 20 आरोपियों को पकड़ा। गिरोह फर्जी सिम, खातों और सरकारी योजनाओं के नाम पर लोगों को ठगता था।

कानपूर उत्तर प्रदेश के कानपुर से सटे ग्रामीण इलाकों में पुलिस ने एक बड़े साइबर ठगी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसने बीते कई वर्षों से देशभर के लोगों को निशाना बनाया। कानपुर के बाहरी क्षेत्र के सात गांव—रठिगांव, लक्ष्मणपुर, समाज नगर, लीलादास का पुरवा, बढ़ैल, पुलंदर और कैलाशपुर—इन दिनों मिनी जामताड़ा के नाम से चर्चा में हैं। यह उपनाम झारखंड के कुख्यात जामताड़ा जिले की तर्ज पर दिया गया है, जो लंबे समय से साइबर अपराध के लिए बदनाम रहा है।

पुलिस ने करीब तीन महीने की निगरानी, तकनीकी ट्रैकिंग और फील्ड ऑपरेशन के बाद इन गांवों को चारों ओर से घेरकर 20 संदिग्ध साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह गिरोह फर्जी सिम कार्ड, नकली दस्तावेज और जाली बैंक खातों के जरिए देशभर के लोगों से धोखाधड़ी करता था।

कैसे बना ग्रामीण इलाका साइबर अपराध का हब?

कानपुर शहर से लगभग 70 किलोमीटर दूर बसे ये गांव देखने में सामान्य ग्रामीण बस्तियां लगते हैं, लेकिन पुलिस जांच में पता चला कि यहां संगठित तरीके से साइबर ठगी का नेटवर्क संचालित हो रहा था।

गिरोह की कार्यप्रणाली

जांच के अनुसार, आरोपी:

दूसरे लोगों के नाम पर सिम कार्ड खरीदते थे

फर्जी पहचान पत्र बनवाते थे

जाली दस्तावेजों से बैंक खाते खुलवाते थे

सरकारी योजनाओं, लोन, इनाम और OTP के नाम पर लोगों को ठगते थे

गैंग के सदस्य अलग-अलग टीम बनाकर रोज सैकड़ों कॉल करते थे। किसी व्यक्ति के फंसने पर कॉल “सीनियर” के पास ट्रांसफर कर दी जाती थी, जो खुद को बैंक अधिकारी, सरकारी कर्मचारी या योजना प्रभारी बताकर पैसे निकलवाता था।

जंगल में बनाया गया था ‘वर्कप्लेस’

पुलिस जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि साइबर ठगों ने गांवों के बीच घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच एक गुप्त ऑपरेशन सेंटर बना रखा था।

इस ठिकाने की खास बातें:

तीन अस्थायी झोपड़ियां

खाना बनाने के लिए चूल्हा

बड़ी संख्या में डिस्पोजेबल प्लेट और गिलास

बैठने और कॉल करने की जगह

बाहर निगरानी रखने के लिए खुला दृश्य

यह जगह कानपुर देहात जिले की सीमा के बेहद करीब थी, जिससे जरूरत पड़ने पर आरोपी तुरंत जिला सीमा पार कर सकते थे।

स्थानीय किसानों ने बताया कि:

रोज सुबह 50 से ज्यादा युवक आते थे

दिनभर मोबाइल पर बात करते रहते थे

हाथ में नंबर लिखे कागज रखते थे

खाना वहीं बनाते और शाम तक लौट जाते थे

गांव वालों को शक तो था, लेकिन साइबर ठगी जैसे संगठित अपराध का अंदाजा नहीं था।

‘नौकरी’ सिर्फ दिखावा, असली काम था ऑनलाइन ठगी

पुलिस के मुताबिक, इस गैंग की सबसे बड़ी चालाकी यह थी कि इसके सदस्य खुद को बाहर शहरों या दूसरे राज्यों में नौकरी करने वाला बताते थे।

गैंग की रणनीति:

ज्यादातर युवक कपड़ा मिल, फैक्ट्री या मजदूरी का बहाना बनाते

छुट्टी में गांव लौटते

कुछ दिन साइबर ठगी करते

पैसा कमाते ही वापस नौकरी पर चले जाते

इस रणनीति से:

गांव वालों को शक नहीं होता

पुलिस के लिए ट्रैक करना मुश्किल होता

शिकायत आने तक आरोपी फरार हो जाते

पुलिस का कहना है कि यह गिरोह पिछले लगभग पांच साल से सक्रिय था।

गांवों में छाया सन्नाटा, 80% युवा गायब

पुलिस छापेमारी और गिरफ्तारियों के बाद इन गांवों में डर और सन्नाटा पसरा हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार:

कई घरों के दरवाजे बंद हैं

गांवों की सड़कें सुनसान हैं

महिलाएं और बच्चे घरों के भीतर हैं

80% से ज्यादा युवा गांव छोड़ चुके हैं

किसी बाहरी व्यक्ति को देखते ही लोग सतर्क हो जाते हैं। कई परिवार मीडिया और पुलिस से बात करने से बच रहे हैं।

परिजनों का दावा: निर्दोष हैं गिरफ्तार युवक

गिरफ्तार किए गए कई युवकों के परिजनों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उनके बेटे निर्दोष हैं और उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है।

परिवारों के दावे:

कोई कपड़ा मिल में नौकरी करता है

कोई खेती करता है

कोई गेहूं कटाई के लिए गांव आया था

कुछ युवक कथित तौर पर शौच के लिए बाहर गए थे, तभी पकड़े गए

हालांकि पुलिस का कहना है कि तकनीकी सबूत, कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन और मौके से मिले साक्ष्य गिरफ्तारी को मजबूत बनाते हैं।

100 से ज्यादा नंबर अब भी सक्रिय

पुलिस ने ऑपरेशन के दौरान जब्त मोबाइल और डिजिटल डेटा की जांच की। शुरुआती जांच में सामने आया कि:

100 से ज्यादा संदिग्ध मोबाइल नंबर अब भी सक्रिय हैं

17 से ज्यादा आरोपी अभी फरार हैं

फर्जी बैंक खातों की संख्या काफी बड़ी हो सकती है

जांच एजेंसियां अब:

बैंक ट्रेल खंगाल रही हैं

कॉल रिकॉर्ड्स ट्रैक कर रही हैं

अन्य राज्यों की पुलिस से समन्वय कर रही हैं

कम शिक्षा, आसान पैसे का लालच और साइबर अपराध

गिरफ्तार आरोपियों की शैक्षणिक योग्यता भी इस मामले का अहम पहलू है।

पुलिस के अनुसार:

कई आरोपी 5वीं या 8वीं तक पढ़े हैं

कुछ 10वीं पास हैं

तकनीकी रूप से बहुत प्रशिक्षित नहीं थे

फिर भी:

स्क्रिप्टेड कॉलिंग

मनोवैज्ञानिक दबाव

सरकारी योजना का लालच

जैसे तरीकों से वे लोगों को फंसाने में सफल होते थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि कम समय में जल्दी पैसा कमाने की मानसिकता, बेरोजगारी और डिजिटल जागरूकता की कमी ऐसे अपराधों को बढ़ावा देती है।

भारत में साइबर अपराध का बदलता चेहरा

यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराध अब केवल शहरी या तकनीकी केंद्रों तक सीमित नहीं है। छोटे कस्बे और गांव भी अब डिजिटल ठगी के नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं।

इससे क्या सीख मिलती है?

ग्रामीण क्षेत्रों में साइबर जागरूकता बढ़ानी होगी

फर्जी सिम और बैंक खातों पर सख्त निगरानी जरूरी

डिजिटल फ्रॉड रिपोर्टिंग सिस्टम मजबूत करना होगा

स्थानीय पुलिस को साइबर ट्रेनिंग देना जरूरी है

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