यह कहानी एक ऐसे जिद्दी किसान की है जिसकी जमीन बिल्कुल बंजर और पथरीली थी। लोग कहते थे कि वहां घास का एक तिनका भी नहीं उग सकता। लेकिन उस किसान ने हार नहीं मानी। उसने अकेले अपने दम पर, अपनी मेहनत और पसीने से उस सूखी धरती की प्यास बुझाई और उसे हरे-भरे खेत में बदल दिया। यह कहानी साबित करती है कि मेहनत से किस्मत बदली जा सकती है।
मुख्य कहानी
किसी गाँव में रामदीन नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसके हिस्से में पुश्तैनी जमीन का एक टुकड़ा आया था, लेकिन वह गाँव के सबसे सूखे और पथरीले इलाके में था। वहाँ दूर-दूर तक पानी का कोई स्रोत नहीं था। सालों से उस जमीन पर कुछ नहीं उगा था, इसलिए गाँव वाले उस जमीन को 'शापित खेत' कहते थे।
रामदीन का सपना था कि उसकी जमीन पर भी फसल लहलहाए, लेकिन पानी के बिना यह असंभव था। उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह किसी से बोरिंग करवा सके या दूर से पानी ला सके। काफी सोचने के बाद उसने एक दृढ़ निश्चय किया। उसने अपनी पत्नी से कहा, 'मैं अपनी जमीन पर खुद कुआं खोदूंगा।'
जब यह बात गाँव वालों को पता चली, तो उन्होंने रामदीन का मजाक उड़ाया। गाँव के मुखिया ने कहा, 'अरे रामदीन, पागल हो गए हो क्या? उस पथरीली जमीन में कुआं खोदना मतलब पत्थर में सिर फोड़ना है। वहाँ कभी पानी नहीं निकलेगा, अपनी जान मत जोखिम में डालो।'
लेकिन रामदीन ने किसी की नहीं सुनी। अगले दिन सुबह होते ही वह कुदाल और फावड़ा लेकर अपनी बंजर जमीन पर पहुँच गया। उसने एक जगह चुनी और खुदाई शुरू कर दी।
शुरुआत के कुछ दिन बहुत कठिन थे। ऊपर की जमीन सख्त और पथरीली थी। सूरज आग बरसाता था, और रामदीन अकेला पसीना बहाता रहता। उसके हाथों में बड़े-बड़े छाले पड़ गए, कमर टूटने लगी, लेकिन वह रुका नहीं। लोग आते-जाते उस पर फब्तियां कसते, 'देखो, पागल किसान खजाना खोज रहा है।'
हफ्ते महीनों में बदल गए। रामदीन सुबह अंधेरे में काम शुरू करता और रात तक खोदता रहता। गड्ढा गहरा होता गया, दस फीट, बीस फीट, तीस फीट... लेकिन पानी की एक बूंद का नामो-निशान नहीं था। सिर्फ सूखी धूल और पत्थर ही बाहर आ रहे थे।
एक समय ऐसा आया जब रामदीन भी निराश होने लगा। वह गहरे कुएं के तल में बैठकर सोचने लगा, 'क्या गाँव वाले सही थे? क्या मेरी मेहनत बेकार जाएगी?' उसका शरीर जवाब दे रहा था। लेकिन तभी उसे अपने परिवार का संघर्ष और अपनी बंजर जमीन की प्यास याद आई। उसने खुद से कहा, 'नहीं, मैं हार नहीं मान सकता। जब तक पानी नहीं निकलेगा, मैं खोदता रहूँगा।'
उसने अपनी बची-खुची ताकत जुटाई और फिर से कुदाल उठाई।
एक दिन दोपहर में, जब वह पूरी ताकत से कुदाल चला रहा था, तभी 'टन' की तेज आवाज आई और उसकी कुदाल एक गीली चट्टान से टकराई। उसने झुककर देखा। वहाँ से एक पतली सी गीली लकीर फूट रही थी।
उसका दिल जोर से धड़का। उसने तेजी से आसपास की मिट्टी हटाई। देखते ही देखते वहाँ से पानी की एक तेज धार फूट पड़ी। ठंडा, साफ पानी!
रामदीन की आँखों से आँसू बह निकले। वह कुएं के अंदर से ही पागलों की तरह चिल्लाया, 'पानी! मिल गया पानी!'
उसकी महीनों की तपस्या सफल हुई थी। कुछ ही घंटों में कुआं पानी से आधा भर गया। यह खबर जंगल की आग की तरह गाँव में फैल गई। जो लोग उसका मजाक उड़ाते थे, वे सब दौड़कर यह चमत्कार देखने आए।
रामदीन ने उस कुएं के पानी से अपनी बंजर जमीन की सिंचाई की। उसने रात-दिन मेहनत करके खेत तैयार किया और बीज बोए। कुएं के अमृत समान पानी और किसान के पसीने ने मिलकर जादू कर दिया। कुछ ही महीनों बाद, वह 'शापित खेत' हरी-भरी फसलों से लहलहा उठा। रामदीन ने अपनी मेहनत से असंभव को संभव कर दिखाया था।
सीख
यह कहानी हमें सिखाती है कि 'दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत के आगे बंजर किस्मत भी हार मान लेती है।'
परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों और दुनिया चाहे कितना भी कहे कि 'यह नहीं हो सकता', यदि इंसान ठान ले और बिना रुके प्रयास करता रहे, तो वह अपनी मेहनत से अपनी बंजर तकदीर को भी हरा-भरा कर सकता है। सफलता उन्हीं को मिलती है जो पसीना बहाने से नहीं डरते।













