किशाऊ बांध पर छह राज्यों के बीच MoU, हिमाचल को बिना निवेश हर साल 600 करोड़ की आय; 17 साल से अटका प्रोजेक्ट

किशाऊ बांध परियोजना पर दिल्ली में छह राज्यों के बीच MoU हुआ। हिमाचल CM सुक्खू ने बिना निवेश सालाना 600 करोड़ आय की बात कही, 17 साल पुराना प्रोजेक्ट आगे बढ़ेगा।
किशाऊ बांध पर छह राज्यों के बीच MoU, हिमाचल को बिना निवेश हर साल 600 करोड़ की आय; 17 साल से अटका प्रोजेक्ट
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नई दिल्ली/शिमला। हिमाचल प्रदेश के लिए लंबे समय से अटकी किशाऊ बांध परियोजना को लेकर बड़ी प्रगति हुई है। दिल्ली में छह राज्यों और केंद्र के बीच परियोजना को आगे बढ़ाने को लेकर समझौता हुआ है। करीब 17 वर्षों से विभिन्न कारणों से लंबित चल रही इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अब दोबारा गति मिलने की उम्मीद जगी है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने परियोजना को प्रदेश के लिए आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हिमाचल को इस परियोजना में प्रत्यक्ष निवेश किए बिना हर साल करीब 600 करोड़ रुपये की आय हो सकती है।

किशाऊ बांध परियोजना यमुना नदी पर प्रस्तावित है और इसका संबंध हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड से है। लंबे समय से यह परियोजना राज्यों के बीच लागत, पानी के हिस्से और अन्य संबंधित मुद्दों के कारण आगे नहीं बढ़ पा रही थी। अब दिल्ली में हुई बैठक के बाद परियोजना को लेकर राज्यों के बीच सहमति बनने का रास्ता साफ हुआ है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक बैठक में पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश से जुड़े हितधारकों के बीच परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।

इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत हिमाचल प्रदेश पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ है। रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार उठाएगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि संबंधित राज्यों द्वारा वहन की जाएगी। हिमाचल के लिए यह व्यवस्था इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि उसके हिस्से में आने वाले पानी को दूसरे राज्यों, विशेषकर दिल्ली और राजस्थान की जरूरतों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इसी कारण हिमाचल को परियोजना की लागत में अपनी हिस्सेदारी नहीं देनी होगी और प्रदेश को बिना बड़े वित्तीय निवेश के आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के मुताबिक किशाऊ बांध से हिमाचल प्रदेश को हर साल करीब 600 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है। सरकार इसे प्रदेश की वित्तीय स्थिति के लिए महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देख रही है। खास बात यह है कि राज्य को परियोजना में बड़ी रकम लगाने के बजाय अपने हिस्से के जल लाभ के बदले आर्थिक लाभ प्राप्त होगा। ऐसे में किशाऊ परियोजना हिमाचल के लिए केवल जल संसाधन से जुड़ी योजना नहीं बल्कि राजस्व का एक संभावित बड़ा स्रोत भी बन सकती है।

किशाऊ परियोजना को लेकर सबसे बड़ी समस्या इसके लंबे समय तक अटके रहने की रही है। लगभग 17 साल से यह प्रोजेक्ट विभिन्न स्तरों पर चर्चा और प्रक्रियाओं में आगे-पीछे होता रहा। राज्यों के बीच सहमति नहीं बनने, लागत और पानी के बंटवारे जैसे मुद्दों के कारण परियोजना धरातल पर गति नहीं पकड़ सकी। अब नई सहमति के बाद उम्मीद है कि लंबे समय से लंबित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जा सकेगा और परियोजना के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

किशाऊ बांध को लेकर होने वाला यह समझौता केवल हिमाचल के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। दिल्ली सहित उन राज्यों के लिए भी यह परियोजना अहम है जिन्हें भविष्य में जल आपूर्ति और जल भंडारण के लिहाज से इसका लाभ मिलने की उम्मीद है। देश की राजधानी दिल्ली में लगातार बढ़ती आबादी और पानी की मांग के बीच अतिरिक्त जल संसाधनों की जरूरत बनी हुई है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्र की नदियों पर आधारित बड़ी जल परियोजनाओं को लंबे समय की जल सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी देखा जाता है।

हिमाचल के नजरिए से देखें तो मुख्यमंत्री की ओर से 600 करोड़ रुपये सालाना आय का अनुमान परियोजना के आर्थिक पक्ष को मजबूत करता है। राज्य सरकार के सामने सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की चुनौती रहती है। यदि किशाऊ बांध से बिना बड़े निवेश के हर साल इतनी आय प्राप्त होती है तो इसका उपयोग राज्य के विकास और अन्य जनकल्याणकारी कार्यों में किया जा सकता है। हालांकि वास्तविक राजस्व और भुगतान की व्यवस्था परियोजना के अंतिम समझौते और उसके क्रियान्वयन के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

परियोजना की लागत को लेकर भी इस बार बनी व्यवस्था महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार की ओर से 90 प्रतिशत खर्च उठाए जाने की बात सामने आई है। बाकी 10 प्रतिशत राशि राज्यों के बीच तय व्यवस्था के अनुसार वहन की जानी है। हिमाचल को इस हिस्से से बाहर रखने का निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे प्रदेश के ऊपर किसी बड़े अतिरिक्त वित्तीय बोझ की संभावना कम होगी।

किशाऊ बांध के निर्माण से जुड़े मुद्दों में जल बंटवारा भी हमेशा प्रमुख रहा है। नदी जल पर आधारित किसी भी बड़ी अंतरराज्यीय परियोजना में अलग-अलग राज्यों की जरूरतों और हिस्सेदारी को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं होता। यही वजह है कि परियोजना लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाई। अब छह राज्यों और केंद्र के स्तर पर बनी सहमति से इस जटिल प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का आधार तैयार हुआ है।

हिमाचल सरकार के लिए यह समझौता इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य को अपनी ओर से बड़ी रकम खर्च किए बिना परियोजना से आर्थिक लाभ मिलने की संभावना बन रही है। मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसे प्रदेश के हित में बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा है। सरकार का मानना है कि लंबे समय से अटकी परियोजना के आगे बढ़ने से हिमाचल को भविष्य में स्थायी आर्थिक लाभ मिल सकता है।

किशाऊ परियोजना को लेकर अब अगली चुनौती इसके समझौते को जमीन पर उतारने की होगी। MoU के बाद संबंधित विभागों को विस्तृत तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाना होगा। बांध निर्माण जैसी बड़ी परियोजना में भूमि, पर्यावरण, पुनर्वास, निर्माण और जल प्रबंधन से जुड़े कई स्तरों पर काम करना पड़ता है। इसलिए समझौते के बाद भी परियोजना के वास्तविक निर्माण तक कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।

17 साल से अटके इस प्रोजेक्ट को लेकर अब हिमाचल में उम्मीद इसलिए बढ़ी है क्योंकि पहली बार आर्थिक हिस्सेदारी और परियोजना की लागत के मुद्दे पर ऐसी व्यवस्था सामने आई है, जिससे प्रदेश को सीधे वित्तीय लाभ दिखाई दे रहा है। यदि तय व्यवस्था के अनुसार परियोजना आगे बढ़ती है तो हिमाचल के लिए यह लंबे समय तक आय देने वाली परियोजना बन सकती है।

वहीं, परियोजना से जुड़े दूसरे राज्यों के लिए भी इसका महत्व कम नहीं है। जल भंडारण और आपूर्ति की बढ़ती जरूरतों के बीच बड़े बांधों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। किशाऊ बांध के माध्यम से पानी का नियोजित उपयोग, भंडारण और विभिन्न राज्यों तक इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने की योजना लंबे समय में जल प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है।

इस पूरी परियोजना में केंद्र सरकार की भूमिका भी अहम रहेगी। 90 प्रतिशत लागत केंद्र द्वारा उठाए जाने की व्यवस्था से राज्यों पर वित्तीय दबाव कम होगा और परियोजना को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि परियोजना की वास्तविक प्रगति अब आगे होने वाली तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी।

हिमाचल सरकार की ओर से इसे प्रदेश के लिए आर्थिक लाभ वाली योजना बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री के अनुसार, यदि हिमाचल को बिना निवेश हर साल करीब 600 करोड़ रुपये मिलते हैं तो इससे राज्य के लिए एक स्थायी आय का स्रोत तैयार हो सकता है। यही वजह है कि सरकार 17 साल से लंबित परियोजना को आगे बढ़ने को महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रही है।

अब सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि दिल्ली में हुए MoU के बाद परियोजना की अगली प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है। इतने लंबे समय से लंबित परियोजना के कारण स्थानीय स्तर पर भी इसके पूरा होने का इंतजार रहा है। यदि अब राज्यों और केंद्र के बीच बनी सहमति कायम रहती है और आवश्यक मंजूरियां समय पर मिलती हैं तो किशाऊ बांध परियोजना आने वाले वर्षों में निर्माण के चरण तक पहुंच सकती है।

फिलहाल दिल्ली में हुए समझौते ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर वर्षों से चली आ रही अनिश्चितता को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। हिमाचल के लिए सबसे बड़ा फायदा यह माना जा रहा है कि प्रदेश को परियोजना में बड़ा वित्तीय निवेश किए बिना सालाना करीब 600 करोड़ रुपये की आय मिलने की संभावना है। वहीं, केंद्र की ओर से 90 प्रतिशत लागत उठाने की व्यवस्था से परियोजना को वित्तीय आधार मिलने की उम्मीद है। अब 17 साल से रुके इस प्रोजेक्ट की असली परीक्षा उसके क्रियान्वयन में होगी।

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