कोटा जिले में PWD के 15 लाख रुपये गबन मामले में ATO विनय सक्सेना की भूमिका जांच के घेरे में है। उन पर फर्जी चालान काटने, अनधिकृत निरीक्षण करने और ठेकेदारों को धमकाने के आरोप लगे हैं। कई शिकायतों के बावजूद कार्रवाई में देरी पर सवाल उठ रहे हैं।
कोटा: राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) के कोटा स्थित क्वालिटी कंट्रोल विभाग में कथित 15 लाख रुपये के गबन मामले ने नया मोड़ ले लिया है। वित्तीय अनियमितताओं की जांच के दौरान विभाग के एक सहायक परीक्षण अधिकारी (Assistant Testing Officer - ATO) पर गंभीर आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों में बिना अनुमति निरीक्षण करना, ठेकेदारों पर दबाव बनाना, सामग्री के नमूनों को असफल घोषित करने की धमकी देना, कथित रूप से फर्जी चालान जारी करना तथा अन्य प्रशासनिक अनियमितताएं शामिल हैं।
मामले ने केवल विभागीय कार्यप्रणाली ही नहीं, बल्कि शिकायतों की जांच प्रक्रिया और जवाबदेही तंत्र पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोपों और शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक कार्रवाई न होने के दावों ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है।
वित्तीय गड़बड़ियों की जांच के दौरान सामने आए नए आरोप
मामले की शुरुआत विभाग में कथित रूप से 15 लाख रुपये के गबन की जांच से हुई थी। जांच के दौरान अधिकारियों को कई ऐसी शिकायतें मिलीं, जिनमें विभागीय प्रक्रियाओं के उल्लंघन और पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए।
शिकायतों के अनुसार संबंधित अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने कई मामलों में निर्धारित प्रशासनिक अनुमति के बिना निर्माण स्थलों का निरीक्षण किया। कुछ शिकायतकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि निरीक्षण के दौरान ठेकेदारों को कथित रूप से धमकाया गया और निर्माण सामग्री के नमूनों को अस्वीकार करने का दबाव बनाया गया।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और मामले की जांच जारी है।
शिकायतों का लंबा इतिहास
उपलब्ध शिकायतों के अनुसार, संबंधित अधिकारी के खिलाफ पिछले दो वर्षों में विभिन्न स्तरों पर कई शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। इनमें अनधिकृत निरीक्षण, भुगतान से जुड़ी कथित अनियमितताएं, पदोन्नति से संबंधित विवाद और दस्तावेजों के उपयोग में गड़बड़ियों जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
कुछ शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इन मामलों को संबंधित विभागीय अधिकारियों के समक्ष उठाया गया, लेकिन लंबे समय तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। इससे विभाग के भीतर पारदर्शिता और शिकायत निवारण प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी विभाग में यदि शिकायतों का समय पर समाधान नहीं किया जाता, तो इससे प्रशासनिक विश्वास और जवाबदेही दोनों प्रभावित होते हैं।
जांच समिति के गठन पर भी उठे प्रश्न
मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने अप्रैल 2026 में एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। समिति को निर्धारित समय सीमा के भीतर शिकायतों की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि आरोप है कि समिति लंबे समय तक सक्रिय रूप से जांच नहीं कर सकी और निर्धारित अवधि के भीतर अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। इस कारण स्थानीय स्तर पर एक नई जांच समिति गठित की गई, जिसे अब मामले की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि जांच में देरी होने से जनता के बीच संदेह पैदा होता है और संस्थागत विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
ठेकेदारों ने लगाए दबाव और धमकी के आरोप
कुछ ठेकेदारों द्वारा दर्ज शिकायतों में दावा किया गया है कि निर्माण परियोजनाओं के निरीक्षण के दौरान उन्हें कथित रूप से दबाव का सामना करना पड़ा। शिकायतों में आरोप लगाया गया कि विभागीय प्रक्रिया का पालन किए बिना निरीक्षण किए गए और सामग्री परीक्षण से संबंधित कार्रवाई की धमकी दी गई।
कुछ मामलों में यह भी आरोप लगाया गया कि गुणवत्ता जांच के परिणामों को प्रभावित करने के लिए अनुचित दबाव डाला गया। हालांकि इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करता है, तो यह प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है। लेकिन ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष केवल आधिकारिक जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए।

दस्तावेजों और तकनीकी प्रक्रियाओं पर भी सवाल
शिकायतों में कुछ तकनीकी प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में दस्तावेजों के उपयोग और तकनीकी अनुमोदनों से संबंधित प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
हालांकि विभाग की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष जारी नहीं किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि सभी शिकायतों की निष्पक्ष जांच की जाएगी और तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
विभाग ने निष्पक्ष जांच का दिया आश्वासन
PWD के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है और जांच पूरी तरह निष्पक्ष होगी। विभागीय सूत्रों के अनुसार, जांच समिति को सभी शिकायतों, दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर अनियमितता या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
विभाग का कहना है कि सार्वजनिक परियोजनाओं में गुणवत्ता और पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता है तथा किसी भी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता की बढ़ती जरूरत
यह मामला केवल एक विभागीय विवाद नहीं माना जा रहा, बल्कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यापक बहस से भी जुड़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक धन से संचालित परियोजनाओं में निगरानी तंत्र मजबूत होना आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके।
साथ ही शिकायतों की समयबद्ध जांच और निष्पक्ष कार्रवाई प्रशासनिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
जांच रिपोर्ट का इंतजार
फिलहाल पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा। विभागीय अधिकारियों, ठेकेदारों और शिकायतकर्ताओं के बयानों के आधार पर जांच आगे बढ़ रही है।
राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग से जुड़े इस मामले पर अब सभी की नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी है। यदि आरोप साबित होते हैं तो यह मामला विभागीय सुधार और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो संबंधित अधिकारियों को भी अपना पक्ष स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा।












