कर्नाटक के कोडागु में 2018 बाढ़ का दर्द अब भी बरकरार: 7 साल बाद भी 140 परिवार पुनर्वास का इंतजार कर रहे

कोडागु की 2018 बाढ़ के सात साल बाद भी कुशलनगर के करीब 140 परिवार पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। सरकारी योजनाएं अधूरी हैं और लोग हर मानसून में खतरे में रहते हैं

कर्नाटक के कोडागु जिले में 2018 की विनाशकारी बाढ़ के सात साल बाद भी कुशलनगर के करीब 140 परिवार पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं सरकार की योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पाईं जिससे लोग हर मानसून में असुरक्षित जीवन जीने मजबूर

 कोडागु: कर्नाटक के कोडागु जिले में साल 2018 की विनाशकारी बाढ़ को सात साल बीत चुके हैं, लेकिन इसका असर आज भी सैकड़ों परिवारों की जिंदगी पर साफ दिखाई देता है। कुशलनगर तालुक के कई गांवों के लगभग 140 परिवार अब भी स्थायी पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं और हर आने वाला मानसून उनके लिए एक नई चुनौती और डर लेकर आता है।

कावेरी नदी के किनारे बसे ये परिवार हर साल बारिश शुरू होते ही अस्थायी आश्रयों की तलाश में मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि उनके घर या तो पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुके हैं या फिर बाढ़ के खतरे में रहते हैं।

2018 की भीषण बाढ़ ने उजाड़ दी थी सैकड़ों जिंदगियां

साल 2018 में कोडागु जिले में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने कई गांवों को भारी नुकसान पहुंचाया था। सिद्धापुर, नेल्लीहुडिकेरी, कराडीगोडु, कुम्बरागुंडी और नालवत्तेकरे जैसे इलाकों में दर्जनों परिवार अपने घरों से बेघर हो गए थे।

उस समय सरकार ने राहत और पुनर्वास के कई वादे किए थे और प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की योजना बनाई गई थी। लेकिन वर्षों बाद भी इन वादों का पूरा होना अब तक अधूरा है।

पुनर्वास की योजना बनी, लेकिन जमीन और घर अब भी दूर

राज्य सरकार ने बाढ़ प्रभावित लगभग 140 परिवारों के पुनर्वास के लिए अब्याथमंगल गांव के पास लगभग सात एकड़ भूमि चिन्हित की थी। इस योजना का उद्देश्य था कि नदी किनारे असुरक्षित क्षेत्रों में रह रहे लोगों को सुरक्षित स्थान पर स्थायी आवास उपलब्ध कराया जाए।

इस घोषणा के बाद प्रभावित परिवारों में उम्मीद जगी थी कि उन्हें जल्द ही नया घर मिलेगा और उनकी जीवन स्थितियों में सुधार होगा। लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार, आज तक न तो भूमि आवंटन हुआ है और न ही आवास निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

हर साल मानसून बन जाता है डर का मौसम

कावेरी नदी के किनारे रहने वाले परिवारों के लिए मानसून का मौसम अब खुशी नहीं बल्कि भय का प्रतीक बन चुका है। बारिश शुरू होते ही पानी का स्तर बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे लोगों को अपने घर छोड़कर अस्थायी आश्रयों में जाना पड़ता है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर साल इसी तरह उनका जीवन प्रभावित होता है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं मिला है।

बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों का कहना है कि हर मानसून में उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। कई परिवारों को घर छोड़ने के कारण बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है।

एक स्थानीय निवासी रुक्मिणी ने बताया कि हर साल बारिश के दौरान उन्हें अपने घर छोड़कर दूसरी जगह शरण लेनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि जब तक वे लौटते हैं, तब तक घरों को या तो नुकसान हो चुका होता है या वे रहने योग्य नहीं रहते।

प्रशासनिक देरी और समन्वय की कमी पर सवाल

स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि पुनर्वास परियोजना में लगातार देरी प्रशासनिक लापरवाही और विभागों के बीच समन्वय की कमी का परिणाम है।

ग्राम पंचायत सदस्य रज़ाक ने कहा कि कई प्रभावित परिवार पिछले चार दशकों से इसी क्षेत्र में रह रहे हैं और उन्हें अब तक सुरक्षित पुनर्वास मिल जाना चाहिए था। उन्होंने सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

नोटिस जारी होने की आशंका से बढ़ी चिंता

स्थानीय प्रशासन की ओर से यह भी संकेत मिले हैं कि सुरक्षा कारणों से नदी किनारे बसे परिवारों को हटाने के लिए नोटिस जारी किए जा सकते हैं। इस संभावना ने प्रभावित लोगों की चिंता और बढ़ा दी है, क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई वैकल्पिक स्थान नहीं है।

लोगों का कहना है कि अगर उन्हें यहां से हटाया गया, तो वे पूरी तरह बेघर हो जाएंगे।

मौसम विभाग की चेतावनी ने बढ़ाई चिंता

मौसम विभाग ने इस साल सामान्य से अधिक बारिश की संभावना जताई है, जिससे बाढ़ का खतरा फिर बढ़ सकता है। इस पूर्वानुमान ने पहले से ही असुरक्षित स्थिति में रह रहे परिवारों की चिंता और गहरा दी है।

स्थानीय लोगों को डर है कि अगर इस बार भी समय रहते पुनर्वास नहीं हुआ, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

सात साल बाद भी अधूरा वादा, सवालों के घेरे में व्यवस्था

2018 की आपदा के बाद शुरू हुई पुनर्वास योजना आज भी अधूरी है, जिससे सरकारी व्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। प्रभावित परिवारों का कहना है कि बार-बार आश्वासन दिए जाने के बावजूद जमीन और घर का इंतजाम नहीं हो सका है।

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