पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन को लेकर अटकलें और मतभेद तेज हो गए हैं। पंजाब भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि फरवरी 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले ही सूबे में भाजपा-शिअद का गठबंधन घोषित कर दिया जाए।
चंडीगढ़: पंजाब की राजनीति में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। 2020 में किसान आंदोलन के दौरान टूटे इस पुराने सियासी रिश्ते के दोबारा जुड़ने की अटकलों ने पंजाब के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
जहां भाजपा के एक धड़े का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अकाली दल के साथ गठजोड़ जरूरी है, वहीं पार्टी का दूसरा धड़ा इस विचार का खुलकर विरोध कर रहा है। ऐसे में अब इस मुद्दे पर अंतिम फैसला भाजपा हाईकमान के हाथ में माना जा रहा है।
भाजपा के भीतर दो राय, हाईकमान के पाले में फैसला
पंजाब भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह तथा प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ खुले तौर पर अकाली दल के साथ गठबंधन की वकालत कर चुके हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह का कहना है कि मौजूदा सियासी परिस्थितियों में शिअद के बिना भाजपा के लिए न सिर्फ 2027 बल्कि 2032 तक भी राज्य में सत्ता हासिल करना बेहद मुश्किल है।
सुनील जाखड़ भी कई मंचों से यह कह चुके हैं कि पंजाब के ग्रामीण इलाकों में अकाली दल की पकड़ अब भी मजबूत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में भाजपा का जनाधार बढ़ रहा है। ऐसे में दोनों दलों का गठबंधन एक-दूसरे की ताकत को पूरक बना सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि कैप्टन और जाखड़ दोनों ही पहले कांग्रेस से जुड़े रहे हैं और बाद में भाजपा में शामिल हुए। अब वे अपने अनुभव के आधार पर भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को यह समझाने में जुटे हैं कि शिअद के सहयोग से ही पंजाब में सत्ता का रास्ता आसान हो सकता है।
भाजपा का दूसरा धड़ा अकेले चुनाव के पक्ष में
दूसरी ओर, भाजपा के भीतर एक मजबूत वर्ग ऐसा भी है जो अकेले दम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर जोर दे रहा है। इस धड़े में केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष अश्वनी शर्मा और कई पुराने भाजपाई नेता शामिल हैं। हाल ही में चंडीगढ़ स्थित भाजपा प्रदेश मुख्यालय में हुई एक बैठक में अश्वनी शर्मा ने स्पष्ट किया कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी और फिलहाल अकाली दल से गठजोड़ का कोई प्रस्ताव नहीं है।
रवनीत बिट्टू का भी कहना है कि पंजाब में भाजपा का जनाधार लगातार बढ़ रहा है और अब पार्टी को किसी सहयोगी के सहारे की जरूरत नहीं है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, इस मसले पर जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा और अंतिम निर्णय भाजपा हाईकमान ही करेगा।
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शिअद की बदली स्थिति और गठबंधन की मजबूरी
शिरोमणि अकाली दल एक समय पंजाब की राजनीति में बेहद प्रभावशाली शक्ति रहा है। 1969 के बाद से दल ने पंथक राजनीति और ग्रामीण समर्थन के आधार पर राज्य में अब तक सात बार सरकार बनाई है। हालांकि, हालिया वर्षों में शिअद को लगातार सियासी झटके लगे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी महज तीन सीटों पर सिमट गई थी।
इसके बाद शिअद अंदरूनी कलह और टूट-फूट का शिकार हो गया। हाल ही में पार्टी के भीतर विभाजन के बाद एक नया संगठन ’शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत)’ भी सामने आ चुका है। ऐसे हालात में शिअद के लिए भाजपा के साथ गठबंधन राजनीतिक मजबूरी बनता जा रहा है ताकि वह दोबारा प्रासंगिक भूमिका में लौट सके।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में बढ़ी बेचैनी
भाजपा-शिअद संभावित गठबंधन की चर्चाओं से राज्य की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) और विपक्षी कांग्रेस में साफ बेचैनी दिखाई दे रही है। हाल ही में पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अकाली-भाजपा शासन के 2007 से 2017 के कार्यकाल पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता उस दौर को देख चुकी है और अब फिर से उसी शासन को स्वीकार नहीं करेगी।
वहीं, कांग्रेस विधायक और एआईसीसी सचिव परगट सिंह ने भी भाजपा-अकाली गठबंधन की संभावना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों दलों की विचारधाराएं एक-दूसरे से अलग हैं। उनके अनुसार, भाजपा केंद्रीयकरण की नीति पर चलती है जबकि शिअद एक क्षेत्रीय दल है, ऐसे में दोनों का तालमेल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।
2027 चुनाव से पहले अहम होगा भाजपा का फैसला
पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात अभी से बिछनी शुरू हो चुकी है। भाजपा जहां राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है, वहीं शिअद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए नए राजनीतिक विकल्प तलाश रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा अपने पुराने सहयोगी अकाली दल के साथ फिर से राजनीतिक रिश्ता जोड़ेगी या पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने का जोखिम उठाएगी। इस फैसले पर न केवल राज्य की सत्ता की तस्वीर, बल्कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की चुनावी रणनीति भी निर्भर करेगी।
फिलहाल सियासी संकेत यही बता रहे हैं कि BJP-SAD गठबंधन की संभावनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन अंतिम निर्णय भाजपा हाईकमान की रणनीति और 2024 लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरणों पर टिकेगा।










