बच्चे नहीं हो रहे थे, स्नान करते ही चमत्कार हुआ’ लोलार्क कुंड पहुंचे लाखों श्रद्धालु, बोलेnइसके आगे IVF भी फेल

लोलार्क कुंड में संतान की कामना से लाखों श्रद्धालु पहुंचे। जानिए धार्मिक मान्यता क्या कहती है और बांझपन, IVF व गर्भधारण पर विशेषज्ञ विज्ञान क्या कहता है।
बच्चे नहीं हो रहे थे, स्नान करते ही चमत्कार हुआ’ लोलार्क कुंड पहुंचे लाखों श्रद्धालु, बोलेnइसके आगे IVF भी फेल
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वाराणसी के भदैनी इलाके में स्थित ऐतिहासिक लोलार्क कुंड एक बार फिर लोलार्क षष्ठी के अवसर पर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना। संतान प्राप्ति की कामना लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में दंपती यहां पहुंचे और कुंड में आस्था की डुबकी लगाई। 17 सितंबर को मनाए गए लोलार्क षष्ठी पर्व के दौरान कुंड और उसके आसपास की गलियों में भारी भीड़ दिखाई दी। अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में श्रद्धालुओं की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। अमर उजाला ने करीब दो लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की बात कही, जबकि कुछ रिपोर्टों में भीड़ इससे अधिक बताई गई है। इसलिए पांच लाख की संख्या को पुष्ट आंकड़े के रूप में नहीं माना जा सकता।

लोलार्क कुंड में स्नान की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन यहां विधि-विधान से स्नान और पूजा करने से संतान की इच्छा पूरी होती है। इसी विश्वास के कारण बड़ी संख्या में ऐसे दंपती यहां पहुंचते हैं, जिनके यहां लंबे समय से संतान नहीं हुई है। कई दंपती ऐसे भी होते हैं जो पहले यहां मनोकामना लेकर आए थे और बाद में संतान होने के बाद धन्यवाद देने दोबारा कुंड पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, लोलार्क कुंड का धार्मिक महत्व विशेष रूप से संतान सुख की कामना से जुड़ा हुआ है।

इस साल भी लोलार्क षष्ठी से पहले ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। रिपोर्टों के अनुसार, बुधवार की रात से ही कुंड में स्नान शुरू हो गया था और गुरुवार को बड़ी संख्या में दंपती स्नान के लिए पहुंचे। कुंड के आसपास कई किलोमीटर लंबी कतारें लगीं। श्रद्धालुओं के लिए बैरिकेडिंग की गई थी और प्रशासन ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग रास्तों पर व्यवस्था की थी। कुछ लोग रातभर कतार में बैठे रहे ताकि सुबह के शुभ समय में स्नान कर सकें।

श्रद्धालुओं की धार्मिक मान्यता में लोलार्क कुंड को विशेष स्थान प्राप्त है। परंपरा के अनुसार दंपती कुंड में एक साथ तीन बार डुबकी लगाते हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना की जाती है। कुछ परंपराओं में स्नान के बाद किसी फल या सब्जी को छोड़ने की बात भी कही जाती है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसे मनोकामना से जोड़कर देखा जाता है। इस पर्व के दौरान आसपास के बाजार और गलियां भी श्रद्धालुओं से भर जाती हैं।

लोलार्क कुंड की मान्यता केवल वाराणसी तक सीमित नहीं है। रिपोर्टों में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश के दूसरे हिस्सों से भी दंपती यहां पहुंचते हैं। इस बार भी अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालुओं के आने की जानकारी सामने आई। कई परिवारों के लिए यह धार्मिक यात्रा केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होती, बल्कि वे इसे संतान की कामना से जुड़ी विशेष धार्मिक साधना के रूप में देखते हैं।

कई श्रद्धालु अपने अनुभव भी बताते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक इलाज कराया, लेकिन संतान नहीं हुई और लोलार्क कुंड में स्नान के बाद उन्हें संतान सुख मिला। इसी तरह की व्यक्तिगत कहानियां हर साल इस पर्व के दौरान सुनने को मिलती हैं। लेकिन किसी व्यक्ति के स्नान के बाद गर्भधारण होने की घटना को केवल स्नान का चिकित्सकीय परिणाम मान लेना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। गर्भधारण कई जैविक और चिकित्सकीय कारकों पर निर्भर करता है और कभी-कभी बिना किसी स्पष्ट चिकित्सा हस्तक्षेप के भी गर्भधारण हो सकता है।

यही वह बिंदु है जहां धार्मिक आस्था और आधुनिक चिकित्सा के बीच अंतर समझना जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बांझपन या इनफर्टिलिटी पुरुष, महिला या दोनों से जुड़े कई कारणों से हो सकती है। महिलाओं में फैलोपियन ट्यूब की समस्या, गर्भाशय संबंधी विकार, एंडोमेट्रियोसिस, ओव्यूलेशन से जुड़ी परेशानी और हार्मोन संबंधी कारण हो सकते हैं। पुरुषों में कम या अनुपस्थित शुक्राणु, शुक्राणुओं की गतिशीलता या गुणवत्ता की समस्या और प्रजनन मार्ग में रुकावट जैसे कारण हो सकते हैं। कुछ मामलों में जांच के बाद भी स्पष्ट कारण नहीं मिल पाता।

इसलिए यदि किसी दंपती को लंबे समय से गर्भधारण नहीं हो रहा है तो केवल धार्मिक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय जांच भी जरूरी है। अमेरिकन सोसाइटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में 35 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में 12 महीने तक नियमित असुरक्षित संबंध के बावजूद गर्भधारण न होने पर फर्टिलिटी मूल्यांकन शुरू किया जाना चाहिए। 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र में छह महीने के बाद जांच की सलाह दी जाती है, जबकि 40 वर्ष से अधिक उम्र में मूल्यांकन को और जल्दी शुरू किया जा सकता है।

फर्टिलिटी जांच केवल महिला की जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विशेषज्ञ दिशानिर्देशों में पुरुष साथी की समानांतर जांच की भी बात कही गई है। इसमें मेडिकल हिस्ट्री, प्रजनन इतिहास और जरूरत के अनुसार वीर्य की जांच समेत अन्य परीक्षण शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि गर्भधारण में बाधा किस स्तर पर आ रही है और उसके अनुसार उपचार तय किया जा सके।

अब सवाल आता है कि क्या लोलार्क कुंड का स्नान IVF से बेहतर या प्रभावी साबित हो सकता है? उपलब्ध चिकित्सा प्रमाणों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन एक स्थापित सहायक प्रजनन तकनीक है, जिसमें अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचन के लिए इस्तेमाल किया जाता है और विकसित भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। हालांकि IVF भी हर प्रयास में गर्भधारण या सफल प्रसव की गारंटी नहीं देता।

अमेरिकन सोसाइटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन के अनुसार IVF प्रक्रिया में भी हर अंडाणु निषेचित नहीं होता और हर निषेचित अंडाणु आगे विकसित होकर ऐसा भ्रूण नहीं बनता जिसे गर्भाशय में स्थानांतरित किया जा सके। इसी तरह हर भ्रूण गर्भाशय में सफलतापूर्वक इंप्लांट भी नहीं होता। इसलिए IVF को भी निश्चित सफलता की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता।

इसका अर्थ यह भी नहीं है कि लोलार्क कुंड में स्नान करने वाले लोगों की आस्था को गलत कहा जाए। धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत अनुभव अलग विषय हैं। कोई दंपती किसी धार्मिक परंपरा को मानसिक संबल, उम्मीद या आध्यात्मिक विश्वास के रूप में अपनाता है तो यह उसका निजी विश्वास है। लेकिन जब बात बांझपन के इलाज या किसी चिकित्सा पद्धति की प्रभावशीलता की होती है, तब वैज्ञानिक प्रमाणों को आधार बनाना जरूरी होता है।

लोलार्क कुंड से जुड़ी धार्मिक कथाएं भी इसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण हैं। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, लोलार्क कुंड के संबंध में सूर्यदेव से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य की किरणें कुंड के जल पर विशेष रूप से पड़ती हैं। लोलार्क नाम का संबंध भी सूर्य से माना जाता है। इसी वजह से लोलार्क षष्ठी पर स्नान और सूर्य पूजा का धार्मिक महत्व बताया जाता है।

लोलार्क कुंड के बारे में अलग-अलग धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुछ परंपराओं में इसे सूर्य उपासना से जोड़ा जाता है, जबकि स्थानीय धार्मिक साहित्य और कथाओं में इसके जल और कुंड की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए कुंड से जुड़े धार्मिक विश्वासों को आस्था और परंपरा के संदर्भ में ही देखना उचित है।

इस बार लोलार्क षष्ठी पर सुरक्षा को लेकर भी प्रशासन काफी सक्रिय रहा। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग की गई, प्रवेश और निकास के रास्तों को व्यवस्थित किया गया तथा पुलिस बल की तैनाती की गई। पुलिस आयुक्त ने भी व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया था। कई किलोमीटर तक कतार लगने के कारण प्रशासन के लिए भीड़ को सुरक्षित तरीके से कुंड तक पहुंचाना और वापस निकालना बड़ी चुनौती रहा।

श्रद्धालुओं के अनुभवों में एक समान बात दिखाई देती है—उम्मीद। जिन दंपतियों को लंबे समय से संतान नहीं हुई, उनके लिए यह धार्मिक आयोजन भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। कुछ दंपती वर्षों से इलाज कराने के बाद भी जब परिणाम नहीं पाते तो धार्मिक स्थलों की ओर रुख करते हैं। ऐसे में लोलार्क कुंड उनके लिए एक विश्वास का केंद्र बन जाता है। यही कारण है कि हजारों परिवार हर साल यहां पहुंचते हैं और कई लोग मनोकामना पूरी होने का दावा भी करते हैं।

लेकिन विशेषज्ञ दृष्टिकोण से किसी एक घटना को कारण और परिणाम के रूप में स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होती है। यदि किसी महिला ने कुंड में स्नान करने के बाद गर्भधारण किया, तो इसके पीछे उसी अवधि में हुए प्राकृतिक गर्भधारण, उपचार, ओव्यूलेशन में बदलाव, पहले से चल रही चिकित्सा प्रक्रिया या अन्य जैविक कारण हो सकते हैं। केवल समय का क्रम यह साबित नहीं करता कि स्नान ही गर्भधारण का कारण था।

इसी तरह “इसके आगे IVF भी फेल” जैसी बात व्यक्तिगत अनुभव या सोशल मीडिया की भाषा हो सकती है, लेकिन इसे चिकित्सा तथ्य के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। IVF की सफलता कई कारकों पर निर्भर करती है, जिनमें उम्र, अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता, भ्रूण की स्थिति तथा अन्य प्रजनन संबंधी परिस्थितियां शामिल होती हैं। ASRM के अनुसार IVF में भी कई चरणों पर सफलता प्रभावित हो सकती है और हर प्रयास का परिणाम एक जैसा नहीं होता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बताता है कि बांझपन एक सामान्य प्रजनन स्वास्थ्य समस्या है और दुनिया भर में प्रजनन आयु के लगभग हर छह में से एक व्यक्ति को जीवन में किसी समय इसका अनुभव हो सकता है। ऐसे में इस समस्या को केवल महिला से जोड़ना भी सही नहीं है। पुरुष और महिला दोनों में कारण हो सकते हैं और कुछ मामलों में कारण स्पष्ट नहीं हो पाता।

इसलिए लोलार्क कुंड की कहानी को दो अलग नजरियों से समझना बेहतर होगा। धार्मिक नजरिए से यह सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और संतान की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, जहां हर साल बड़ी संख्या में दंपती स्नान और पूजा के लिए पहुंचते हैं। वहीं चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से गर्भधारण एक जटिल जैविक प्रक्रिया है और लंबे समय तक गर्भधारण न होने पर उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है।

इस बार भी लोलार्क षष्ठी के दौरान काशी में आस्था का बड़ा दृश्य देखने को मिला। रात से कतारों में खड़े दंपतियों ने शुभ मुहूर्त में कुंड में स्नान किया। कई लोगों ने अपनी मनोकामना और पुराने अनुभव साझा किए। कुछ ऐसे परिवार भी पहुंचे जिनका दावा था कि पहले की मनोकामना पूरी होने के बाद वे दोबारा धन्यवाद देने आए हैं।

लोलार्क कुंड में उमड़ी भीड़ यह बताती है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के बावजूद धार्मिक आस्था आज भी लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। संतान की इच्छा जैसी संवेदनशील स्थिति में उम्मीद का भाव और भी मजबूत हो जाता है। हालांकि ऐसी स्थिति में धार्मिक विश्वास के साथ-साथ उचित चिकित्सा सलाह लेना भी जरूरी है, ताकि यदि कोई उपचार योग्य कारण मौजूद हो तो उसका समय रहते पता लगाया जा सके।

इसलिए “स्नान करते ही चमत्कार” जैसी कहानियां श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत अनुभव के रूप में सामने आ सकती हैं, लेकिन इन्हें चिकित्सा प्रमाण नहीं माना जा सकता। वहीं “IVF फेल” होने का मतलब यह भी नहीं कि आगे कोई विकल्प नहीं है। बांझपन के कारण और उपचार व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और प्रजनन चिकित्सा विशेषज्ञों के दिशानिर्देशों के अनुसार सही जांच के बाद उपचार का विकल्प तय किया जाना चाहिए।

लोलार्क कुंड की धार्मिक परंपरा अपनी जगह है और आधुनिक फर्टिलिटी उपचार अपनी जगह। आस्था किसी व्यक्ति को उम्मीद और मानसिक सहारा दे सकती है, जबकि चिकित्सा जांच किसी संभावित जैविक कारण की पहचान और उपचार का रास्ता दिखाती है। इसलिए संतान की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए वैज्ञानिक चिकित्सा सलाह को नजरअंदाज न करना सबसे महत्वपूर्ण बात है।

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