लखनऊ में सीएचसी और पीएचसी में बॉन्ड के तहत तैनात डॉक्टरों का समान काम-समान वेतन की मांग को लेकर आंदोलन एक बार फिर तेज हो गया है। प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के आवास पहुंचकर अपनी मांग दोहराई। डॉक्टरों का कहना है कि शासन स्तर से कई बार आश्वासन मिलने के बावजूद उनकी मांग के संबंध में स्पष्ट शासनादेश जारी नहीं किया गया है। इसी वजह से डॉक्टरों में नाराजगी है और उन्होंने अपना आंदोलन आगे बढ़ाने का फैसला किया है। हाल के दिनों में डॉक्टर गांधी प्रतिमा के सामने धरना और भूख हड़ताल भी शुरू कर चुके हैं।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के अनुसार वे अनिवार्य सेवा बॉन्ड के तहत सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि सीएचसी और पीएचसी में तैनाती के दौरान उन्हें ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करानी पड़ती हैं, लेकिन उनके वेतन और भत्तों में दूसरे बॉन्डेड डॉक्टरों की तुलना में अंतर बना हुआ है। डॉक्टर इसी वेतन विसंगति को समाप्त करने और समान काम के लिए समान वेतन लागू करने की मांग कर रहे हैं।
मामला उस समय चर्चा में आया था जब 2 सितंबर को उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलन कर रहे डॉक्टरों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनी थीं। उस दौरान उन्होंने राजकीय मेडिकल कॉलेजों में अनिवार्य सेवा बॉन्ड के तहत तैनात डॉक्टरों को पीएचसी, सीएचसी और एनएचएम योजनाओं में कार्यरत डॉक्टरों के बराबर वेतन देने की घोषणा की थी। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने शासनादेश जल्द जारी होने का आश्वासन भी दिया था। सरकार की ओर से बताए गए फैसले से करीब 1,800 डॉक्टरों को लाभ मिलने की बात कही गई थी।
डॉक्टरों का कहना है कि आश्वासन के बाद उन्हें उम्मीद थी कि उनकी मांग को लेकर औपचारिक शासनादेश जारी हो जाएगा और वेतन संबंधी विसंगति खत्म हो जाएगी। लेकिन निर्धारित समय के बाद भी आदेश जारी नहीं होने पर डॉक्टरों ने फिर से आंदोलन का रास्ता अपनाया। उनका कहना है कि वे लंबे समय से इस मुद्दे को शासन के सामने उठा रहे हैं और करीब 14 महीने से अधिकार की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।
डॉक्टरों के अनुसार सीएचसी और पीएचसी में बॉन्ड के तहत तैनात चिकित्सकों को वर्तमान में मिलने वाला वेतन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बॉन्ड पर काम करने वाले डॉक्टरों और समान स्तर का काम करने वाले अन्य चिकित्सकों की तुलना में कम है। प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने समान वेतन के रूप में करीब 1.20 लाख रुपये मासिक भुगतान की मांग रखी है। उनका कहना है कि जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद वेतन में बड़ा अंतर बनाए रखना उनके लिए आर्थिक और पेशेवर दोनों स्तर पर परेशानी का कारण है।
सितंबर की शुरुआत में डॉक्टरों ने अपनी मांग को लेकर महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण कार्यालय के बाहर भी प्रदर्शन किया था। आंदोलन में सरकारी मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले और अनिवार्य सेवा बॉन्ड के तहत तैनात डॉक्टर शामिल रहे। डॉक्टरों की शिकायत है कि बॉन्ड की शर्तों के तहत सेवा करना उनके लिए अनिवार्य है और सेवा पूरी नहीं करने की स्थिति में बॉन्ड की राशि से जुड़ी शर्तें लागू होती हैं, लेकिन सेवा के दौरान वेतन और सुविधाओं में समानता नहीं है।
इसके बाद डॉक्टरों ने डिप्टी सीएम के आवास और सचिवालय पहुंचकर अधिकारियों के सामने अपनी मांग रखी। डॉक्टरों का कहना है कि उन्होंने शासन स्तर पर अपनी बात कई बार रखी है। आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन कुछ समय के लिए रोका भी गया, लेकिन जब शासनादेश जारी नहीं हुआ तो डॉक्टर फिर से प्रदर्शन पर बैठ गए। 19 सितंबर से गांधी प्रतिमा के सामने धरना और भूख हड़ताल शुरू होने की रिपोर्ट सामने आई है।
गांधी प्रतिमा के सामने चल रहे आंदोलन में कुछ डॉक्टरों ने भूख हड़ताल भी शुरू की है। 20 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे दिन भी भूख हड़ताल जारी रही। इस दौरान कुछ डॉक्टरों की तबीयत बिगड़ने की आशंका को देखते हुए मौके पर स्वास्थ्य जांच कराई गई थी, हालांकि जांच में सभी की रिपोर्ट सामान्य पाई गई।
डॉक्टरों का कहना है कि उनका आंदोलन किसी एक दिन की मांग नहीं है, बल्कि वे लंबे समय से वेतन विसंगति दूर करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में तैनाती के दौरान वे मरीजों को सेवाएं दे रहे हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे में उनके अनुसार समान जिम्मेदारी निभाने वाले डॉक्टरों के बीच वेतन का अंतर समाप्त होना चाहिए।
रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने यह भी कहा है कि सीएचसी और पीएचसी में तैनात बॉन्डेड डॉक्टरों को कई बार सीमित संसाधनों के बीच काम करना पड़ता है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की जिम्मेदारी मरीजों की शुरुआती जांच, उपचार, आपात स्थिति में प्राथमिक चिकित्सा और जरूरत पड़ने पर मरीजों को बड़े अस्पताल तक रेफर करने की होती है। डॉक्टर इसी कार्यभार को अपनी समान वेतन की मांग का आधार बता रहे हैं।
दूसरी ओर, सरकार की ओर से 2 सितंबर को बॉन्ड पर तैनात डॉक्टरों की वेतन विसंगति दूर करने की घोषणा की जा चुकी है। उपमुख्यमंत्री ने उस समय संबंधित अधिकारियों से बात कर आवश्यक निर्देश दिए थे। हालांकि प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि घोषणा और आश्वासन के बाद भी जब तक औपचारिक शासनादेश जारी नहीं होता, तब तक उनकी मांग पूरी नहीं मानी जा सकती।
डॉक्टरों के दोबारा आंदोलन शुरू करने के बाद अब सबसे बड़ा मुद्दा शासनादेश जारी होने का है। डॉक्टर चाहते हैं कि सरकार अपने आश्वासन को औपचारिक आदेश में बदले, जिससे वेतनमान और भुगतान को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सके। डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ आश्वासन से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा और वे आदेश जारी होने तक आंदोलन जारी रखेंगे।
इस आंदोलन का असर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भी चर्चा का विषय बन रहा है, क्योंकि आंदोलन में सीएचसी और पीएचसी में सेवा देने वाले चिकित्सक शामिल हैं। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में इस प्रदर्शन के कारण कितनी स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है। फिलहाल डॉक्टरों का मुख्य फोकस अपनी वेतन संबंधी मांग को शासन तक पहुंचाना और लंबित आदेश जारी करवाना है।
डॉक्टरों ने कहा है कि वे कई स्तरों पर अपनी बात रख चुके हैं। डिप्टी सीएम के आवास से लेकर सचिवालय और धरना स्थल तक उन्होंने अधिकारियों का ध्यान अपनी मांग की ओर आकर्षित किया है। आंदोलनकारियों के मुताबिक जब तक समान काम के लिए समान वेतन को लेकर स्पष्ट आदेश नहीं आता, तब तक आंदोलन समाप्त करने पर निर्णय लेना मुश्किल होगा।
फिलहाल लखनऊ में बॉन्डेड डॉक्टरों का प्रदर्शन जारी है। डॉक्टरों की ओर से समान वेतन और वेतन विसंगति खत्म करने की मांग रखी जा रही है, जबकि सरकार की ओर से पहले ही इस संबंध में वेतन समान करने की घोषणा की जा चुकी है। अब डॉक्टरों की नजर औपचारिक शासनादेश पर है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से आदेश जारी होने या डॉक्टरों के साथ आगे की बातचीत के बाद आंदोलन की दिशा स्पष्ट हो सकती है।











