मेरठ में शुक्रवार को आयोजित खिलाड़ी संवाद गोष्ठी में Mohan Bhagwat ने हिंदू समाज की एकता और संघ के उद्देश्यों को पूरी तरह समझने पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बंधुत्व की भावना से ही समाज में जातिवाद, भेदभाव और असमानता को दूर किया जा सकता है।
मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू समाज की एकता, सामाजिक समरसता और संगठन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि “बंधुत्व की भावना से ही समाज में मौजूद भेदभाव, असमानता और जातिवाद को समाप्त किया जा सकता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को संगठित और राष्ट्र को मजबूत बनाना है।
हिंदू समाज की एकता पर जोर
मेरठ के शताब्दीनगर स्थित माधवकुंज में आयोजित खिलाड़ी संवाद कार्यक्रम में लगभग 950 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से बातचीत करते हुए भागवत ने कहा कि संघ की 100 वर्षों की यात्रा का मूल उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना रहा है। उन्होंने कहा कि संघ केवल अपना नाम आगे बढ़ाने के लिए कार्य नहीं करता, बल्कि देश का नाम ऊंचा करना उसका लक्ष्य है।
उन्होंने कहा कि समाज में जब-जब एकता खंडित हुई, तब-तब राष्ट्र संकट में पड़ा। विविध पूजा पद्धतियों और परंपराओं के बावजूद भारतीय समाज की शक्ति उसकी एकता में है। भागवत के अनुसार, “हिंदू कोई जाति नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विशेषण है, जो इस भूमि की परंपराओं और मूल्यों से जुड़ा है।”
यूजीसी मुद्दे पर रहे मौन
कार्यक्रम के दौरान जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े प्रश्न उठे, तो सरसंघचालक ने इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने अपना ध्यान सामाजिक एकता और संगठनात्मक कार्यों पर केंद्रित रखा। भागवत ने कहा कि संघ किसी वर्ग, समुदाय या संगठन के विरोध में कार्य नहीं करता। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज का संगठन है। स्वयंसेवक आज शिक्षा, खेल, उद्योग, सेवा और सामाजिक कार्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्वों की सांस्कृतिक विरासत से निर्मित राष्ट्र है। भारत की पहचान उसकी सनातन संस्कृति, धर्मभाव और सत्य के आदर्शों से होती है।
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संघ से जुड़ने के पांच मंत्र
संघ प्रमुख ने संघ से जुड़ने के इच्छुक लोगों के लिए पांच महत्वपूर्ण सुझाव दिए:
- संघ के कार्यक्रमों में भाग लें – संघ को समझने के लिए उसके कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर किसी दायित्व का निर्वहन करें।
- अनुषांगिक संगठनों से जुड़ें – संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों के माध्यम से समाज सेवा करें।
- कार्यक्रमों में सहयोग करें – किसी भी रूप में संघ के आयोजनों में सहयोग देना भी सहभागिता का माध्यम है।
- संवाद बनाए रखें – अपने पेशे या कार्य के साथ-साथ संघ के स्वयंसेवकों और गतिविधियों से जुड़े रहें।
- निस्वार्थ भाव से देश सेवा करें – प्रमाणिकता और समर्पण के साथ राष्ट्रहित में कार्य करना ही स्वयंसेवक की भावना है, चाहे औपचारिक रूप से संघ से जुड़े हों या नहीं।
भागवत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से देश के लिए कार्य करता है, तो संघ उसे स्वयंसेवक मानता है। संवाद कार्यक्रम में खिलाड़ियों ने संगठन की भूमिका, समाज में समरसता और युवा शक्ति के योगदान जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे। भागवत ने कहा कि केवल खेल या राजनीति के दृष्टिकोण से संघ को नहीं समझा जा सकता। संघ की कार्यप्रणाली को समझने के लिए उसके भीतर आकर अनुभव करना आवश्यक है।









