मिडिल ईस्ट तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के करीब पहुंच गई हैं। इससे शेयर बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है और निवेशकों में चिंता का माहौल है। विशेषज्ञों के अनुसार निफ्टी में गिरावट की आशंका है।
Stock Market Outlook: शेयर बाजार में इन दिनों अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। इस स्थिति ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है और बाजार में गिरावट की आशंका भी तेज हो गई है।
सोमवार सुबह जब कई निवेशकों ने अपना पोर्टफोलियो देखा तो अधिकतर शेयर लाल निशान में नजर आए। वैश्विक तनाव और महंगे तेल की खबरों ने निवेशकों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बाजार में अभी और गिरावट आ सकती है।
ब्रोकरेज फर्म एमके की ताजा रिपोर्ट भी इस चिंता को रेखांकित करती है। रिपोर्ट के अनुसार अगर खाड़ी क्षेत्र में तनाव बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें 3 से 4 महीने तक 100 डॉलर के आसपास रहती हैं तो इसका असर सिर्फ शेयर बाजार पर नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।
खाड़ी संकट से बढ़ी कच्चे तेल की कीमत
रिपोर्ट के अनुसार ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। इसका सबसे बड़ा असर होर्मुज स्ट्रेट पर दिखाई दे रहा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है।
इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के आसपास बनी हुई हैं।
पहले बाजार को उम्मीद थी कि हालात जल्द सामान्य हो जाएंगे, लेकिन फिलहाल ऐसे संकेत नहीं मिल रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर अचानक युद्धविराम हो जाता है तो तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है और बाजार को राहत मिल सकती है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर असर
भारत के लिए यह स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिए है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
रिपोर्ट के अनुसार अगर तेल महंगा बना रहता है तो देश में महंगाई बढ़ सकती है। इसके साथ ही चालू खाता घाटा भी बढ़ने की संभावना रहती है।
तेल की ऊंची कीमतों से कंपनियों की लागत बढ़ जाती है और इसका असर उनकी कमाई पर पड़ता है। इससे उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है और उपभोक्ताओं तक इसका असर पहुंच सकता है।
गैस सप्लाई पर भी असर
खाड़ी क्षेत्र में तनाव का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। होर्मुज क्षेत्र में रुकावट के कारण गैस सप्लाई पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
एलपीजी की उपलब्धता प्रभावित होने से कई उद्योगों को आने वाले हफ्तों में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने घरेलू सप्लाई को बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए हैं ताकि आम उपभोक्ताओं को ज्यादा परेशानी न हो।
फिर भी उद्योग और थोक उपभोक्ता अगले कुछ समय तक गैस की सीमित उपलब्धता का असर महसूस कर सकते हैं।
रुपये और बॉन्ड बाजार पर दबाव
अगर खाड़ी संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर मुद्रा बाजार पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और यह डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है।
अनुमान है कि ऐसी स्थिति में रुपया 95 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है। इसके साथ ही बॉन्ड बाजार में भी अस्थिरता बढ़ सकती है और बॉन्ड यील्ड में वृद्धि देखने को मिल सकती है।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों के बाजार से पैसा निकालने का खतरा भी बढ़ सकता है। फिलहाल भारतीय रिजर्व बैंक के कदमों के कारण स्थिति संतुलित बनी हुई है, लेकिन लंबे समय तक दबाव बने रहने पर चुनौती बढ़ सकती है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अगर खाड़ी क्षेत्र में युद्ध लंबा चलता है तो इसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऊंची ऊर्जा कीमतों के कारण दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है। इसके साथ ही मांग में कमजोरी और निवेश में कमी देखने को मिल सकती है।
ऐसी स्थिति में वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। यहां तक कि अगर युद्ध समाप्त भी हो जाता है तो ऊर्जा सप्लाई को सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं।
शेयर बाजार में और गिरावट का खतरा
ब्रोकरेज रिपोर्ट के अनुसार अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो भारतीय शेयर बाजार में और गिरावट आ सकती है। अनुमान है कि निफ्टी में करीब 10 प्रतिशत तक गिरावट संभव है और यह 21,000 के स्तर तक आ सकता है।
इसका मुख्य कारण यह है कि महंगे तेल से कंपनियों की लागत बढ़ती है और मांग भी कमजोर हो सकती है। इससे कंपनियों की कमाई पर दोहरा दबाव पड़ता है और निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित होता है।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा ज्यादा असर
तेल की कीमतों में तेजी का असर अलग अलग सेक्टरों पर अलग तरीके से पड़ता है। कुछ सेक्टर ऐसे हैं जिन पर इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है।
ऑयल कंपनियां, एयरलाइंस, ऑटो और यूटिलिटी सेक्टर आमतौर पर महंगे तेल से ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि इनके संचालन में ऊर्जा लागत का हिस्सा अधिक होता है।
इसके विपरीत कुछ सेक्टर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकते हैं। टेक्नोलॉजी, फार्मा, मेटल और पावर सेक्टर पर तेल की कीमतों का सीधा असर कम होता है, इसलिए इन क्षेत्रों के शेयर अपेक्षाकृत स्थिर रह सकते हैं।
गिरावट में भी दिख रहा निवेश का मौका
हालांकि बाजार में डर का माहौल है, लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ शेयरों में गिरावट जरूरत से ज्यादा हो चुकी है। ब्रोकरेज के अनुसार कुछ मजबूत कंपनियों के शेयरों में मौजूदा स्तर पर निवेश के अवसर बन सकते हैं। इनमें HDFC Bank, Bajaj Finserv, Max Healthcare और Eternal जैसे शेयर शामिल हैं।









