सुप्रीम कोर्ट में आज मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई होगी। राहुल गांधी समेत 11 विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। आयोग ने हलफनामा दाखिल कर आरोपों को खारिज किया है।
नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहा कानूनी विवाद मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए आएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ चुनाव आयोग के फैसलों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर विचार करेगी। सुनवाई से पहले चुनाव आयोग ने अदालत में अपना जवाब दाखिल कर कहा है कि SIR से जुड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे।
राहुल गांधी समेत 11 नेताओं ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत 11 विपक्षी नेताओं ने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल की थी। इसमें चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में नाम जोड़ने तथा हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, शिवसेना उद्धव गुट के संजय राउत, सीपीएम के एमए बेबी और सीपीआई के डी. राजा शामिल हैं।
इसके अलावा झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माझी, एनसीपी शरद पवार गुट की सुप्रिया सुले और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ईटी मोहम्मद बशीर भी याचिका में शामिल हैं। इन नेताओं ने अदालत से चुनाव आयोग के विवादित फैसलों से जुड़ी फाइलें और रिकॉर्ड मंगाने की मांग की है। याचिका में SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध भी किया गया है।
चुनाव आयोग ने हलफनामे में क्या कहा?
सुनवाई से एक दिन पहले सोमवार, 26 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया। आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अकेले फैसले लेने के आरोपों से इनकार किया है। आयोग के मुताबिक, 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी SIR संबंधी आदेश तीनों सदस्यों की सहमति से मंजूर किए गए थे।
हलफनामे में बताया गया कि सामान्य परिस्थितियों में फाइलें दोनों चुनाव आयुक्तों से होकर मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंचती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जाती है, जिसे बाद में फाइल में दर्ज किया जाता है। चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि संबंधित याचिका के आरोप मुख्य रूप से एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित हैं। आयोग ने इन्हें पर्याप्त आधार नहीं मानते हुए याचिका खारिज करने की मांग की है।
Form 6 में बदलाव के आरोपों पर आयोग की सफाई
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विपक्ष ने मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में बदलाव को लेकर भी सवाल उठाए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि इस फॉर्म में कोई कानूनी संशोधन नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, SIR के दौरान मांगा जाने वाला अतिरिक्त घोषणा पत्र Form 6 से अलग है। इसका मकसद आवेदकों या उनके परिवार के सदस्यों की जानकारी का पुरानी मतदाता सूचियों से मिलान करना है।
आयोग ने माना कि ऑनलाइन आवेदन में दोनों दस्तावेजों को दिखाने के तरीके से भ्रम पैदा हो सकता था। इसी कारण 21 अक्टूबर से ऑनलाइन प्रक्रिया में दोनों को अलग रखने का फैसला किया गया।
जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड नहीं मिला, उनका क्या होगा?
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड पुरानी सूची से नहीं जुड़ पाया है, उन्हें सामान्य तौर पर व्यक्तिगत सुनवाई के लिए कार्यालय बुलाने की जरूरत नहीं होगी। ऐसे मतदाताओं के घर जाकर बूथ लेवल अधिकारी जरूरी दस्तावेज जुटाएंगे। विशेष परिस्थितियों में ही सुनवाई होगी और संभव होने पर ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल किया जाएगा। आयोग ने यह भी कहा कि निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम सूची में जोड़ा या हटाया नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में किन मुद्दों पर रहेगी नजर?
सुप्रीम कोर्ट में आज SIR से जुड़े कई मामलों पर एक साथ सुनवाई निर्धारित है। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका, चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची से नाम हटाने के नियम प्रमुख मुद्दे हैं। विपक्ष चुनाव आयोग के फैसलों की कानूनी जांच चाहता है, जबकि आयोग ने अपनी प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया है।
अदालत के सामने अब दोनों पक्षों के तर्क रखे जाएंगे। सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि विवादित फैसलों की आगे किस तरह जांच होगी और मतदाता सूची से संबंधित याचिकाओं पर अदालत क्या निर्देश देती है।









