कभी चौका-बर्तन में बीतता था समय, अब उद्यमी बन बदल रहीं गांव की तकदीर एक साल में 105 लोगों को दिया रोजगार

मुजफ्फरपुर की कुसुम देवी ने जीविका से जुड़कर कारोबार शुरू किया। 24 मशीनों से शुरू कंपनी में अब 105 मशीनें हैं और 105 लोगों को रोजगार मिल रहा है।
कभी चौका-बर्तन में बीतता था समय, अब उद्यमी बन बदल रहीं गांव की तकदीर एक साल में 105 लोगों को दिया रोजगार
Photo Credit / Attribution: Google

मुजफ्फरपुर। गांव की महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह कई बार घर की चारदीवारी से शुरू होती है। परिवार की जिम्मेदारियों, घरेलू कामकाज और सीमित संसाधनों के बीच कई महिलाएं अपने सपनों को आगे नहीं बढ़ा पातीं। लेकिन मुजफ्फरपुर की कुसुम देवी ने इस स्थिति को बदलने की कोशिश की और आज वह खुद के कारोबार के साथ दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का जरिया बन चुकी हैं। कभी जिनका अधिकांश समय घर के चौका-बर्तन और घरेलू जिम्मेदारियों में बीतता था, वही कुसुम देवी अब एक कंपनी चला रही हैं और उनके उद्यम से 89 महिलाएं तथा 16 पुरुष रोजगार पा रहे हैं।

डुमरी मझौली खेतल की रहने वाली कुसुम देवी की यह यात्रा अचानक शुरू नहीं हुई। वह करीब 10 वर्षों से जीविका से जुड़ी हुई हैं। जीविका से जुड़ने के बाद उन्हें स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों और स्वरोजगार की संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। धीरे-धीरे उनके भीतर भी अपना काम शुरू करने की इच्छा मजबूत हुई। परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपने लिए एक नई राह तलाशनी शुरू की और आखिरकार पिछले वर्ष जीविका से ऋण लेकर कारोबार की शुरुआत की।

कुसुम देवी ने कुखु स्काई पैकर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नाम से अपनी कंपनी स्थापित की। कारोबार की शुरुआत बड़े निवेश या बड़ी मशीनरी से नहीं हुई थी। उन्होंने सबसे पहले 24 सिलाई मशीनें खरीदीं और बैग तथा महिलाओं के परिधान तैयार करने का काम शुरू किया। शुरुआती दौर में उत्पादन का काम संभालने के लिए उन्होंने कुछ महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। यही छोटा कदम आगे चलकर बड़े रोजगार केंद्र में बदलता चला गया।

एक वर्ष के भीतर कारोबार का विस्तार इतनी तेजी से हुआ कि 24 सिलाई मशीनों से शुरू हुई इकाई में मशीनों की संख्या बढ़कर 105 हो गई। इसके साथ ही काम करने वाले लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ी। वर्तमान में कुसुम देवी के उद्यम में 89 महिलाएं और 16 पुरुष काम कर रहे हैं। यानी एक महिला ने अपना कारोबार शुरू किया और देखते ही देखते उनके साथ 105 लोगों की रोजी-रोटी का जुड़ाव हो गया।

इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की भागीदारी है। 105 कर्मचारियों में 89 महिलाएं हैं। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होना उनके आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। इससे उन्हें काम के लिए दूर शहरों में जाने की आवश्यकता कम होती है और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ रोजगार का संतुलन बनाना भी अपेक्षाकृत आसान होता है।

कुसुम देवी के उद्यम में अब केवल सामान्य सिलाई का काम नहीं हो रहा है। उनकी कंपनी आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के लिए ड्रेस तैयार करने का काम भी कर रही है। इससे उनके कारोबार को एक व्यवस्थित बाजार मिला है और उत्पादन के साथ रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। सिलाई मशीनों की संख्या बढ़ने के साथ उत्पादन क्षमता में भी विस्तार हुआ है।

कुसुम देवी की कहानी का एक अहम हिस्सा यह है कि उन्होंने शुरुआत छोटे स्तर से की और कारोबार को धीरे-धीरे बढ़ाया। 24 मशीनों से शुरू हुए काम में एक वर्ष के भीतर 105 मशीनें लगना बताता है कि ग्रामीण क्षेत्र में भी उद्यम के लिए बाजार और अवसर मौजूद हैं। जरूरत केवल इस बात की है कि इच्छुक लोगों को शुरुआती पूंजी, प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन मिल सके।

उनके कारोबार का वित्तीय प्रदर्शन भी इस विस्तार की तस्वीर सामने रखता है। रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2026 तक कंपनी का टर्नओवर करीब 46 लाख रुपये रहा। इसी अवधि में कंपनी को करीब 6.40 लाख रुपये का मुनाफा हुआ। यानी एक वर्ष पहले छोटे स्तर पर शुरू हुआ उद्यम अब लाखों रुपये के कारोबार तक पहुंच चुका है।

कुसुम देवी के लिए कारोबार शुरू करना सिर्फ व्यक्तिगत कमाई का माध्यम नहीं है। उनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का सृजन करना और अधिक से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में सक्षम बनाना है। वह चाहती हैं कि गांव की महिलाएं केवल घरेलू काम तक सीमित न रहें, बल्कि अपनी क्षमता के अनुसार व्यवसाय और रोजगार के क्षेत्र में भी आगे बढ़ें।

ग्रामीण महिलाओं के लिए इस तरह के उद्यम इसलिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। जब किसी गांव में ही सिलाई, कपड़ा निर्माण, बैग तैयार करने या अन्य उत्पादन का काम शुरू होता है तो उससे कई परिवार सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े सकते हैं। मशीन चलाने वाले कर्मचारियों के अलावा पैकिंग, कच्चे माल की व्यवस्था, परिवहन और तैयार उत्पाद की आपूर्ति जैसे कामों से भी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

कुसुम देवी का उद्यम भी इसी तरह धीरे-धीरे विस्तार की दिशा में बढ़ रहा है। शुरुआत में सिर्फ 24 मशीनों के साथ काम शुरू हुआ था, लेकिन अब 105 मशीनों तक पहुंच चुका है। कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या अधिक होना इस उद्यम की खास विशेषता है। इससे आसपास की महिलाओं को अपने घर के करीब ही काम करने का अवसर मिला है।

कुसुम देवी करीब एक दशक से जीविका से जुड़ी हुई हैं। इस लंबे जुड़ाव ने उन्हें समूह आधारित आर्थिक गतिविधियों से परिचित कराया। जब उन्होंने खुद उद्यम शुरू करने का फैसला किया तो जीविका से मिले ऋण का इस्तेमाल शुरुआती मशीनें खरीदने में किया। इस तरह समूह से जुड़ने और छोटे स्तर पर आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने का अनुभव आगे चलकर उनके अपने कारोबार की नींव बना।

उनकी सफलता को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर भी इसे ग्रामीण महिला उद्यमिता की एक मिसाल के रूप में देखा गया। कंपनी की स्थापना के एक वर्ष पूरे होने पर कुसुम देवी के विशेष अनुरोध पर मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी कुमार गौरव वहां पहुंचे और उन्हें शुभकामनाएं दीं। इस दौरान उन्होंने कंपनी की गतिविधियों और वहां हो रहे काम को देखा।

जिलाधिकारी ने कुसुम देवी के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि दूरदर्शी सोच, दृढ़ संकल्प और लगातार मेहनत के माध्यम से उन्होंने उद्यमिता की प्रेरणादायक मिसाल कायम की है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने के महत्व पर भी जोर दिया। कार्यक्रम के दौरान जीविका की डीपीएम अनीशा, पश्चिमी अनुमंडल की एसडीएम स्नेहा कुमारी, संचार प्रबंधक राजीव रंजन समेत अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

कुसुम देवी के कारोबार की शुरुआत जिस स्थिति से हुई थी और आज यह जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसके बीच का सफर ग्रामीण महिला उद्यमिता के बदलते स्वरूप को दिखाता है। पहले घर के कामकाज में व्यस्त रहने वाली महिला ने जब अपने लिए आर्थिक गतिविधि का रास्ता चुना तो शुरुआत में सिर्फ 24 मशीनें थीं। आज उसी काम में 105 मशीनें हैं और 105 लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

इस बदलाव का असर केवल कुसुम देवी के परिवार तक सीमित नहीं है। उनके साथ काम करने वाली 89 महिलाओं के परिवार भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। इन महिलाओं के लिए रोजगार का मतलब अपनी आमदनी में योगदान देना, अपनी जरूरतों के लिए आर्थिक रूप से अधिक सक्षम होना और परिवार के आर्थिक फैसलों में भागीदारी बढ़ाना भी हो सकता है। इस तरह एक छोटे उद्यम का प्रभाव धीरे-धीरे कई परिवारों तक पहुंचता है।

मुजफ्फरपुर के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। खेती और घरेलू काम के अलावा नियमित आय का विकल्प सीमित होने की स्थिति में सिलाई, परिधान निर्माण और बैग उत्पादन जैसी गतिविधियां महिलाओं को स्थानीय स्तर पर काम का अवसर दे सकती हैं। कुसुम देवी की कंपनी इसी दिशा में काम कर रही है।

आंगनबाड़ी के बच्चों के लिए ड्रेस तैयार करने का काम मिलने से कंपनी को उत्पादन के क्षेत्र में भी विस्तार का अवसर मिला है। इसके लिए बड़ी संख्या में कपड़ों की सिलाई और तैयार उत्पाद की आपूर्ति की आवश्यकता होती है। ऐसी गतिविधियों से स्थानीय सिलाई श्रमिकों को नियमित काम मिलने की संभावना बढ़ती है और उत्पादन इकाई को भी अपने कारोबार का दायरा बढ़ाने का मौका मिलता है।

कुसुम देवी की कहानी यह भी बताती है कि उद्यमिता के लिए हमेशा बड़े शहर या बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती। यदि स्थानीय जरूरत को समझकर कारोबार शुरू किया जाए और धीरे-धीरे उसे बढ़ाया जाए तो गांव में भी रोजगार पैदा करने वाली इकाई खड़ी की जा सकती है। उनके मामले में बैग और महिलाओं के परिधान से शुरू हुआ काम आगे चलकर आंगनबाड़ी ड्रेस तक पहुंचा।

कंपनी का एक वर्ष पूरा होना कुसुम देवी के लिए सिर्फ कारोबार की सालगिरह नहीं है, बल्कि उनके अब तक के सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। इस अवधि में मशीनों की संख्या चार गुना से अधिक बढ़ी और कर्मचारियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी। करीब 46 लाख रुपये के टर्नओवर और 6.40 लाख रुपये के मुनाफे ने कारोबार को आर्थिक रूप से भी एक आधार दिया है।

अब कुसुम देवी का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के और अवसर पैदा करना है। वह अधिक से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर और सफल उद्यमी बनने के लिए सक्षम करना चाहती हैं। उनके सामने आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने, बाजार का विस्तार करने और अधिक लोगों को काम से जोड़ने की संभावनाएं हैं।

कुसुम देवी की यह यात्रा उन महिलाओं के लिए भी एक उदाहरण है जो आर्थिक रूप से कुछ करना चाहती हैं लेकिन शुरुआत को लेकर असमंजस में रहती हैं। घर की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने छोटा कदम उठाया, जीविका से जुड़कर ऋण लिया, 24 मशीनों से काम शुरू किया और धीरे-धीरे अपने कारोबार को 105 मशीनों तक पहुंचाया। आज उनके उद्यम में काम करने वाले 105 लोगों की संख्या इस बदलाव को साफ तौर पर दिखाती है।

एक गांव की महिला से उद्यमी बनने तक का यह सफर बताता है कि आर्थिक अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं सिर्फ अपने परिवार की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार कर सकती हैं। मुजफ्फरपुर की कुसुम देवी ने चौका-बर्तन से शुरू हुई अपनी दिनचर्या को कारोबार और रोजगार सृजन की दिशा में बदल दिया है। अब उनका लक्ष्य अपने उद्यम को आगे बढ़ाने के साथ ग्रामीण क्षेत्र की और महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने का है।

Leave a comment