मुजफ्फरपुर: कांटी प्रखंड के सदातपुर स्थित सुधा डेयरी प्लांट से निकलने वाले केमिकलयुक्त दूषित पानी की समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में प्रशासन ने कदम बढ़ाया है। वर्षों से आसपास के खेतों और इलाकों में जमा हो रहे इस पानी की निकासी के लिए अब फरदो नदी तक पाइपलाइन के जरिए रास्ता बनाने की योजना सामने आई है। हालांकि नदी में पानी पहुंचाने से पहले उसका उपचार करना जरूरी होगा। प्रशासन ने पानी की गुणवत्ता और ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता की जांच के लिए अलग समिति बनाई है।
सुधा डेयरी से निकलने वाले अपशिष्ट पानी की समस्या लंबे समय से स्थानीय लोगों और किसानों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। प्रशासन के मुताबिक यह पानी कई वर्षों से आसपास के क्षेत्रों में बह रहा है। इससे कृषि भूमि प्रभावित होने के साथ स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर भी संभावित प्रतिकूल प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है। जुलाई में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार करीब 40 एकड़ कृषि भूमि प्रभावित होने और 1100 से अधिक पेड़ सूखने की बात भी सामने आई थी।
समस्या को गंभीरता से लेते हुए तिरहुत प्रमंडल के आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थायी समाधान की कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। बैठक में कांटी विधायक, जिलाधिकारी, डीडीसी, अपर समाहर्ता, सुधा डेयरी प्रबंधन, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, PHED, NHAI और रेलवे समेत कई विभागों के अधिकारी शामिल हुए। आयुक्त ने पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की बात कही है।
इस योजना में सबसे अहम भूमिका दो समितियों की है। डीडीसी की अध्यक्षता वाली समिति सुधा डेयरी के ट्रीटमेंट प्लांट की कार्यप्रणाली और उससे निकलने वाले पानी की गुणवत्ता की जांच करेगी। PHED के कार्यपालक अभियंता पानी का सैंपल लेकर उसमें मौजूद रासायनिक तत्वों की लैब जांच कराएंगे। दूसरी ओर ADM की अध्यक्षता वाली समिति पानी की सुरक्षित निकासी के लिए उपयुक्त जमीन और रास्ते का सर्वे करेगी।
प्रशासन की योजना के अनुसार उपचारित पानी को पाइपलाइन के जरिए फरदो नदी तक पहुंचाने का विकल्प देखा जा रहा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि मौजूदा केमिकलयुक्त पानी को बिना उपचार के सीधे नदी में छोड़ दिया जाएगा। विशेषज्ञों और अधिकारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल पानी की गुणवत्ता और उसमें मौजूद रासायनिक तत्वों की मात्रा का है। जांच के बाद ही यह तय होगा कि पानी को किस स्तर तक ट्रीटमेंट की जरूरत है और उसे सुरक्षित रूप से कहां छोड़ा जा सकता है।
कांटी विधायक अजीत कुमार ने भी सुझाव दिया है कि सुधा डेयरी अपनी जमीन पर बड़ा तालाब या जलाशय विकसित करे और वहां वाटर ट्रीटमेंट की व्यवस्था की जाए। उनका कहना है कि उपचारित पानी को ही पाइपलाइन के माध्यम से फरदो नदी में छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने प्रभावित किसानों को लंबे समय से हो रहे नुकसान के लिए मुआवजा देने की मांग भी उठाई है।
दरअसल, समस्या सिर्फ पानी की निकासी तक सीमित नहीं है। यदि दूषित पानी लगातार खेतों में जमा होता रहा तो मिट्टी की गुणवत्ता, फसलों और पेड़-पौधों पर इसका असर पड़ सकता है। इसी वजह से प्रशासन अब ऐसी व्यवस्था तैयार करना चाहता है जिससे डेयरी से निकलने वाला पानी नियंत्रित तरीके से बाहर निकले और आसपास की जमीन में इसका फैलाव रोका जा सके।
प्रशासन ने दोनों समितियों को जल्द रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में पानी की गुणवत्ता, ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता, निकासी के संभावित रास्ते और जरूरी संरचनाओं की जानकारी शामिल की जानी है। इसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का लक्ष्य है कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए जरूरी संरचनाओं का निर्माण 15 सितंबर से शुरू किया जा सके।
स्थानीय किसानों का कहना है कि दूषित पानी के कारण लंबे समय से खेती प्रभावित हो रही है। खेतों में पानी जमा रहने के कारण फसल उत्पादन पर असर पड़ता है और जमीन के इस्तेमाल को लेकर भी समस्या खड़ी होती है। कई किसान इस मामले में मुआवजे की मांग कर चुके हैं। प्रशासनिक स्तर पर अब इस पहल से उन्हें उम्मीद है कि पानी की समस्या का स्थायी समाधान निकल सकेगा।
सुधा डेयरी प्रबंधन को भी जल निकासी की व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन ने साफ किया है कि सभी संबंधित विभागों और संस्थाओं के बीच समन्वय बनाकर योजना को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके लिए सुधा डेयरी, तिमूल, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, PHED, रेलवे और NHAI के अधिकारियों को समितियों में शामिल किया गया है।
फरदो नदी में पानी छोड़ने की योजना को लेकर पर्यावरणीय सावधानी भी जरूरी होगी। क्योंकि नदी में किसी भी तरह का अनुपचारित औद्योगिक या रासायनिक अपशिष्ट पहुंचना जल गुणवत्ता के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए पहले पानी की लैब जांच, फिर पर्याप्त ट्रीटमेंट और उसके बाद ही निकासी की व्यवस्था करना महत्वपूर्ण होगा। प्रशासन की मौजूदा योजना भी इसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रस्तावित पाइपलाइन और ट्रीटमेंट व्यवस्था कितनी जल्दी तैयार होती है और उससे वर्षों पुरानी समस्या का कितना स्थायी समाधान निकलता है। यदि पानी का उपचार सही तरीके से किया जाता है और निकासी नियंत्रित रहती है तो आसपास के किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है। वहीं प्रभावित जमीन को हुए नुकसान की भरपाई और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए निगरानी व्यवस्था भी जरूरी होगी।
फिलहाल प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तकनीकी जांच और निकासी व्यवस्था का सर्वे शुरू कर दिया है। सुधा डेयरी के दूषित पानी को फरदो नदी तक पाइपलाइन से पहुंचाने का रास्ता तलाशा जा रहा है, लेकिन नदी में केवल उपचारित पानी ही छोड़े जाने की व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी। अब दोनों समितियों की रिपोर्ट और 15 सितंबर से प्रस्तावित निर्माण कार्य पर स्थानीय लोगों और किसानों की नजर है।