मुजफ्फरपुर के एक मजदूर के पश्चिम अफ्रीका में पिछले करीब तीन महीने से फंसे होने का मामला सामने आया है। परिवार का आरोप है कि विदेश भेजने से पहले उसे जिस वेतन का भरोसा दिया गया था, वहां पहुंचने के बाद उससे काफी कम भुगतान किया जा रहा है। मजदूर ने अपनी पत्नी से बातचीत में बताया कि उसे 60 हजार रुपये महीने वेतन देने की बात कही गई थी, लेकिन अब केवल करीब 30 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। वेतन में कमी का विरोध करने और वापस भारत आने की इच्छा जताने के बाद कथित तौर पर उसका पासपोर्ट और वीजा अपने कब्जे में ले लिया गया है। इससे परिवार की चिंता और बढ़ गई है।
मजदूर की पत्नी का कहना है कि परिवार लगातार उसके संपर्क में रहने की कोशिश कर रहा है। पति से फोन पर बातचीत होने के दौरान उसने अपनी परेशानी बताई। परिवार के मुताबिक, विदेश जाने से पहले बेहतर कमाई और नियमित रोजगार का भरोसा दिया गया था। इसी उम्मीद में मजदूर ने विदेश जाने का फैसला किया था, लेकिन अब स्थिति ऐसी हो गई है कि वह वहां से अपनी इच्छा से वापस भारत भी नहीं लौट पा रहा है। परिवार का दावा है कि पासपोर्ट और वीजा अपने पास रख लिए जाने के कारण उसकी परेशानी और बढ़ गई है।
विदेश में नौकरी करना बिहार के हजारों युवाओं और मजदूरों के लिए बेहतर कमाई की उम्मीद का रास्ता रहा है। स्थानीय स्तर पर सीमित रोजगार और कम मजदूरी के कारण बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों, अफ्रीकी देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया के अलग-अलग हिस्सों में काम करने के लिए जाते हैं। विदेश में काम करने वाले मजदूर अपने परिवार को नियमित पैसे भेजते हैं और इसी कमाई से घर की आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश करते हैं। ऐसे में अगर विदेश पहुंचने के बाद तय वेतन नहीं मिले या किसी कर्मचारी का पासपोर्ट उसके नियोक्ता अथवा किसी अन्य व्यक्ति के पास चला जाए, तो उसके सामने गंभीर मुश्किल खड़ी हो सकती है।
इस मामले में परिवार की सबसे बड़ी चिंता यही है कि मजदूर पिछले तीन महीने से अपने घर से दूर है और कथित तौर पर अपनी मर्जी से वापस नहीं लौट पा रहा है। परिवार के अनुसार, उसने वहां की स्थिति के बारे में फोन पर जानकारी दी है। पत्नी का कहना है कि 60 हजार रुपये वेतन का वादा किया गया था, लेकिन 30 हजार रुपये ही दिए जा रहे हैं। अगर मजदूर की ओर से बताई गई यह जानकारी सही है तो वेतन को लेकर उसके साथ किए गए वादे और वास्तविक भुगतान के बीच बड़ा अंतर है।
परिवार का आरोप है कि जब मजदूर ने कम वेतन पर काम करने से इनकार किया और अपनी समस्या उठाई तो उसका पासपोर्ट और वीजा जब्त कर लिया गया। पासपोर्ट किसी भी भारतीय नागरिक के लिए महत्वपूर्ण यात्रा दस्तावेज है। विदेश में रहने वाले किसी भारतीय के पास यदि उसका मूल पासपोर्ट न हो तो यात्रा, नौकरी बदलने, कानूनी सहायता लेने या भारत लौटने जैसी प्रक्रियाएं मुश्किल हो सकती हैं। भारतीय मिशनों की ओर से भी प्रवासी भारतीयों को अपने मूल पासपोर्ट को सुरक्षित रखने की सलाह दी जाती है।
इस मामले में परिवार अब चाहता है कि संबंधित एजेंसी, कंपनी या नियोक्ता से पूरे मामले की जानकारी ली जाए और मजदूर को सुरक्षित तरीके से भारत वापस लाने में मदद की जाए। परिवार के लिए यह केवल वेतन का विवाद नहीं रह गया है। सबसे बड़ी चिंता मजदूर की सुरक्षा और उसके पासपोर्ट-वीजा की है। यदि वह वास्तव में किसी दूसरे देश में फंसा हुआ है और उसके दस्तावेज उसके पास नहीं हैं, तो संबंधित भारतीय मिशन और स्थानीय प्रशासन से संपर्क करना उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
विदेश में भारतीय मजदूरों के साथ पासपोर्ट जब्त करने और वेतन नहीं देने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। फरवरी 2026 में केंद्र सरकार ने एक ऐसे मामले पर जानकारी दी थी जिसमें झारखंड के 14 प्रवासी मजदूर दुबई में फंसे होने की शिकायत लेकर सामने आए थे। रिपोर्ट के अनुसार, मजदूरों ने पासपोर्ट जब्त किए जाने और मजदूरी नहीं मिलने की शिकायत की थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी थी।
बिहार से भी विदेश में नौकरी के नाम पर लोगों के साथ धोखाधड़ी के मामले सामने आते रहे हैं। हाल ही में मधुबनी में पुलिस ने कथित फर्जी वीजा-जॉब नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए चार लोगों को गिरफ्तार किया और 62 पासपोर्ट बरामद किए। पुलिस के मुताबिक, नौकरी के नाम पर लोगों को विदेश भेजने और बाद में उनका शोषण किए जाने की आशंका की भी जांच की जा रही है।
ऐसे मामलों से यह सवाल भी उठता है कि विदेश जाने से पहले मजदूरों को नौकरी, वेतन, कंपनी, वीजा और रोजगार अनुबंध से जुड़ी जानकारी कितनी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराई जाती है। कई बार एजेंट आकर्षक वेतन का दावा करके लोगों को विदेश जाने के लिए तैयार कर लेते हैं। मजदूर अपनी बचत, कर्ज या परिवार की जमा पूंजी खर्च करके विदेश पहुंचता है। लेकिन वहां पहुंचने के बाद अगर उसे अलग कंपनी में काम दिया जाए, वेतन कम कर दिया जाए या रहने-खाने की व्यवस्था वैसी न मिले जैसी बताई गई थी, तो वह दूसरे देश में होने के कारण आसानी से अपनी समस्या का समाधान नहीं कर पाता।
मुजफ्फरपुर के इस मामले में भी परिवार के सामने यही चुनौती दिखाई दे रही है। मजदूर ने जिस नौकरी और वेतन की उम्मीद में विदेश का रास्ता चुना था, अगर वहां परिस्थितियां उसके बताए अनुसार नहीं हैं तो उसके लिए भारत लौटना जरूरी हो सकता है। लेकिन पासपोर्ट और वीजा कथित तौर पर अपने पास नहीं होने की वजह से उसकी स्थिति और कठिन हो गई है।
परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी इसका असर पड़ सकता है। विदेश जाने वाले मजदूर से परिवार को अक्सर उम्मीद होती है कि वह हर महीने घर पैसे भेजेगा। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, कर्ज की किस्त, खेती या मकान निर्माण जैसे कई खर्च उसकी कमाई से जुड़े होते हैं। यदि विदेश में उसे तय वेतन नहीं मिलता तो परिवार की पूरी आर्थिक योजना प्रभावित हो सकती है। 60 हजार रुपये महीने की उम्मीद के मुकाबले 30 हजार रुपये मिलना परिवार की आय को सीधे आधा कर सकता है, खासकर तब जब विदेश जाने में पहले ही बड़ी रकम खर्च हुई हो।
परिवार के लिए यह भी जरूरी होगा कि विदेश में मौजूद मजदूर से संपर्क बनाए रखा जाए और उसकी लोकेशन, कंपनी का नाम, रोजगार अनुबंध, वीजा की जानकारी और पासपोर्ट से जुड़े विवरण सुरक्षित रखे जाएं। ऐसी परिस्थितियों में परिवार को किसी अनधिकृत व्यक्ति के भरोसे रहने के बजाय संबंधित भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास से संपर्क करना चाहिए। भारतीय प्रवासियों के लिए सरकारी स्तर पर उपलब्ध सहायता तंत्र ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
विदेश में नौकरी करने वाले भारतीय नागरिकों के लिए रोजगार वीजा और नौकरी की वैधता भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। भारतीय दूतावासों की सलाह में भी विदेश में रोजगार के लिए उचित रोजगार वीजा सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाता है। गलत या अलग श्रेणी के वीजा पर काम करना प्रवासी मजदूर के लिए कानूनी परेशानी पैदा कर सकता है।
इस पूरे मामले में अभी सबसे जरूरी बात मजदूर की सुरक्षित स्थिति की पुष्टि करना है। परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से कहा जाना जरूरी है कि कम वेतन दिए जाने और पासपोर्ट-वीजा जब्त करने की बातें फिलहाल परिवार और मजदूर की ओर से सामने आई शिकायतों पर आधारित हैं। संबंधित कंपनी, नियोक्ता या एजेंसी का पक्ष सामने आने के बाद मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
अगर मजदूर वास्तव में तीन महीने से पश्चिम अफ्रीका में फंसा है तो स्थानीय भारतीय मिशन के स्तर पर हस्तक्षेप से उसे कानूनी और प्रशासनिक सहायता मिल सकती है। पासपोर्ट वापस दिलाने, नियोक्ता से बातचीत कराने, बकाया वेतन के संबंध में मार्गदर्शन देने और जरूरत पड़ने पर भारत वापसी की प्रक्रिया में मदद जैसे कदम परिस्थिति के अनुसार उठाए जा सकते हैं।
मुजफ्फरपुर के इस मजदूर की कहानी उन हजारों परिवारों की चिंता को सामने लाती है जिनके घर का कोई सदस्य बेहतर रोजगार की तलाश में विदेश जाता है। विदेश की नौकरी परिवार के लिए आर्थिक तरक्की का माध्यम बन सकती है, लेकिन अगर रोजगार की शर्तें बदल जाएं या दस्तावेजों पर नियंत्रण किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ में चला जाए तो वही सपना मुश्किल में बदल सकता है। ऐसे मामलों में प्रवासी मजदूर की सुरक्षा और उसके अधिकारों की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
परिवार अब उम्मीद कर रहा है कि संबंधित अधिकारी पूरे मामले की जानकारी लेकर मजदूर की स्थिति का पता लगाएंगे और यदि उसके साथ रोजगार या दस्तावेजों को लेकर गलत व्यवहार हुआ है तो उसे राहत दिलाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल परिवार के लिए हर फोन कॉल चिंता और उम्मीद दोनों लेकर आती है। पत्नी को भरोसा है कि सरकारी स्तर पर मदद मिलने पर उसका पति सुरक्षित वापस घर लौट सकेगा।
विदेश में नौकरी करने वालों के लिए यह मामला एक बड़ी सीख भी है कि किसी भी देश में रोजगार के लिए जाने से पहले कंपनी की विश्वसनीयता, रोजगार अनुबंध, वेतन, काम की प्रकृति, वीजा श्रेणी और रहने की व्यवस्था की पूरी जानकारी हासिल करना जरूरी है। अपने पासपोर्ट और अन्य जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां परिवार के पास रखना भी उपयोगी होता है। वहीं विदेश पहुंचने के बाद किसी गंभीर समस्या की स्थिति में अकेले संघर्ष करने के बजाय भारतीय दूतावास या संबंधित सरकारी सहायता व्यवस्था से संपर्क करना चाहिए।
फिलहाल मुजफ्फरपुर के इस मजदूर के मामले में परिवार की सबसे बड़ी मांग यही है कि उसे सुरक्षित भारत वापस लाया जाए और यदि वेतन या पासपोर्ट को लेकर लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित पक्ष के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। तीन महीने से विदेश में फंसे मजदूर और उसके परिवार के लिए अब सरकारी मदद ही सबसे बड़ी उम्मीद बनी हुई है।









