नैनीताल के ज्योलीकोट में दूषित पानी से फैला संक्रमण, जानलेवा बैक्टीरिया मिलने से हड़कंप

नैनीताल के ज्योलीकोट में पानी के सैंपलों में ई-कोलाई और फीकल कॉलिफॉर्म मिले। हाईकोर्ट की फटकार के बाद जांच समिति बनी, जल संस्थान की जिम्मेदारी तय होगी।
नैनीताल के ज्योलीकोट में दूषित पानी से फैला संक्रमण, जानलेवा बैक्टीरिया मिलने से हड़कंप
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उत्तराखंड के नैनीताल जिले के ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पेयजल से फैले संक्रमण के मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है। पानी के सैंपलों की जांच रिपोर्ट में ई-कोलाई, फीकल कॉलिफॉर्म और फीकल स्ट्रेप्टोकोकस जैसे बैक्टीरिया पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद जल संस्थान की ओर से कराई गई शुरुआती पानी की जांच भी सवालों के घेरे में आ गई है। मामला अब नैनीताल हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां अदालत ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। प्रशासन ने भी मामले में जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

ज्योलीकोट के अलावा गांजा, वीरभट्टी, छींणा, बेलुवाखान, सरियाताल और आसपास के अन्य इलाकों में भी दूषित पानी से बीमारी फैलने की शिकायतें सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र में कई लोगों के बीमार होने के साथ दो लोगों की मौत का मामला भी सामने आया है। इसी को लेकर स्थानीय निवासी की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन और संबंधित विभागों से जवाब मांगा और प्रभावित क्षेत्र में राहत एवं जांच कार्य तेज करने के निर्देश दिए।

सबसे गंभीर बात पानी के सैंपलों की जांच में सामने आई। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से क्षेत्र के अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लिए गए। रिपोर्ट में कई जगहों के पानी में कॉलिफॉर्म और ई-कोलाई पाए गए। कुछ नमूनों में फीकल कॉलिफॉर्म और फीकल स्ट्रेप्टोकोकस भी मिला। रिपोर्ट के मुताबिक अलग-अलग स्थानों पर प्रति 100 मिलीलीटर पानी में बैक्टीरिया की मात्रा 170 से लेकर 2200 तक दर्ज की गई। इन परिणामों ने पेयजल की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।

फीकल कॉलिफॉर्म और फीकल स्ट्रेप्टोकोकस ऐसे बैक्टीरिया हैं जिनकी मौजूदगी पानी के मल से दूषित होने का संकेत मानी जाती है। ऐसे बैक्टीरिया पेयजल में पहुंचने पर लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार दूषित पानी के सेवन से डायरिया, उल्टी-दस्त, पेट दर्द, बुखार और पीलिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से कमजोर स्वास्थ्य वाले लोगों के लिए ऐसी स्थिति ज्यादा चिंताजनक हो सकती है।

जांच रिपोर्ट में मनोरा, बेलुवाखान, मल्ला बेलुवाखान, वीरभट्टी के चीनागांव, पार्वती प्रेमा जगाती विद्यालय के पास स्थित पेयजल स्रोत, देवुबागांजा वाटर टैंक, पीएमजीएसवाई कार्यालय के पास के स्रोत, चौपड़ा के बुशगांव वाटर टैंक और सरियाताल टैंक से लिए गए नमूनों में बैक्टीरिया मिलने की बात कही गई है। इससे साफ हुआ कि समस्या केवल किसी एक पाइपलाइन या एक मोहल्ले तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई जल स्रोत और पेयजल आपूर्ति क्षेत्र इसकी चपेट में आए।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अधिकारियों से यह भी सवाल किया कि ग्रामीणों की ओर से पहले ही बदबूदार पानी की शिकायतें किए जाने के बावजूद समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीणों ने करीब एक महीने पहले पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की थी। अदालत ने अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता के साथ काम किया जाना चाहिए था।

अदालत में जल संस्थान के अधिकारियों की ओर से यह बताया गया कि बाद में क्लोरीनेशन, टैंकों की सफाई और अन्य सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं तथा इसके बाद लिए गए कुछ नमूनों की रिपोर्ट सामान्य आई है। लेकिन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में पहले लिए गए कई नमूनों के फेल होने के कारण पूरे मामले की गंभीरता बनी हुई है। हाईकोर्ट ने नए सिरे से पानी के नमूने लेने और पूरे क्षेत्र की जल गुणवत्ता की जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

प्रशासन ने मामले में जिम्मेदारी तय करने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में छह सदस्यीय स्थायी समिति का गठन किया है। समिति को पानी दूषित होने के कारणों, संबंधित विभागों की जिम्मेदारी और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए जरूरी सुधारात्मक कदमों की रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। समिति को सात दिन के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया था।

जांच समिति में मुख्य विकास अधिकारी के साथ मुख्य चिकित्सा अधिकारी, पेयजल निगम और जल संस्थान के अधिशासी अभियंता, नगर निकाय के अधिकारी और जिला पंचायत राज अधिकारी को शामिल किया गया है। समिति को केवल मौजूदा संक्रमण की वजह तलाशने की जिम्मेदारी नहीं दी गई है, बल्कि पेयजल स्रोत, टैंक, पाइपलाइन, लीकेज, सीपेज और सीवर सिस्टम के बीच संभावित संपर्क की भी तकनीकी जांच करनी है।

जांच का एक अहम हिस्सा यह पता लगाना है कि कहीं पेयजल और सीवरेज लाइन के बीच क्रॉस-कनेक्शन तो नहीं है। अगर सीवर का गंदा पानी किसी तरह पेयजल स्रोत या सप्लाई लाइन में पहुंच रहा है तो यह पूरे क्षेत्र में संक्रमण फैलने की बड़ी वजह बन सकता है। प्रशासन ने पाइपलाइनों की सफाई, फ्लशिंग, ब्लीचिंग और क्लोरीनेशन के साथ-साथ लीकेज की पहचान और उसे ठीक कराने की प्रक्रिया भी शुरू की है।

पहले की सुनवाई में जल संस्थान के अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया था कि पुराने कूड़ा खड्ड के पास स्थित जल स्रोत में सीवर का पानी मिलने की वजह से समस्या उत्पन्न हुई। इसी बिंदु को लेकर हाईकोर्ट ने अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई थी। अदालत ने कहा कि यदि समय रहते सीवर और पेयजल पाइपलाइन की मरम्मत होती तो ग्रामीणों को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता।

प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र में लोगों को वैकल्पिक रूप से साफ पानी उपलब्ध कराने के लिए टैंकरों की व्यवस्था भी की है। एक रिपोर्ट के अनुसार दो दिनों में चार टैंकरों के माध्यम से 110 परिवारों को 15,500 लीटर से अधिक शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया गया था। देवलढूंगा लाइन की करीब 500 मीटर फ्लशिंग भी कराई गई और पानी के नए नमूने लिए गए।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रभावित इलाकों में मेडिकल टीमों को भी लगाया गया है। हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट के मुताबिक आठ डॉक्टरों की टीम, एंबुलेंस और मेडिकल स्टाफ प्रभावित क्षेत्र में तैनात किया गया। लोगों के घर-घर जाकर क्लोरीन की गोलियां और ओआरएस पैकेट वितरित किए गए। स्वास्थ्य विभाग ने बड़ी संख्या में पीलिया, डायरिया और अन्य बीमारियों से प्रभावित लोगों की जानकारी भी अदालत के सामने रखी।

इस मामले में हाईकोर्ट ने प्रशासन को राहत कार्यों की लगातार निगरानी करने के निर्देश दिए हैं। जिलाधिकारी को स्वयं स्थिति पर नजर रखने, प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों से सुरक्षित पानी पहुंचाने और सीवर लीकेज की शिकायतों के समाधान के लिए व्यवस्था करने को कहा गया है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि यदि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं तो जरूरत के अनुसार बाहर से विशेषज्ञों की सेवाएं ली जाएं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से भी नए सैंपल लेने और पूरे नैनीताल क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता की जांच कराने को कहा गया है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश भी दिए हैं। इससे आने वाले समय में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि दूषित पानी की समस्या किस स्तर पर हुई और जिम्मेदारी किसकी बनती है।

ज्योलीकोट प्रकरण में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दूषित पानी लोगों के घरों तक पहुंचने से पहले उसकी गुणवत्ता की निगरानी क्यों नहीं हो सकी। जल स्रोतों, टैंकों और पाइपलाइनों की नियमित जांच की व्यवस्था होने के बावजूद यदि मलजनित बैक्टीरिया पेयजल में पहुंच गए तो यह विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि अंतिम जिम्मेदारी जांच समिति और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के निष्कर्षों के बाद ही तय होगी।

फिलहाल प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए साफ पानी की वैकल्पिक व्यवस्था, पाइपलाइनों की सफाई और क्लोरीनेशन जैसे कदम उठाए हैं। वहीं दूसरी ओर पानी के नए सैंपल लिए जा रहे हैं, ताकि यह पता चल सके कि सुधारात्मक कार्रवाई के बाद जल स्रोतों की स्थिति वास्तव में सामान्य हुई है या नहीं। इस पूरी प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की भी नजर बनी हुई है।

ज्योलीकोट का यह मामला केवल एक क्षेत्र में दूषित पानी की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि इससे पेयजल आपूर्ति की निगरानी, जल स्रोतों की सुरक्षा, सीवर और पेयजल लाइनों के बीच दूरी तथा विभागीय जवाबदेही जैसे कई सवाल जुड़े हैं। अब जांच समिति की रिपोर्ट और अदालत में पेश होने वाली नई रिपोर्ट से यह सामने आएगा कि संक्रमण फैलने की वास्तविक वजह क्या थी और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए किन अधिकारियों और विभागों की जिम्मेदारी तय की जाती है।

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