टाटा संस में चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति पर चल रहा विवाद अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है। राहुल गांधी के आरोपों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक और कानूनी मामलों को अपराध बताना गलत है।
नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह का अंदरूनी विवाद अब संसद की राजनीति तक पहुंच गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर टाटा समूह की स्थिति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा। इसके कुछ घंटे बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कांग्रेस नेता पर कारोबारी समुदाय में अविश्वास फैलाने और हर मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया।
राहुल गांधी ने टाटा समूह को लेकर क्या कहा?
राहुल गांधी ने अपनी पोस्ट में दावा किया कि टाटा समूह को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है, लेकिन देश के बड़े कारोबारी नेता इस मामले पर बोलने से बच रहे हैं। उन्होंने उद्योग जगत की चुप्पी पर सवाल उठाया और पूछा कि कारोबारी कब तक खामोश रहेंगे। राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेते हुए कहा कि भारतीय उद्योग किसी राजनीतिक नेतृत्व की निजी संपत्ति नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस इस मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठाएगी। हालांकि, राहुल गांधी ने अपनी पोस्ट में किसी विशिष्ट आपराधिक गतिविधि का प्रमाण पेश नहीं किया।
निर्मला सीतारमण ने आरोपों को बताया गलत
राहुल गांधी के बयान के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक्स पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते राहुल गांधी को हर विषय पर राजनीति करने से बचना चाहिए।
वित्त मंत्री के मुताबिक, किसी व्यावसायिक या कानूनी विवाद को बिना ठोस आधार के आपराधिक मामला बताना स्वीकार्य नहीं है। सीतारमण ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी भारतीय उद्योगपतियों की उपलब्धियों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं और अब कारोबारी नेताओं के बीच अविश्वास बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कांग्रेस के पुराने लाइसेंस-कोटा राज की आलोचना करते हुए कहा कि मौजूदा सरकार उद्योग, निवेश और रोजगार बढ़ाने को महत्व देती है।
टाटा संस में आखिर किस बात पर विवाद है?
इस पूरे विवाद की शुरुआत टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के अगले कार्यकाल को लेकर हुई। 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन को पांच साल के लिए दोबारा नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा गया था। बैठक में चार निदेशकों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया।
इसके बाद टाटा ट्रस्ट्स ने नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि कंपनी के नियमों के मुताबिक जरूरी मंजूरी नहीं ली गई। दूसरी ओर, टाटा संस ने बहुमत और कानूनी राय के आधार पर अपने फैसले का बचाव किया है।
नोएल टाटा ने 26 अक्टूबर को क्यों लिखी चिट्ठी?
नोएल टाटा ने 26 अक्टूबर को टाटा संस के कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय को पत्र भेजकर नियुक्ति प्रस्ताव की वैधता पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुच्छेद 118 के अनुसार जरूरी चयन समिति का गठन नहीं किया गया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ट्रस्ट्स की ओर से नियुक्त निदेशकों की आवश्यक सहमति नहीं मिली।
नोएल टाटा ने बोर्ड बैठक के एजेंडे पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक, निदेशकों को पहले भेजे गए एजेंडे में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। उन्होंने इन प्रक्रियागत आपत्तियों के आधार पर प्रस्ताव को अमान्य बताया है। हालांकि, यह उनका कानूनी पक्ष है, किसी अदालत का अंतिम फैसला नहीं।
बोर्ड बैठक की रिकॉर्डिंग और दस्तावेज मांगे
नोएल टाटा ने अपने पत्र में 17 सितंबर की बैठक की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने की मांग की है। उन्होंने बैठक की अंतिम कार्यवाही, मतदान का विवरण, प्रस्ताव की प्रमाणित प्रति और नियामकीय दस्तावेज भी मांगे हैं।
नोएल के अनुसार, उन्होंने पहले भी रिकॉर्डिंग और संबंधित दस्तावेज मांगे थे, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। उनकी आपत्ति इस बात पर भी है कि विवादित प्रस्ताव से संबंधित जानकारी कंपनी रजिस्ट्रार को भेजी गई, जबकि बैठक के रिकॉर्ड पर सहमति नहीं बनी थी।
उन्होंने सात दिन के भीतर दस्तावेज देने और रजिस्ट्रार को प्रस्ताव की विवादित स्थिति से अवगत कराने की मांग की है।
टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस में किसका कितना अधिकार?
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसलिए कंपनी के नेतृत्व और बड़े फैसलों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। टाटा संस पूरे टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। इसके जरिए विभिन्न समूह कंपनियों में हिस्सेदारी रखी जाती है।
मौजूदा विवाद केवल चंद्रशेखरन की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें बोर्ड की निर्णय प्रक्रिया, ट्रस्ट्स के अधिकार और टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग जैसे मुद्दे भी जुड़े हुए हैं। इन विषयों पर दोनों पक्षों की अलग-अलग कानूनी व्याख्याएं सामने आई हैं।
आगे क्या हो सकता है?
एन. चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होना है। इसी कारण अगले कार्यकाल की वैधता का सवाल महत्वपूर्ण बन गया है। नोएल टाटा के 26 अक्टूबर के पत्र में मांगी गई जानकारी देने के लिए सात दिन का समय रखा गया है। यह अवधि 2 नवंबर को पूरी होगी।
इस बीच वित्त मंत्री और राहुल गांधी के बीच हुई बयानबाजी ने विवाद को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। फिलहाल टाटा संस के नेतृत्व से जुड़े मतभेद का अंतिम कानूनी समाधान सामने नहीं आया है। दोनों पक्षों की स्थिति और संबंधित नियमों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होगी।










