PCPNDT Act: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, लिंग जांच मामलों में पुलिस सीधे नहीं कर सकती FIR; जानें क्या बदला

PCPNDT Act मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। लिंग जांच से जुड़े मामलों में पुलिस सीधे FIR दर्ज कर जांच नहीं कर सकती। जानें नए नियम और कोर्ट की

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को PCPNDT कानून के तहत दर्ज अपराधों की जांच को लेकर अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन मामलों में पुलिस जांचकर्ता की भूमिका नहीं निभा सकती और कानून के तहत नामित अधिकारी ही कार्रवाई कर सकते हैं।

PCPNDT Act Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 यानी PCPNDT Act से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत होने वाले कथित अपराधों की जांच पुलिस सीधे नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में कार्रवाई और जांच की जिम्मेदारी कानून के तहत नियुक्त या अधिकृत अधिकारियों की होगी।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि किसी मामले में PCPNDT Act के अलावा कोई स्वतंत्र आपराधिक अपराध सामने आता है, तो पुलिस उस अपराध की जांच और अभियोजन कर सकती है। यानी फैसला पुलिस की सामान्य आपराधिक जांच की शक्तियों को खत्म नहीं करता।

PCPNDT Act के मामलों में पुलिस की भूमिका क्या होगी?

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि PCPNDT Act के तहत कार्रवाई के लिए विशेष तकनीकी और चिकित्सकीय समझ की आवश्यकता होती है। कानून ने ऐसे मामलों के लिए विशेष प्रक्रिया और अधिकारियों की व्यवस्था की है। अदालत के अनुसार, PCPNDT Act के उद्देश्य से पुलिस को जांचकर्ता की भूमिका नहीं दी गई है। 

इसलिए इस कानून के तहत कथित अपराध की जांच निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक नामित अधिकारी ही करेंगे। इसका मतलब यह है कि केवल PCPNDT Act के उल्लंघन के आरोप के आधार पर पुलिस अपने स्तर पर FIR दर्ज करके जांच शुरू नहीं कर सकती।

क्या पुलिस अस्पताल या क्लिनिक पर छापा मार सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक अहम पहलू छापेमारी से भी जुड़ा है। अदालत ने कहा कि PCPNDT Act के तहत कार्रवाई करने की वैधानिक शक्ति संबंधित नामित अधिकारियों के पास है। इसलिए पुलिस केवल इस कानून के कथित उल्लंघन की जांच के लिए स्वतंत्र रूप से अस्पताल, क्लिनिक या किसी अन्य प्रतिष्ठान पर छापा नहीं डाल सकती।

हालांकि, यदि छापेमारी के दौरान या किसी अन्य तरीके से किसी अलग आपराधिक अपराध की जानकारी सामने आती है, तो उस अपराध के संबंध में पुलिस अपनी वैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है।

दूसरे अपराधों में पुलिस की शक्ति बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है। PCPNDT Act के तहत अपराध और सामान्य आपराधिक कानून के तहत होने वाले अपराधों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। यदि किसी मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी, धमकी, मारपीट या कोई अन्य स्वतंत्र अपराध सामने आता है, तो पुलिस उस अपराध के संबंध में FIR दर्ज कर सकती है और कानून के अनुसार जांच भी कर सकती है।

इसलिए फैसले का अर्थ यह नहीं है कि PCPNDT से जुड़े मामलों में पुलिस की सभी शक्तियां समाप्त हो गई हैं। रोक विशेष रूप से उन अपराधों की जांच पर है, जो PCPNDT Act के तहत आते हैं।

किस मामले में आया फैसला?

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस PCPNDT Act, 1994 के तहत अपराधों को लेकर FIR दर्ज कर सकती है और उनकी जांच कर सकती है। अदालत ने कानून में निर्धारित प्रक्रिया पर जोर देते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में नामित अधिकारियों को ही आगे की कार्रवाई करनी होगी।PCPNDT कानून के मामलों में चिकित्सकीय रिकॉर्ड, अल्ट्रासाउंड से संबंधित दस्तावेज, पंजीकरण संबंधी जानकारी और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच की जरूरत पड़ सकती है। इसी वजह से कानून में विशेष अधिकारियों और प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है।

क्या है PCPNDT Act?

PCPNDT Act, 1994 का उद्देश्य गर्भ में भ्रूण का लिंग पता लगाने और लिंग चयन की प्रथा पर रोक लगाना है। भारत में कन्या भ्रूण हत्या और लिंग आधारित भेदभाव को रोकने के लिए यह कानून महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कानून के तहत लिंग चयन और भ्रूण के लिंग की जानकारी देने या निर्धारित नियमों का उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान है। पहली बार दोष सिद्ध होने पर तीन साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है, जबकि दोबारा अपराध करने पर सजा और जुर्माना अधिक हो सकता है।

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