केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की ओर से जारी अगस्त 2026 के ड्रग अलर्ट ने दवा निर्माण और गुणवत्ता को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। देशभर में जांच किए गए दवाओं और संबंधित उत्पादों के 221 सैंपल निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश में निर्मित बड़ी संख्या में दवाओं के सैंपल शामिल हैं। वहीं पंजाब में बनी आठ दवाओं के सैंपल भी गुणवत्ता जांच में फेल पाए गए हैं। फेल पाए गए उत्पादों में बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले सिरप, बुखार और दर्द की दवाएं, हृदय रोग, किडनी, मधुमेह, खांसी, आंखों और पेट संबंधी बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के साथ इंजेक्शन और विटामिन उत्पाद भी शामिल हैं।
हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में निर्मित दवाओं की संख्या इस ड्रग अलर्ट में विशेष रूप से सामने आई है। CDSCO के अगस्त अलर्ट से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल की 63 दवाओं के सैंपल गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए, जबकि एक अन्य विस्तृत रिपोर्ट में यह संख्या 64 बताई गई है। इनमें सोलन जिले के बद्दी, बरोटीवाला और नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र से सबसे अधिक दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा कालाअंब, पांवटा साहिब, ऊना, कांगड़ा और बिलासपुर समेत प्रदेश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में निर्मित दवाओं के नमूने भी जांच में अधोमानक पाए गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल में गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए उत्पादों में कई ऐसी दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल आम बीमारियों से लेकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में किया जाता है। इनमें एंटीबायोटिक, बच्चों के सिरप, दर्द और बुखार की दवाएं, मधुमेह तथा ब्लड प्रेशर की दवाएं, हृदय रोग की दवाएं, एसिडिटी और एलर्जी की दवाएं, खांसी की दवाएं, फंगल संक्रमण की दवाएं, मिर्गी, किडनी और नसों के दर्द में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद शामिल हैं। इंजेक्शन, सस्पेंशन, जेल और विटामिन उत्पाद भी इस सूची में शामिल बताए गए हैं।
बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं को लेकर भी इस अलर्ट में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। बद्दी के भुड्ड क्षेत्र में निर्मित पैरासिटामोल पेडियाट्रिक ओरल सस्पेंशन का सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल पाया गया। यह दवा बच्चों में बुखार और दर्द कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। रिपोर्ट के अनुसार संबंधित उत्पाद का बैच नंबर SOLOT-027 और उसकी बताई गई एक्सपायरी सितंबर 2026 थी। ऐसे मामलों में संबंधित बैच की बिक्री और वितरण पर नियामकीय स्तर पर कार्रवाई की जाती है।
किडनी से जुड़ी दवाओं का सैंपल भी जांच में असफल पाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ स्थित स्टेडमैड प्राइवेट लिमिटेड में निर्मित डिसोडियम हाइड्रोजन साइट्रेट सॉल्यूशन का नमूना गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरा। इस तरह के उत्पादों का उपयोग किडनी की पथरी और मूत्र संबंधी समस्याओं के उपचार में किया जाता है। वहीं हिमाचल में निर्मित अन्य दवाओं में मधुमेह से जुड़ी दवाएं भी जांच में असफल पाई गई हैं।
हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों से संबंधित दवाओं के सैंपल का फेल होना भी इस अलर्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ड्रग अलर्ट में विभिन्न श्रेणियों की ऐसी दवाओं को शामिल किया गया है जिनका इस्तेमाल लंबे समय तक चलने वाले उपचार में किया जाता है। इसके अलावा आंखों की दवाएं, खांसी की दवाएं, पेट संबंधी दवाएं और इंजेक्शन के नमूनों में भी गुणवत्ता संबंधी कमियां पाई गई हैं।
दवा के किसी सैंपल का 'नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी' यानी NSQ घोषित होना यह बताता है कि जांच के दौरान वह नमूना निर्धारित गुणवत्ता मानक को पूरा नहीं कर पाया। CDSCO की व्यवस्था में ऐसे उत्पादों को NSQ ड्रग अलर्ट के तहत सूचीबद्ध किया जाता है। CDSCO की उपभोक्ता सूचना प्रणाली में भी NSQ दवाओं के लिए अलग व्यवस्था उपलब्ध है, जहां महीने और तारीख के आधार पर अलर्ट देखे जा सकते हैं।
जांच में दवाएं अलग-अलग गुणवत्ता मानकों पर असफल पाई गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार कुछ नमूनों में डिसॉल्यूशन, कंटेंट, एस्से, स्टेरिलिटी, पीएच और पार्टिकुलेट मैटर से जुड़ी कमियां सामने आईं। कुछ मामलों में सक्रिय औषधीय तत्व यानी API की निर्धारित मात्रा से संबंधित मानक भी पूरे नहीं हुए। दवा की प्रभावशीलता और गुणवत्ता के लिए ये परीक्षण महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अगस्त के ड्रग अलर्ट में हिमाचल के अलावा देश के कई अन्य राज्यों में निर्मित दवाओं के सैंपल भी फेल पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड की 39, गुजरात की 17, महाराष्ट्र की 16, मध्य प्रदेश की 12, तमिलनाडु और हरियाणा की 11-11, सिक्किम और उत्तर प्रदेश की नौ-नौ तथा पंजाब की आठ दवाओं के सैंपल गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए। तेलंगाना की छह, आंध्र प्रदेश की चार और कई अन्य राज्यों की दवाएं भी सूची में शामिल हैं।
पंजाब की आठ दवाओं के सैंपल फेल होने की जानकारी भी इस ड्रग अलर्ट में सामने आई है। पंजाब में निर्मित एक कॉस्मेटिक उत्पाद के बारे में रिपोर्ट में बताया गया है कि डीआर स्किन केयर की ओर से निर्मित कोजिक एसिड डिपालमिटेट, विटामिन ई और ग्लिसरीन सोप का नमूना भी गुणवत्ता जांच में असफल पाया गया। संबंधित बैच नंबर HS-1787 और नवंबर 2026 की एक्सपायरी रिपोर्ट में दी गई है।
हिमाचल के फार्मा उद्योग के लिए यह रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश के बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ यानी BBN औद्योगिक क्षेत्र को देश के प्रमुख फार्मा उत्पादन केंद्रों में गिना जाता है। अगस्त के अलर्ट से संबंधित रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल में फेल पाए गए सैंपलों में सबसे बड़ी संख्या बद्दी, बरोटीवाला और नालागढ़ क्षेत्र में निर्मित उत्पादों की है। कालाअंब और पांवटा साहिब जैसे अन्य औद्योगिक क्षेत्रों से भी कई नमूने सूची में शामिल हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार राज्य औषधि नियंत्रक की ओर से संबंधित कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। संबंधित बैच की बिक्री और वितरण पर रोक लगाने समेत नियमानुसार कार्रवाई शुरू किए जाने की बात कही गई है। कंपनियों से उनके उत्पादों में सामने आई गुणवत्ता संबंधी कमियों को लेकर जवाब मांगा गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई दवा उद्योगों ने फेल घोषित किए गए सैंपलों को चुनौती दी है। ऐसे मामलों में अंतिम नियामकीय कार्रवाई संबंधित जांच और प्रक्रिया पूरी होने के बाद तय होती है।
दवा कंपनियों के लिए गुणवत्ता नियंत्रण उत्पादन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी दवा का सैंपल निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरने पर संबंधित बैच की जांच और बाजार में उसकी उपलब्धता को लेकर नियामकीय कदम उठाए जाते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में उपलब्ध दवाएं निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप हों। CDSCO की आधिकारिक वेबसाइट पर NSQ दवाओं के लिए अलग डेटाबेस और अलर्ट प्रणाली उपलब्ध है, जिसके माध्यम से ऐसे उत्पादों की जानकारी सार्वजनिक की जाती है।
इस पूरे मामले में आम उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी दवा का नाम ड्रग अलर्ट में आने का मतलब यह है कि संबंधित नमूना गुणवत्ता परीक्षण में निर्धारित मानक पर खरा नहीं उतरा। इसलिए किसी भी दवा को लेकर भ्रम की स्थिति में मरीजों को खुद से दवा बंद या बदलने के बजाय अपने डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। साथ ही दवा खरीदते समय नाम, बैच नंबर और एक्सपायरी डेट की जांच करना जरूरी है, खासकर तब जब संबंधित उत्पाद किसी नियामकीय अलर्ट में शामिल हो।
अगस्त 2026 का यह ड्रग अलर्ट दवा निर्माण में गुणवत्ता नियंत्रण और नियामकीय निगरानी की अहमियत को सामने लाता है। देशभर में 221 सैंपलों के फेल होने की सूचना के साथ हिमाचल के बड़ी संख्या में उत्पादों का सूची में शामिल होना राज्य के फार्मा उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण नियामकीय संकेत है। फिलहाल संबंधित कंपनियों से जवाब मांगा गया है और जिन उत्पादों के बैच गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए हैं, उनके खिलाफ नियमों के अनुसार आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है।












