रांची विश्वविद्यालय के 96 अतिथि शिक्षकों को 22 महीने से मानदेय नहीं, आर्थिक संकट में परिवार

Ranchi University के 96 अतिथि शिक्षकों को 22 महीने से मानदेय नहीं मिला है। भुगतान अटकने से शिक्षक कर्ज और आर्थिक संकट में हैं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई।

रांची विश्वविद्यालय के 96 अतिथि शिक्षकों को 22 महीने से मानदेय नहीं मिला है। भुगतान अटकने से शिक्षक कर्ज और आर्थिक संकट में हैं। एक शिक्षक को बेटी की पढ़ाई रोककर परिवार गांव भेजना पड़ा और खुद बेघर होना पड़ा।

रांची: रांची विश्वविद्यालय के 96 अतिथि शिक्षक लंबे समय से मानदेय नहीं मिलने के कारण गंभीर आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। कई शिक्षक कर्ज लेकर परिवार चला रहे हैं, जबकि कुछ को रोजमर्रा के खर्च जुटाना भी मुश्किल हो गया है। मारवाड़ी कॉलेज के एक शिक्षक ने आर्थिक तंगी के चलते बेटी का स्कूल छुड़ाया और परिवार को गांव भेज दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी भुगतान लंबित है।

96 अतिथि शिक्षकों का 22 महीने से मानदेय अटका

रांची विश्वविद्यालय में कार्यरत अतिथि शिक्षकों को लंबे समय से उनके काम का भुगतान नहीं मिला है। विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेजों और पीजी विभागों में कुल 96 अतिथि शिक्षक सेवाएं दे रहे हैं। इनमें कई शिक्षक NET और PhD जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यता भी रखते हैं।

इन शिक्षकों की नियुक्ति वर्ष 2016 में की गई थी। शुरुआत में उन्हें प्रति कक्षा 500 रुपये और अधिकतम 30 हजार रुपये तक मानदेय दिए जाने की व्यवस्था थी। लेकिन अक्टूबर 2022 से मानदेय का भुगतान नहीं होने का आरोप है।

बाद में लागू प्रावधान के अनुसार NET उत्तीर्ण कक्षा आधारित शिक्षकों के लिए 57,700 रुपये और अतिथि शिक्षकों के लिए 50 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय का प्रावधान बताया गया है। इसके बावजूद भुगतान नहीं होने से शिक्षकों के सामने लगातार आर्थिक संकट बढ़ता गया।

बेटी की पढ़ाई छूटी, शिक्षक को छोड़ना पड़ा किराए का घर

मारवाड़ी कॉलेज के अतिथि शिक्षक अंकित शर्मा की स्थिति इस आर्थिक संकट की गंभीरता को सामने लाती है। लंबे समय तक मानदेय नहीं मिलने के कारण वह अपनी बेटी की स्कूल फीस जमा नहीं कर सके।

फीस बकाया होने के बाद उन्हें बेटी का नाम स्कूल से कटवाना पड़ा। इसके बाद पत्नी और बेटी को गांव भेजना पड़ा। रांची में किराया नहीं चुका पाने के कारण मकान मालिक ने उन्हें घर से भी निकाल दिया।

स्थिति संभालने के लिए अंकित शर्मा ने अपनी अंगूठी और कुछ गहने बेचकर किराया चुकाया। बाद में अपना सामान दोस्त के यहां रख दिया। आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई कि उनके पास रहने के लिए स्थायी जगह तक नहीं बची।

यह परेशानी सिर्फ एक शिक्षक तक सीमित नहीं है। दूसरे अतिथि शिक्षक भी घर का खर्च चलाने के लिए कर्ज लेने, सामान बेचने और दूसरे विकल्प तलाशने को मजबूर हुए हैं।

कॉलेज आने के लिए पेट्रोल का खर्च जुटाना भी मुश्किल

मानदेय नहीं मिलने का असर शिक्षकों के काम और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ा है। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण कुछ शिक्षकों के पास कॉलेज आने-जाने के लिए पेट्रोल का खर्च तक नहीं बचा।

शिक्षकों का कहना है कि वे विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेजों में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे, लेकिन लंबे समय से भुगतान नहीं हुआ। इससे परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, किराया और अन्य जरूरी जरूरतें प्रभावित हुई हैं।

रांची वीमेंस कॉलेज, मारवाड़ी कॉलेज, डोरंडा कॉलेज, जेएन कॉलेज, एसएस मेमोरियल कॉलेज सहित कई संस्थानों में ये अतिथि शिक्षक काम कर रहे हैं। इसके अलावा सिमडेगा, खूंटी, बुंडू, बेड़ो, सिसई, मांडर, लोहरदगा, गुमला और बानो के कॉलेजों में भी अतिथि शिक्षक तैनात हैं।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी भुगतान का इंतजार

मानदेय भुगतान की मांग को लेकर अतिथि शिक्षकों ने हाईकोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने शिक्षकों के पक्ष में आदेश दिया और भुगतान को लेकर पहले जारी निर्देशों का भी उल्लेख किया।

अदालत ने यह भी माना कि जब सरकार और विश्वविद्यालय शिक्षकों की सेवाएं ले रहे हैं, तो उनके मासिक पारिश्रमिक का भुगतान किया जाना चाहिए। अंतरिम व्यवस्था के तहत राज्य सरकार को 1.5 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश भी दिया गया था।

इसके बावजूद अतिथि शिक्षकों का कहना है कि उन्हें अब तक बकाया मानदेय नहीं मिला है। लंबे समय से भुगतान की प्रतीक्षा कर रहे शिक्षक आर्थिक संकट से बाहर निकलने के लिए सरकार और विश्वविद्यालय से जल्द कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं।

फिलहाल विश्वविद्यालय की ओर से इस मामले में कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। शिक्षकों की सबसे बड़ी मांग बकाया मानदेय का भुगतान और भविष्य में समय पर पारिश्रमिक सुनिश्चित करना है।

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