संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल तक स्थगित होने के बाद सोमवार को बजट सत्र का सत्रावसान हो गया। लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों द्वारा जारी अलग-अलग बयानों के अनुसार, राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने सोमवार को सत्रावसान किया।
नई दिल्ली: भारत की संसद के बजट सत्र 2026 का सोमवार को औपचारिक रूप से सत्रावसान कर दिया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस सत्र का समापन किया, जो 28 जनवरी 2026 को आरंभ हुआ था। यह बजट सत्र कई महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण चर्चा में रहा। इस सत्र के दौरान कुल 9 विधेयक पारित किए गए, जबकि महिला आरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक पर सहमति नहीं बन सकी, जिससे सरकार को संसद में एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
बजट सत्र 2026 की प्रमुख समयरेखा
संसद का बजट सत्र 28 जनवरी 2026 को शुरू हुआ था। इसका पहला चरण 13 फरवरी तक चला, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों के बजटीय प्रस्तावों और नीतिगत चर्चाओं पर बहस हुई। इसके बाद दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू हुआ और प्रारंभिक रूप से इसे 2 अप्रैल तक चलाने की योजना थी। हालांकि, बाद में सत्र के कार्यकाल में बदलाव करते हुए 16 से 18 अप्रैल तक तीन दिवसीय विशेष सत्र भी आयोजित किया गया। अंततः, दोनों सदनों की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के बाद सोमवार को राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान की घोषणा की गई।
महिला आरक्षण विधेयक पर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम

इस सत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक (131वां संशोधन) रही। सरकार ने इसे सदन में पारित कराने की कोशिश की, लेकिन मतदान के दौरान यह आवश्यक समर्थन प्राप्त नहीं कर सका और पारित नहीं हो पाया। यह घटना पिछले लगभग 12 वर्षों में पहली बार देखी गई जब किसी प्रमुख सरकारी विधेयक को संसद में पारित कराने में सरकार असफल रही। इस मुद्दे को सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण विधायी और राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
पारित अन्य विधेयक और संसदीय कार्यवाही
इस बजट सत्र के दौरान कुल 9 सरकारी विधेयक सफलतापूर्वक पारित किए गए। अंतिम चरण में तीन प्रमुख विधेयकों पर एक साथ चर्चा की गई, जिनमें शामिल थे:
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026
- परिसीमन विधेयक, 2026
- संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026
हालांकि, महिला आरक्षण विधेयक पर असफलता के बाद सरकार ने अन्य कुछ विधेयकों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया सीमित कर दी। संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में इस सत्र के दौरान महत्वपूर्ण संसदीय कार्य हुआ। राज्यसभा में लगभग 157 घंटे और लोकसभा में 151 घंटे से अधिक कार्यवाही दर्ज की गई।
इस सत्र में संसदीय लोकतंत्र की सक्रियता भी देखने को मिली। राज्यसभा में 50 प्राइवेट मेंबर बिल प्रस्तुत किए गए, जबकि लोकसभा में 12 सरकारी विधेयक पुनः प्रस्तुत किए गए। इनमें से कई विधेयकों पर विस्तृत बहस हुई, जिससे संसदीय कार्यवाही का दायरा व्यापक बना रहा।











