Super El Niño 2026: क्या 100 साल में पहली बार ‘खौल’ रहे हैं समंदर? भारत में समय से पहले बारिश और मानसून ने बढ़ाई चिंता

Super El Niño 2026 को लेकर वैश्विक जलवायु पैटर्न में बड़े बदलाव की आशंका जताई जा रही है। समुद्र के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी और भारत में समय से पहले मानसून व

साल 2026 में दुनिया भर में मौसम के पैटर्न असामान्य रूप से बदलते नजर आ रहे हैं। भारत में जहां मानसून समय से पहले पहुंच रहा है, वहीं नौतपा जैसे गर्म अवधि में भी बारिश दर्ज की जा रही है।

Super El Nino: साल 2026 में दुनिया भर में मौसम का मिजाज तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। कहीं रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है तो कहीं असामान्य बारिश और समुद्री तापमान में खतरनाक बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। भारत में भी मौसम के पैटर्न में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। नौतपा शुरू होने से पहले कई राज्यों में बारिश हो रही है, जबकि दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से पहले पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन सभी घटनाओं के पीछे एक बेहद शक्तिशाली “सुपर एल नीनो” जिम्मेदार हो सकता है।

क्या है सुपर एल नीनो?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो प्रशांत महासागर के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने पर विकसित होता है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करता है। जब यह स्थिति सामान्य से कहीं अधिक शक्तिशाली हो जाती है, तो इसे अनौपचारिक रूप से “सुपर एल नीनो” कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, 2026 में बनने वाला एल नीनो इस सदी के सबसे ताकतवर घटनाक्रमों में से एक हो सकता है।

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा समुद्र का तापमान

यूरोपीय संघ की Copernicus Climate Change Service के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2026 में वैश्विक समुद्री सतह का तापमान रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब पहुंच गया। आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों को छोड़कर वैश्विक महासागरों का औसत सतही तापमान लगभग 21 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो इतिहास के सबसे गर्म अप्रैल महीनों में शामिल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि महासागरों में “मरीन हीटवेव” यानी समुद्री लू जैसी स्थिति बन रही है। कनाडा स्थित क्लाइमेट इमरजेंसी इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. पीटर कार्टर के अनुसार, यह स्थिति वैश्विक स्तर पर भीषण जलवायु संकट का संकेत हो सकती है।

भारत में क्यों बदल रहा है मौसम?

भारत में मई-जून के दौरान पड़ने वाली भीषण गर्मी को “नौतपा” कहा जाता है। आमतौर पर इस दौरान तापमान चरम पर पहुंचता है और कई हिस्सों में लू चलती है। लेकिन इस बार मौसम का पैटर्न अलग दिखाई दे रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, अंडमान-निकोबार, बंगाल की खाड़ी और दक्षिण भारत के कई राज्यों में मई के मध्य से ही भारी बारिश और तेज हवाओं की संभावना बनी हुई है। 

केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की जा सकती है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बदलाव एल नीनो से जुड़े वैश्विक वायुमंडलीय परिवर्तनों का असर हो सकता है।

मानसून पर क्या होगा असर?

हालांकि शुरुआती बारिश राहत जैसी लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि सुपर एल नीनो भारत के लिए दीर्घकालिक संकट भी पैदा कर सकता है। IMD के अनुसार, 2026 में देश में सामान्य से कम मानसून रहने की संभावना है। विभाग का अनुमान है कि इस बार वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत रह सकती है। भारत में मानसून कृषि, पेयजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि मानसून कमजोर रहता है तो खरीफ फसलों पर बड़ा असर पड़ सकता है। धान, मक्का, दालें और अन्य वर्षा-आधारित फसलों के उत्पादन में कमी आ सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

एल नीनो और जलवायु परिवर्तन का खतरनाक मेल

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि एल नीनो मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग के साथ मिलकर असर दिखा रहा है। धरती पहले से ही औद्योगिक उत्सर्जन और ग्रीनहाउस गैसों के कारण लगातार गर्म हो रही है। ऐसे में एल नीनो अतिरिक्त गर्मी जोड़ देता है, जिससे तापमान और अधिक बढ़ जाता है।

2024 पहले ही इतिहास का सबसे गर्म वर्ष रिकॉर्ड किया जा चुका है। उस दौरान वैश्विक तापमान ने पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा को पार किया था, जिसे Paris Climate Agreement के तहत नियंत्रित रखने का लक्ष्य तय किया गया था।

NOAA और वैश्विक एजेंसियों की चेतावनी

अमेरिका की National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA) ने चेतावनी दी है कि मई से जुलाई 2026 के बीच एल नीनो विकसित होने की 61 प्रतिशत संभावना है। वहीं, सर्दियों तक इसके बेहद शक्तिशाली रूप लेने की 25 प्रतिशत संभावना जताई गई है। NOAA के शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि यह पूर्वानुमान सही साबित हुआ, तो यह आधुनिक इतिहास के सबसे तीव्र एल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है।

ब्रिटेन के मौसम विभाग ने भी कहा है कि यह घटना 1998 के ऐतिहासिक एल नीनो जैसी या उससे भी अधिक शक्तिशाली हो सकती है। जलवायु विश्लेषकों के अनुसार, 2026 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह संभावना भी जताई गई है कि 2027 अब तक का सबसे गर्म वर्ष बन सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते समुद्री तापमान, ग्लोबल वार्मिंग और एल नीनो के संयुक्त प्रभाव से आने वाले वर्षों में सूखा, बाढ़, जंगल की आग, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का नुकसान और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ सकती हैं। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। देश की बड़ी आबादी मानसून आधारित खेती पर निर्भर है। कमजोर मानसून से किसानों की आय, खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

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