अमेरिका में चीन के कथित गुप्त ‘पुलिस स्टेशन’ का खुलासा: न्यूयॉर्क निवासी दोषी करार

अमेरिका के न्यूयॉर्क कोर्ट ने चीन के कथित गुप्त पुलिस स्टेशन मामले में एक आरोपी को दोषी ठहराया है। वैश्विक निगरानी नेटवर्क और सुरक्षा पर बहस तेज हो गई ।

न्यूयॉर्क कोर्ट ने चीन के कथित गुप्त पुलिस स्टेशन चलाने के मामले में एक आरोपी को दोषी ठहराया है। अमेरिकी एजेंसियों का दावा है कि इसका इस्तेमाल चीन विरोधियों और लोकतंत्र समर्थकों की निगरानी तथा दबाव बनाने के लिए किया जा रहा था।

न्यूयॉर्क: अमेरिका में चीन के कथित गुप्त “पुलिस स्टेशन” को लेकर सामने आए मामले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों के बीच नई बहस छेड़ दी है। न्यूयॉर्क की एक फेडरल अदालत ने अमेरिकी नागरिक लू जियानवांग को चीन सरकार की ओर से अवैध रूप से कथित पुलिस स्टेशन संचालित करने के मामले में दोषी ठहराया है।

अमेरिकी अभियोजन पक्ष का दावा है कि यह स्टेशन न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित चाइनाटाउन इलाके में चलाया जा रहा था और इसका इस्तेमाल चीन विरोधी गतिविधियों पर नजर रखने तथा लोकतंत्र समर्थकों को दबाव में लेने के लिए किया जाता था।

यह मामला केवल अमेरिका और चीन के बीच तनाव का विषय नहीं बना है, बल्कि विदेशों में चीन के प्रभाव, निगरानी तंत्र और मानवाधिकारों से जुड़े सवालों को भी वैश्विक स्तर पर चर्चा में ले आया है।

कौन है लू जियानवांग?

64 वर्षीय लू जियानवांग, जिसे “हैरी लू” के नाम से भी जाना जाता है, न्यूयॉर्क का निवासी है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार वह चीन के पब्लिक सिक्योरिटी मंत्रालय के लिए काम कर रहा था।

  • फेडरल जूरी ने उसे दो प्रमुख आरोपों में दोषी पाया है:
  • चीन सरकार के अवैध एजेंट के रूप में काम करना
  • संघीय जांच में बाधा डालना और सबूत मिटाने की कोशिश करना

अभियोजन पक्ष के अनुसार, लू और उसके सहयोगी चेन जिनपिंग ने जांच शुरू होने के बाद चीन के अधिकारियों के साथ हुई बातचीत और टेक्स्ट मैसेज डिलीट कर दिए थे, ताकि मामले से जुड़े सबूत नष्ट किए जा सकें।

मैनहटन के चाइनाटाउन में चल रहा था कथित स्टेशन

अमेरिकी जांच एजेंसियों के मुताबिक यह कथित पुलिस स्टेशन 2022 की शुरुआत में स्थापित किया गया था। यह न्यूयॉर्क के चाइनाटाउन इलाके में एक रामेन स्टॉल के ऊपर पूरे फ्लोर में संचालित हो रहा था।

FBI ने इस मामले की जांच शुरू की, जिसके बाद 2022 के अंत तक इस स्टेशन को बंद कर दिया गया।

अधिकारियों का कहना है कि यह कोई आधिकारिक दूतावास या कांसुलर कार्यालय नहीं था, बल्कि बिना अमेरिकी अनुमति के विदेशी सरकार की गतिविधियों का संचालन किया जा रहा था।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी विदेशी सरकार द्वारा दूसरे देश की सीमा के भीतर अनौपचारिक कानून-प्रवर्तन गतिविधियां चलाना अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता के सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है।

FBI का दावा: लोकतंत्र समर्थकों को किया गया टारगेट

FBI के असिस्टेंट डायरेक्टर जेम्स सी. बार्नाकल जूनियर ने कहा कि इस कथित स्टेशन का इस्तेमाल चीन विरोधी लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लोकतंत्र समर्थकों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा था।

अमेरिकी एजेंसियों का आरोप है कि इस नेटवर्क के जरिए विदेशों में रह रहे चीनी नागरिकों पर दबाव बनाया जाता था और उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी।

विशेष रूप से वे लोग, जो चीन सरकार की आलोचना करते हैं या लोकतांत्रिक सुधारों की मांग करते हैं, कथित निगरानी के दायरे में थे।

मानवाधिकार संगठनों ने लंबे समय से आरोप लगाया है कि चीन विदेशों में रहने वाले असंतुष्टों पर दबाव बनाने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करता रहा है।

सह-आरोपी ने पहले ही स्वीकार किया था आरोप

इस मामले के दूसरे आरोपी चेन जिनपिंग ने दिसंबर 2024 में चीन के एजेंट के रूप में साजिश रचने का आरोप स्वीकार कर लिया था।

हालांकि उसकी सजा अभी तय नहीं हुई है, लेकिन अदालत में दिए गए बयान ने अमेरिकी अभियोजन पक्ष के दावों को मजबूत किया।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला अमेरिका में विदेशी प्रभाव और जासूसी गतिविधियों को लेकर सख्त रुख का संकेत देता है।

दुनिया के 53 देशों में कथित नेटवर्क?

मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय शोध समूहों का दावा है कि चीन के ऐसे कथित “पुलिस आउटपोस्ट” दुनिया के 53 देशों में मौजूद हैं।

कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इनकी संख्या 100 से अधिक हो सकती है। इन केंद्रों के जरिए कथित तौर पर विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों, पत्रकारों, छात्र संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की निगरानी की जाती है।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि हर मामले में नहीं हो पाई है, लेकिन अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई देशों ने इस मुद्दे की जांच शुरू की है।

कुछ देशों ने ऐसे केंद्रों को बंद करने या उनकी गतिविधियों की निगरानी बढ़ाने के कदम भी उठाए हैं।

चीन सरकार लगातार इन आरोपों से इनकार करती रही है।

बीजिंग का कहना है कि ये कथित “पुलिस स्टेशन” वास्तव में प्रशासनिक सहायता केंद्र या “सर्विस स्टेशन” हैं, जिनका उद्देश्य विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों को दस्तावेज़ संबंधी सेवाएं और अन्य प्रशासनिक सहायता प्रदान करना है।

चीन का दावा है कि इन केंद्रों का किसी भी प्रकार की जासूसी, निगरानी या राजनीतिक दबाव से कोई संबंध नहीं है।

चीनी अधिकारियों ने अमेरिका और पश्चिमी देशों पर चीन विरोधी माहौल बनाने का आरोप भी लगाया है।

अमेरिका-चीन संबंधों में बढ़ सकता है तनाव

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही व्यापार, तकनीक, साइबर सुरक्षा और भू-राजनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि न्यूयॉर्क कोर्ट का यह फैसला दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को और प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका पहले ही चीन पर साइबर जासूसी, तकनीकी चोरी और विदेशी प्रभाव अभियान चलाने के आरोप लगाता रहा है। वहीं चीन इन आरोपों को राजनीतिक प्रेरित बताता है।

अब यह मामला केवल कानून प्रवर्तन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा, डिजिटल निगरानी और विदेशी हस्तक्षेप से जुड़े व्यापक सवालों का हिस्सा बन चुका है।

वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती

विश्लेषकों के अनुसार, यह घटना इस बात का संकेत है that आधुनिक दौर में जासूसी और प्रभाव संचालन पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ चुके हैं।

विदेशों में अनौपचारिक नेटवर्क, डिजिटल निगरानी और प्रवासी समुदायों पर प्रभाव बनाने की कोशिशें कई देशों के लिए नई सुरक्षा चुनौती बनती जा रही हैं।

लोकतांत्रिक देशों में अब यह बहस तेज हो गई है कि विदेशी सरकारों की गतिविधियों की निगरानी किस हद तक की जानी चाहिए और नागरिक स्वतंत्रता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

न्यूयॉर्क का यह मामला आने वाले समय में अन्य देशों की जांच एजेंसियों और सरकारों को भी ऐसे नेटवर्क की गहन जांच के लिए प्रेरित कर सकता है।

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