सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: दुष्कर्म पीड़िताओं को बार-बार अदालत में बुलाना अनुचित

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दुष्कर्म पीड़िताओं को बार-बार अदालत में बुलाना अनुचित है। अदालत ने पीड़ितों की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि दुष्कर्म पीड़िता को मुकदमे की कार्यवाही के दौरान जिरह (cross-examination) के लिए बार-बार अदालत में बुलाकर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। 

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ितों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दुष्कर्म पीड़िता को मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान बार-बार अदालत में बुलाकर जिरह या पूछताछ के लिए पेश करने से बचा जाना चाहिए, विशेषकर तब जब वह पहले ही कई बार बयान दे चुकी हो।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस संबंध में एक अहम आदेश जारी करते हुए त्रिपुरा उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए पीड़िता को दोबारा अदालत में बुलाने की अनुमति दी गई थी।

पीड़िता पहले ही कई बार दे चुकी थी बयान

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित पीड़िता पहले ही विभिन्न चरणों में कई बार बयान दर्ज करा चुकी थी। उसने जांच एजेंसियों के समक्ष बयान दिया था, मजिस्ट्रेट के सामने कानूनी प्रक्रिया के तहत बयान दर्ज कराया था और निचली अदालत में भी कई अवसरों पर जिरह का सामना किया था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता को बार-बार अदालत में उपस्थित होने के लिए कहना न केवल मानसिक रूप से बोझिल हो सकता है, बल्कि यह उसके लिए अतिरिक्त पीड़ा और तनाव का कारण भी बन सकता है।

पीठ ने माना कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल साक्ष्य जुटाना नहीं है, बल्कि पीड़ितों की गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

चार साल बाद दोबारा बुलाने को बताया अनुचित

मामले में आरोपी पक्ष ने पीड़िता की जिरह पूरी होने के लगभग चार वर्ष बाद उसे पुनः अदालत में बुलाने की मांग की थी। इस आधार पर उच्च न्यायालय ने पुनः पेशी की अनुमति दे दी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को अनुचित ठहराते हुए कहा कि इतने लंबे अंतराल के बाद पीड़िता को फिर से अदालत में बुलाने के लिए पर्याप्त और ठोस कारण मौजूद नहीं थे।

अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि पीड़ित व्यक्ति को अनावश्यक रूप से बार-बार उसी दर्दनाक घटना को याद करने के लिए मजबूर होना पड़े।

संवेदनशील मामलों में विशेष सावधानी जरूरी

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यौन अपराधों, घरेलू हिंसा और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों को अतिरिक्त संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। पीठ ने कहा कि गवाहों और पीड़ितों को बार-बार अदालत में उपस्थित होने की अपेक्षा करना उचित नहीं है, खासकर तब जब उनका बयान पहले ही रिकॉर्ड पर उपलब्ध हो और मामले के निर्णय के लिए आवश्यक तथ्य अदालत के समक्ष मौजूद हों।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक प्रणाली में “पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण” को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

कानूनी प्रावधानों की व्याख्या भी की

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय आपराधिक प्रक्रिया कानून के उस प्रावधान पर भी विचार किया, जिसके तहत अदालतों को आवश्यकता पड़ने पर किसी गवाह को पुनः बुलाने का अधिकार प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार महत्वपूर्ण है और न्याय के हित में इसका उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, इसका प्रयोग विवेकपूर्ण और संतुलित तरीके से होना चाहिए।

अदालत ने कहा कि किसी गवाह या पीड़ित को पुनः बुलाने का आदेश तभी दिया जाना चाहिए जब यह साबित हो कि उसका अतिरिक्त साक्ष्य मामले के निष्पक्ष और न्यायसंगत निर्णय के लिए वास्तव में आवश्यक है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भारत में यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान पीड़ितों के अधिकारों को और मजबूत करेगा।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय न्यायपालिका ने कई फैसलों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया को पीड़ितों के लिए अधिक संवेदनशील, सुरक्षित और सम्मानजनक बनाया जाना चाहिए।

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