सुप्रीम कोर्ट ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को रोक दिया। अदालत ने कहा कि त्रासदी में कमाने वाला सदस्य खो चुके परिवारों को राहत देने पर विचार किया जा सकता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तमिलनाडु सरकार को बड़ी राहत देते हुए मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें करूर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को दी गई सरकारी नौकरियों के आदेश रद्द कर दिए गए थे। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान मानवीय आधार पर पीड़ित परिवारों को सहायता देने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाने की जरूरत पर भी टिप्पणी की।
यह मामला 27 सितंबर 2025 को तमिलनाडु के करूर में हुई भीड़ भगदड़ से जुड़ा है। इस हादसे में 41 लोगों की मौत हुई थी और करीब 100 लोग घायल हुए थे। यह भगदड़ तमिलगा वेत्री कड़गम यानी TVK के एक रोड शो के दौरान हुई थी। कार्यक्रम को पार्टी प्रमुख और वर्तमान मुख्यमंत्री जोसेफ विजय संबोधित कर रहे थे।
मद्रास हाईकोर्ट ने 27 जुलाई को रद्द किए थे नौकरी के आदेश
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने 27 जुलाई को तमिलनाडु सरकार की ओर से जारी उन आदेशों को रद्द कर दिया था, जिनके तहत भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने का फैसला किया गया था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि सरकारी विभागों में अनुकंपा नियुक्ति के लिए पहले से निर्धारित नियम और प्रतीक्षा सूची मौजूद हैं। ऐसे में किसी विशेष घटना के पीड़ित परिवारों को तत्काल राहत देने के लिए सामान्य प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी चिंता जताई थी कि अगर इस तरह की नियुक्तियों को बिना निर्धारित नियमों के मंजूरी दी जाती है, तो भविष्य में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है और इससे सरकारी नौकरियों में अनुकंपा नियुक्ति की स्थापित व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- परिवारों को राहत देने में क्या गलत है?
मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ तमिलनाडु सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने सरकार द्वारा हादसे में प्रभावित परिवारों को राहत देने की कोशिश का समर्थन करते हुए सवाल उठाया कि ऐसी त्रासदी झेल चुके परिवारों की मदद करने में आखिर क्या गलत है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि इस मामले को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिलाया कि कई परिवारों में हादसे के दौरान उनके एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मौत हो सकती है।
जस्टिस पारदीवाला ने सवाल किया कि यदि किसी परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति भगदड़ में मारा गया है और परिवार में कोई अन्य आय अर्जित करने वाला सदस्य नहीं है, तो क्या सरकार उस परिवार के बेटे, बेटी या पत्नी को उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुसार रोजगार देने की कोशिश नहीं कर सकती?
41 लोगों की मौत से जुड़ा है मामला
करूर में 27 सितंबर 2025 को हुई भगदड़ में 41 लोगों की जान चली गई थी। हादसे में करीब 100 लोग घायल हुए थे। घटना उस समय हुई जब तमिलगा वेत्री कड़गम के रोड शो में बड़ी संख्या में लोग जुटे थे।
हादसे के बाद पीड़ित परिवारों के लिए राहत और पुनर्वास की मांग उठी थी। तमिलनाडु सरकार ने कुछ परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया था। राज्य सरकार का तर्क था कि यह नियुक्तियां सामान्य भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि एक असाधारण त्रासदी से प्रभावित परिवारों को मानवीय आधार पर सहायता देने का प्रयास थीं।
हालांकि, इस फैसले को लेकर कानूनी चुनौती सामने आई और मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने समानता के अधिकार का दिया था हवाला
मद्रास हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरी देने के फैसले को रद्द करते समय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़े अधिकारों का उल्लेख किया था। अदालत का तर्क था कि सरकारी विभागों में पहले से अनुकंपा नियुक्ति के लिए प्रतीक्षा सूची मौजूद है और वहां नियुक्तियां निर्धारित नियमों तथा वरिष्ठता के आधार पर की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट के मुताबिक, तत्काल राहत देने के उद्देश्य से प्रतीक्षा सूची में शामिल अन्य लोगों को नजरअंदाज करना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना है और इसके लिए तय नियमों को हर मामले में अलग तरीके से नहीं बदला जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सरकार के आदेशों को निरस्त कर दिया था।
सरकार ने अनुच्छेद 162 के तहत अधिकार का दिया था तर्क
तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के सामने दलील दी थी कि इन नियुक्तियों का फैसला संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत राज्य सरकार की कार्यकारी शक्तियों के अंतर्गत लिया गया है।
राज्य का कहना था कि करूर हादसा असाधारण प्रकृति की त्रासदी थी और पीड़ित परिवारों को तत्काल राहत देना सरकार की जिम्मेदारी थी। इसलिए विशेष परिस्थितियों में सरकार ने मानवीय आधार पर नौकरी देने का फैसला किया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा था कि राज्य की कार्यकारी शक्ति भी संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल की जा सकती है। सरकार की कार्यकारी शक्ति का प्रयोग उन नियमों और संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए नहीं किया जा सकता, जो समानता और उचित प्रक्रिया की गारंटी देते हैं।
अनुकंपा नियुक्ति पर व्यापक कानूनी सवाल
यह मामला केवल करूर भगदड़ के पीड़ित परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी नौकरियों में अनुकंपा नियुक्ति के व्यापक कानूनी सिद्धांतों से भी जुड़ा है।
आम तौर पर अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य सरकारी कर्मचारी की मृत्यु या सेवा के दौरान गंभीर स्थिति के बाद उसके आश्रित परिवार को आर्थिक संकट से बचाने के लिए तत्काल रोजगार उपलब्ध कराना होता है। इसके लिए अलग-अलग सरकारी विभागों में नियम और पात्रता मानदंड निर्धारित होते हैं।
करूर मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या किसी बड़े सामूहिक हादसे के पीड़ितों के परिजनों को भी असाधारण मानवीय आधार पर ऐसी सरकारी नियुक्तियां दी जा सकती हैं, भले ही वे सामान्य अनुकंपा नियुक्ति की श्रेणी में न आते हों।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा कार्यवाही इस सवाल पर आगे की कानूनी बहस का रास्ता खोलती है।
हाईकोर्ट के आदेश पर रोक से परिवारों को राहत की उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाए जाने के बाद तमिलनाडु सरकार को फिलहाल राहत मिली है। इसका असर उन परिवारों पर भी पड़ सकता है जिन्हें राज्य सरकार की ओर से नौकरी देने का फैसला किया गया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम कार्रवाई को मामले पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत आगे की सुनवाई में यह तय करेगी कि राज्य सरकार की ओर से की गई नियुक्तियां संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप थीं या नहीं।
मामले की आगे की सुनवाई में अनुकंपा नियुक्ति के मौजूदा नियमों, राज्य सरकार की कार्यकारी शक्तियों और असाधारण मानवीय परिस्थितियों में सरकार द्वारा राहत देने की सीमा जैसे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर विचार हो सकता है।
करूर हादसे के बाद राहत नीति पर भी नजर
करूर भगदड़ ने बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल भी खड़े किए थे। हादसे के बाद भीड़ प्रबंधन, सार्वजनिक कार्यक्रमों की सुरक्षा और आपातकालीन व्यवस्थाओं को लेकर बहस हुई थी। पीड़ित परिवारों के पुनर्वास और आर्थिक सहायता का मुद्दा भी लगातार चर्चा में रहा।
अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि राज्य सरकार भविष्य में ऐसी सामूहिक त्रासदियों के पीड़ित परिवारों को किस कानूनी आधार पर रोजगार या अन्य विशेष सहायता दे सकती है।
फिलहाल शीर्ष अदालत की ओर से हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाए जाने से मामला एक नए कानूनी चरण में पहुंच गया है। अंतिम निर्णय यह तय करेगा कि करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को दी गई सरकारी नौकरियों को जारी रखा जा सकता है या राज्य सरकार को इसके लिए किसी अन्य कानूनी व्यवस्था का सहारा लेना होगा।











