टोपी वाला और बंदर: बुद्धिमानी से टोपियाँ बचाने की कहानी

टोपी वाला और बंदर: बुद्धिमानी से टोपियाँ बचाने की कहानी
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बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में रंगीलाल नाम का एक आदमी रहता था। वह टोपियाँ बेचने का काम करता था। वह रोज सुबह अपनी टोकरी में ढेर सारी रंग-बिरंगी टोपियाँ भरता और उन्हें बेचने के लिए एक गाँव से दूसरे गाँव पैदल जाता था। वह आवाज़ लगाता, 'टोपी ले लो भाई! लाल, नीली, पीली, सुंदर टोपियाँ ले लो!'

एक दिन गर्मी बहुत ज्यादा थी। सूरज आग बरसा रहा था। रंगीलाल एक गाँव से टोपियाँ बेचकर दूसरे गाँव जा रहा था। रास्ते में एक घना जंगल पड़ा। चलते-चलते वह बहुत थक गया था और उसे पसीना आ रहा था।

उसने देखा कि रास्ते के किनारे बरगद का एक बहुत विशाल और छायादार पेड़ है। उसने सोचा, 'थोड़ी देर इस पेड़ की ठंडी छाँव में आराम कर लेता हूँ, फिर आगे बढ़ूँगा।'

रंगीलाल ने अपनी टोपियों से भरी टोकरी पेड़ के नीचे रखी और खुद भी वहीं लेट गया। ठंडी हवा चल रही थी, इसलिए उसे तुरंत गहरी नींद आ गई।

उसी बरगद के पेड़ पर बहुत सारे शरारती बंदर रहते थे। उन्होंने देखा कि पेड़ के नीचे एक आदमी सो रहा है और उसके पास एक टोकरी रखी है। बंदरों को बड़ी जिज्ञासा हुई। वे चुपके-चुपके पेड़ से नीचे उतरे।

उन्होंने टोकरी में झाँका तो देखा कि उसमें सुंदर-सुंदर टोपियाँ हैं। बंदर नकलची तो होते ही हैं। उन्होंने देखा था कि लोग सिर पर टोपी पहनते हैं। बस फिर क्या था! एक-एक करके सभी बंदरों ने टोकरी में से टोपियाँ उठा लीं।

हर बंदर ने अपने सिर पर एक रंगीन टोपी पहन ली और खुशी-खुशी वापस पेड़ की ऊँची डालियों पर जाकर बैठ गए। टोकरी अब पूरी तरह खाली हो चुकी थी।

कुछ देर बाद रंगीलाल की नींद खुली। उसने अपनी टोकरी की तरफ देखा तो उसके होश उड़ गए। टोकरी खाली थी! सारी टोपियाँ गायब थीं। वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा कि उसकी टोपियाँ कौन ले गया।

तभी उसकी नज़र पेड़ के ऊपर गई। उसने जो देखा, उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। पेड़ पर बैठे सारे बंदर उसकी टोपियाँ पहने हुए थे और मजे से उसे देख रहे थे।

रंगीलाल को बहुत गुस्सा आया। उसने बंदरों को डराने के लिए जोर से हाथ हिलाया और चिल्लाया, 'ऐ बंदरों! मेरी टोपियाँ वापस करो।'

बंदरों ने भी उसकी नकल की। उन्होंने भी अपने हाथ हिलाए और 'खीं-खीं-खीं' करके चिल्लाने लगे, लेकिन टोपी किसी ने वापस नहीं की।

रंगीलाल ने गुस्से में ज़मीन से कुछ कंकड़ उठाए और बंदरों की तरफ फेंके। बंदरों ने जवाब में पेड़ से कच्चे फल और टहनियाँ तोड़कर उस पर फेंकना शुरू कर दिया।

रंगीलाल समझ गया कि गुस्से या लड़ाई से काम नहीं बनेगा। ये बंदर तो उसकी हर हरकत की नकल कर रहे हैं। वह थोड़ी देर शांत खड़ा रहा और सोचने लगा। अचानक उसे एक तरकीब सूझी।

रंगीलाल के सिर पर अभी भी उसकी अपनी पुरानी टोपी थी। उसने बंदरों को दिखाते हुए अपनी टोपी सिर से उतारी और उसे जोर से ज़मीन पर फेंक दिया।

बंदर तो नकलची थे ही। जब उन्होंने टोपी वाले को अपनी टोपी फेंकते देखा, तो उन्होंने भी आव देखा न ताव। सभी बंदरों ने झटपट अपने सिर से टोपियाँ उतारीं और उन्हें नीचे ज़मीन पर फेंक दिया।

पेड़ के नीचे रंग-बिरंगी टोपियों का ढेर लग गया।

रंगीलाल ने बिना एक पल गँवाए, फुर्ती से सारी टोपियाँ इकट्ठी कीं। उसने उन्हें जल्दी से अपनी टोकरी में भरा और खुशी-खुशी वहाँ से दूसरे गाँव की तरफ चल दिया।

सीख

मुसीबत के समय घबराना या गुस्सा नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा अपनी सूझबूझ और समझदारी से काम लेना चाहिए, जैसा कि टोपी वाले ने किया।

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