उड़ते कछुए की कहानी: हंसों के साथ हुई पहली उड़ान

उड़ते कछुए की कहानी: हंसों के साथ हुई पहली उड़ान

एक समय की बात है, एक सुंदर, शांत झील में कंबुग्रीवा नाम का एक कछुआ रहता था। उसके पास रहने के लिए साफ पानी, धूप सेंकने के लिए नरम चट्टानें और खाने के लिए भरपूर शैवाल थे। लेकिन, कंबुग्रीवा खुश नहीं था। वह घंटों झील के किनारे बैठकर खुले आसमान में बेखौफ उड़ते पक्षियों को निहारता और मन ही मन आह भरते हुए कहता, 'काश, मैं भी इनकी तरह बादलों के बीच उड़ पाता।'

कहानी

कंबुग्रीवा की उड़ने की चाहत दिन-ब-दिन एक जुनून में बदलती जा रही थी। वह अपने साथी मेंढकों और मछलियों से बात करना भी बंद कर चुका था क्योंकि वे उसे समझाते थे, 'मित्र, ईश्वर ने हम सबको अलग बनाया है। तुम्हारी पीठ का यह सख्त कवच तुम्हारी सुरक्षा के लिए है, और तुम्हारे पैर तैरने के लिए हैं। उड़ना हमारा काम नहीं है।' लेकिन कंबुग्रीवा को ये बातें समझ नहीं आती थीं। उसे लगता था कि जमीन पर रेंगना उसके लिए नहीं बना है।

उसी झील पर संकट और विकट नाम के दो हंस अक्सर दाना-पानी चुगने आया करते थे। वे दोनों कंबुग्रीवा के अच्छे दोस्त बन गए। वे उसे दूर-दराज के देशों, ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों की कहानियाँ सुनाते, जहाँ वे उड़कर जाते थे।

एक दिन कंबुग्रीवा ने अपना दुखड़ा उनके सामने रोया। "मेरे प्यारे दोस्तो,' उसने कहा, "मैं इस तालाब में एक ही जगह रहते-रहते ऊब गया हूँ। मेरा मन भी तुम्हारी तरह दुनिया देखने का करता है। क्या तुम मुझे अपने साथ नहीं ले चलोगे?'

हंसों को अपने दोस्त पर तरस आया। संकट ने कहा, 'कंबुग्रीवा, हम तुम्हें ले तो जा सकते हैं, लेकिन यह बहुत खतरनाक है। तुम्हारे पंख नहीं हैं, और अगर तुम गिरे, तो तुम्हारा बचना मुश्किल होगा।'

कंबुग्रीवा गिड़गिड़ाया, 'कृपया कोई तरीका निकालो! मैं वादा करता हूँ कि जैसा तुम कहोगे, मैं वैसा ही करूँगा।'

हंसों ने आपस में विचार-विमर्श किया और एक योजना बनाई। वे पास के जंगल से एक मजबूत, सूखी लकड़ी का डंडा लेकर आए। विकट ने समझाया, 'सुनो मित्र! यह हमारी आखिरी कोशिश है। हम दोनों अपनी चोंच से इस डंडे के दोनों किनारे पकड़ेंगे। तुम्हें इस डंडे के बीच के हिस्से को अपने मुँह से कसकर पकड़ना होगा और लटक जाना होगा।'

संकट ने गंभीर आवाज़ में चेतावनी दी, 'लेकिन एक बात गाँठ बाँध लो। चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे तुम्हें कितनी भी खुशी हो या गुस्सा आए, अपना मुँह बिल्कुल मत खोलना। अगर तुमने मुँह खोला, तो तुम सीधे नीचे गिरोगे।'

कंबुग्रीवा ने सिर हिलाकर सहमति दी और वादा किया कि वह एक शब्द भी नहीं बोलेगा।

यात्रा शुरू हुई। कंबुग्रीवा ने लकड़ी को अपने जबड़ों के बीच पूरी ताकत से दबाया। दोनों हंसों ने एक साथ उड़ान भरी। देखते ही देखते वे हवा में थे! कंबुग्रीवा का सपना सच हो गया था। ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी। नीचे का नजारा अद्भुत था, बड़े-बड़े पेड़ छोटे पौधों जैसे लग रहे थे, और नदियाँ पतली लकीरों जैसी। उसे लगा जैसे वह दुनिया का राजा है। उसे इतना गर्व महसूस हुआ कि वह खुशी से चिल्लाना चाहता था, लेकिन उसे अपना वादा याद था।

उड़ते-उड़ते वे एक कस्बे के ऊपर से गुजरे। नीचे खेतों में और बाज़ारों में काम कर रहे लोगों ने जब आसमान में यह अजीब दृश्य देखा, तो वे अपना काम छोड़कर शोर मचाने लगे।

'अरे देखो! एक उड़ने वाला कछुआ!' एक बच्चे ने चिल्लाकर कहा। भीड़ जमा हो गई। लोग हँस रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे और उंगलियाँ उठा-उठाकर बातें कर रहे थे। "कैसा मूर्ख कछुआ है,' किसी ने नीचे से मजाक उड़ाया, "लगता है उन हंसों ने इसे अगवा कर लिया है!'

कंबुग्रीवा नीचे लोगों का शोर सुन रहा था। उसे लगा कि वे उसकी प्रशंसा नहीं कर रहे, बल्कि उसका मजाक उड़ा रहे हैं। उसका अहंकार जाग उठा। उसे गुस्सा आ गया। वह उन अज्ञानी लोगों को बताना चाहता था कि यह उसका विचार था और वह खुद उड़ रहा है। वह यह साबित करना चाहता था कि वह साधारण कछुओं से बेहतर है।

गुस्से और घमंड में, वह हंसों की चेतावनी भूल गया। उन लोगों को डांटने के लिए उसने अपना मुँह खोला, 'तुम बेवकूफ लोग क्या जानो...'

जैसे ही उसने बोलने के लिए अपना मुँह खोला, लकड़ी का डंडा उसकी पकड़ से छूट गया। उसकी बात अधूरी रह गई और वह तेजी से हवा में गोते खाता हुआ नीचे गिरने लगा। बेचारे हंस असहाय होकर बस देखते रह गए।

कंबुग्रीवा धड़ाम से एक खेत में जा गिरा। गनीमत यह रही कि वह हाल ही में खोदी गई नरम मिट्टी पर गिरा, जिससे उसकी जान तो बच गई, लेकिन उसकी पीठ का सुंदर और मजबूत कवच कई जगहों से चटक गया और उसे बहुत चोट आई। वह दर्द से कराह उठा। अब वह न तो उड़ सकता था और न ही ठीक से चल सकता था।

सीख:

हमें अपनी क्षमताओं और अपनी वास्तविक प्रकृति को स्वीकार करना चाहिए। दूसरों की नकल करने या बिना सोचे-समझे अपनी सीमाओं को पार करने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता है। ईश्वर ने हमें जैसा बनाया है, हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए और अपने गुणों को पहचानना चाहिए।

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