स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर सोमवार को कार्डिफ में बैठक करेंगे। नेता क्षेत्रों को अपना भविष्य तय करने का अधिकार देने पर साझा बयान जारी कर सकते हैं। स्वतंत्रता, संवैधानिक बदलाव, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और यूरोप प्रमुख मुद्दे होंगे।
लंदन: ब्रिटेन की एकता और उसके संवैधानिक भविष्य को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में बैठक करेंगे। इस बैठक में अलग-अलग क्षेत्रों को अपना भविष्य तय करने का अधिकार देने और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्रता या अन्य बड़े संवैधानिक बदलावों पर जनमत संग्रह कराने की संभावना पर साझा रुख सामने आ सकता है। आयरलैंड की पार्टी सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड भी बैठक में शामिल होंगी।
ब्रिटेन की एकता पर फिर उठे सवाल
ब्रिटेन की केंद्र सरकार देश को एकजुट रखने के पक्ष में है, लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को लेकर असंतोष और अधिक अधिकारों की मांग लगातार चर्चा में है।
तीनों क्षेत्रों में ऐसी राजनीतिक ताकतें प्रभावशाली हैं जो ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहती हैं। स्कॉटलैंड में स्कॉटिश नेशनल पार्टी यानी SNP स्वतंत्रता का समर्थन करती है। वेल्स में प्लाइड कम्री वेल्स को अलग देश बनाने की मांग करती रही है। वहीं, नॉर्दर्न आयरलैंड में सिन फेन आयरलैंड के साथ एकीकरण की समर्थक है।
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रुन एपी इओर्थवर्ट के साथ नॉर्दर्न आयरलैंड का नेतृत्व भी संभावित साझा घोषणा का समर्थन कर सकता है।
कार्डिफ बैठक में किन मुद्दों पर होगी चर्चा?
बैठक का एजेंडा केवल स्वतंत्रता या संवैधानिक बदलाव तक सीमित नहीं रहने वाला है। नेताओं के बीच अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, यूरोप और दूसरे देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर भी बातचीत होगी।
सबसे अहम प्रस्ताव यह हो सकता है कि स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड समेत अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को अपने राजनीतिक और संवैधानिक भविष्य पर लोकतांत्रिक तरीके से फैसला लेने का अधिकार मिलना चाहिए।
यदि इस विचार को साझा समर्थन मिलता है, तो यह ब्रिटेन की केंद्र सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा सकता है। हालांकि, इससे तत्काल किसी क्षेत्र के ब्रिटेन से अलग होने की प्रक्रिया शुरू नहीं होती, बल्कि संवैधानिक विकल्पों पर चर्चा को राजनीतिक ताकत मिलती है।
प्रधानमंत्री के बयान से क्यों बढ़ा विवाद?
स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने हाल में कहा था कि यदि स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड में स्वतंत्रता या अलग होने के पक्ष में लोगों के बीच सहमति बनती है, तो एक और जनमत संग्रह पर विचार किया जा सकता है।
इस बयान को SNP ने तुरंत राजनीतिक मुद्दा बनाया। इसके बाद बर्नहम को स्पष्टीकरण देना पड़ा। उन्होंने एक पत्र लिखकर कहा कि अगले आम चुनाव से पहले स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह नहीं कराया जाएगा।
बर्नहम के बयान ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया कि भविष्य में ब्रिटेन के अलग-अलग हिस्सों को संवैधानिक बदलाव के लिए किस तरह का रास्ता दिया जा सकता है।

जॉन स्विनी ने बताया क्यों बढ़ रहा है दबाव
स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी ने ब्रिटेन की एकता पर बढ़ते दबाव की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ऐसे फर्स्ट मिनिस्टर मौजूद हैं जो स्वतंत्रता के पक्ष में हैं।
उनके अनुसार, यह स्थिति बताती है कि ब्रिटेन को एकजुट रखने वाली मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था दबाव में है।
वेल्स में भी हालिया चुनाव के बाद यह मुद्दा अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। मई में हुए चुनाव में ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली पार्टियों को मजबूती मिली। 96 सीटों वाले चुनाव में अलग देश की समर्थक प्लाइड कम्री ने 43 सीटें जीतीं, जबकि लेबर पार्टी को 9 सीटें मिलीं। इसके बाद प्लाइड कम्री के रुन एपी इओर्थवर्ट वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर बने।
नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला स्कॉटलैंड-वेल्स से अलग
नॉर्दर्न आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति स्कॉटलैंड और वेल्स से अलग है। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत यदि ऐसी संभावना बनती है कि नॉर्दर्न आयरलैंड के अधिकांश लोग ब्रिटेन से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो वहां जनमत संग्रह कराया जा सकता है।
सिन फेन का कहना है कि कार्डिफ बैठक में इसी लोकतांत्रिक अधिकार की बात उठाई जाएगी। पार्टी का रुख है कि लोगों को अपने देश और क्षेत्र के भविष्य का फैसला लोकतांत्रिक तरीके से करने का अवसर मिलना चाहिए।
नॉर्दर्न आयरलैंड में ब्रिटेन के साथ बने रहने और आयरलैंड के साथ एकीकरण, दोनों विचार आज भी मौजूद हैं।
ट्रंप के बयान से आयरलैंड एकीकरण की चर्चा तेज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने भी आयरलैंड के एकीकरण से जुड़ी चर्चा को नया आधार दिया है। शनिवार को डबलिन यात्रा के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे।
अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने आम तौर पर इस संवेदनशील मुद्दे पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है। ऐसे में ट्रंप के बयान को आयरलैंड के एकीकरण की बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान अपने आप में नॉर्दर्न आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं करता। इस मुद्दे का भविष्य वहां के कानूनी और लोकतांत्रिक तंत्र से तय होगा।
बहस में यूरोप और अर्थव्यवस्था भी महत्वपूर्ण
ब्रिटेन के संवैधानिक भविष्य की चर्चा का एक बड़ा हिस्सा यूरोप से उसके संबंधों से भी जुड़ा है। तीनों क्षेत्रों की कई प्रमुख राजनीतिक पार्टियां यूरोपीय संघ के साथ करीबी रिश्तों की समर्थक हैं।
ब्रिटेन 2020 में आधिकारिक तौर पर यूरोपीय संघ से बाहर हो गया था। इससे पहले 2016 में इस मुद्दे पर जनमत संग्रह हुआ था।
स्कॉटलैंड में बड़ी संख्या में लोगों ने यूरोपीय संघ में बने रहने के पक्ष में मतदान किया था, जबकि पूरे ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ छोड़ने का फैसला किया। Brexit के बाद स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता की बहस को फिर मजबूती मिली।
यदि भविष्य में स्कॉटलैंड या वेल्स स्वतंत्र देश बनते हैं, तो वे यूरोपीय संघ की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं, यदि नॉर्दर्न आयरलैंड आयरलैंड गणराज्य के साथ जुड़ता है, तो वह यूरोपीय संघ के ढांचे में आ जाएगा, क्योंकि आयरलैंड पहले से EU का सदस्य है।
स्कॉटलैंड और इंग्लैंड का 1707 में हुआ विलय
स्कॉटलैंड और इंग्लैंड करीब 300 साल पहले अलग-अलग राजनीतिक इकाइयां थे। दोनों के अपने राजा, संसद और कानून थे। 1603 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मृत्यु के बाद स्कॉटलैंड के राजा जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा बने।
इससे दोनों देशों का शासक एक हो गया, लेकिन स्कॉटलैंड और इंग्लैंड की अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं बनी रहीं।
1707 में दोनों देशों की संसदों के बीच समझौता हुआ और स्कॉटलैंड तथा इंग्लैंड मिलकर ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बने। इसके बाद दोनों की अलग-अलग संसदें नहीं रहीं और एक साझा संसद अस्तित्व में आई।
स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता की मांग कैसे मजबूत हुई?
20वीं सदी में स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की मांग को राजनीतिक आधार मिलने लगा। 1934 में स्कॉटिश नेशनल पार्टी यानी SNP का गठन हुआ। पार्टी का मुख्य उद्देश्य स्कॉटलैंड को स्वतंत्र देश बनाना था।
1999 में स्कॉटलैंड को अपनी संसद और सरकार मिली। इससे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कई क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की शक्ति बढ़ी, जबकि रक्षा और विदेश नीति जैसे प्रमुख विषय ब्रिटेन की केंद्र सरकार के पास रहे।
2014 में स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह कराया गया। इसमें 55% लोगों ने ब्रिटेन के साथ बने रहने के पक्ष में मतदान किया, जबकि 45% ने स्वतंत्रता का समर्थन किया। इसलिए स्कॉटलैंड UK का हिस्सा बना रहा।
2016 के Brexit जनमत संग्रह के बाद स्वतंत्रता की मांग फिर तेज हुई, क्योंकि स्कॉटलैंड में ज्यादातर मतदाताओं ने यूरोपीय संघ में बने रहने का समर्थन किया था।
वेल्स ने कैसे बनाई अपनी अलग राजनीतिक पहचान?
13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर कब्जा कर लिया। इसके बावजूद वेल्स ने अपनी भाषा, संस्कृति और अलग पहचान को बनाए रखा। समय के साथ वेल्श भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन मजबूत हुए।
1925 में प्लाइड कम्री का गठन हुआ। शुरुआत में पार्टी का प्रमुख फोकस वेल्श भाषा और संस्कृति के संरक्षण पर था। बाद में उसने वेल्स को अधिक अधिकार देने और स्वतंत्र देश बनाने की मांग को भी अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल किया।
1999 में वेल्स को अपनी संसद और सरकार मिली। हालांकि, रक्षा और विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण विषय अभी भी UK सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं।
नॉर्दर्न आयरलैंड का इतिहास और दो अलग विचार
1801 में आयरलैंड ब्रिटेन के साथ जुड़ा। हालांकि, आयरलैंड के कई हिस्सों में इस व्यवस्था का विरोध जारी रहा। लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद 1922 में आयरलैंड के अधिकांश हिस्से ने UK से अलग होकर स्वतंत्र देश का रूप लिया।
लेकिन आयरलैंड का उत्तरी हिस्सा, जिसे नॉर्दर्न आयरलैंड कहा जाता है, ब्रिटेन के साथ बना रहा।
यहां ब्रिटेन के साथ रहने के समर्थकों को यूनियनिस्ट कहा जाता है। दूसरी ओर आयरिश राष्ट्रवादी और आयरलैंड के साथ एकीकरण के समर्थक रहे हैं। धार्मिक और राजनीतिक पहचान ने भी इस विभाजन को प्रभावित किया है।
आज नॉर्दर्न आयरलैंड में दो प्रमुख विचार मौजूद हैं—एक पक्ष UK के साथ बने रहने का समर्थन करता है, जबकि दूसरा आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहता है।
ब्रिटेन के लिए आगे की राह क्या?
कार्डिफ में होने वाली बैठक ब्रिटेन की संवैधानिक बहस के लिहाज से महत्वपूर्ण है। तीनों क्षेत्रों के नेताओं का एक साथ बैठना इस बात का संकेत है कि स्थानीय सरकारें अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर अधिक सक्रिय भूमिका चाहती हैं।
हालांकि, स्वतंत्रता या संवैधानिक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रत्येक क्षेत्र में अलग राजनीतिक और कानूनी प्रक्रियाएं लागू होती हैं। इसलिए बैठक के बाद किसी तत्काल संवैधानिक परिवर्तन की उम्मीद के बजाय इसे ब्रिटेन की एकता और उसके भविष्य पर बढ़ती राजनीतिक बहस के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जा सकता है।












