प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने 1920 में अंग्रेजी शासन के दौर में संस्कृत में सिविल सेवा परीक्षा दी थी।
UPSC Centenary Celebration: संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित शताब्दी समारोह को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने आयोग की एक सदी लंबी यात्रा, सिविल सेवा परीक्षा की भूमिका और देश की प्रशासनिक व्यवस्था के विकास पर बात की। अपने संबोधन में पीएम मोदी ने स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग भी साझा किया।
प्रधानमंत्री ने बताया कि समारोह के दौरान लगाई गई प्रदर्शनी देखने पर उन्हें 1920 के दौर से जुड़ी जानकारी मिली। उनके अनुसार, उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और सुभाष चंद्र बोस भी इसी परीक्षा प्रक्रिया से गुजरे थे। पीएम मोदी ने कहा कि उस समय परीक्षा में संस्कृत का प्रश्नपत्र भी होता था और सुभाष चंद्र बोस ने संस्कृत में अपनी परीक्षा दी थी।
UPSC के 100 साल पूरे होने पर क्या बोले पीएम मोदी?
पीएम मोदी ने UPSC की शताब्दी को केवल एक संस्थागत उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं की आकांक्षाओं से जुड़ा अवसर बताया। उन्होंने कहा कि हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा सिविल सेवाओं में जाने का सपना देखते हैं और UPSC पर लोगों का भरोसा इसकी सबसे महत्वपूर्ण पूंजी में से एक है।
प्रधानमंत्री के अनुसार, पिछले 100 वर्षों में पीढ़ियां बदलीं, सरकारों में बदलाव हुआ, तकनीक का विस्तार हुआ और परीक्षा के पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन आया, लेकिन UPSC के प्रति लोगों का विश्वास बना रहा। उन्होंने समारोह में मौजूद लोगों से शताब्दी प्रदर्शनी देखने का आग्रह भी किया। इस अवसर पर UPSC की 100 वर्षों की यात्रा से संबंधित स्मारक डाक टिकट और विशेष सिक्का जारी किया गया। इसके अलावा UPSC और लोक सेवा आयोगों से जुड़े 100 महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों का संकलन भी जारी किया गया।
1920 में सुभाष चंद्र बोस ने दी थी ICS परीक्षा

सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में इंडियन सिविल सर्विस यानी ICS की परीक्षा पास की थी। बाद में उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सेवा में रहने के बजाय स्वतंत्रता आंदोलन का रास्ता चुना। प्रधानमंत्री मोदी ने UPSC के शताब्दी समारोह में उनके परीक्षा अनुभव से जुड़े संस्कृत के इस प्रसंग का उल्लेख किया। पीएम मोदी ने प्रदर्शनी में मौजूद ऐतिहासिक जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि ब्रिटिश शासन के दौर में परीक्षा में संस्कृत का पेपर भी हुआ करता था और नेताजी ने इसे संस्कृत में लिखा था। इस उल्लेख के जरिए उन्होंने UPSC और उससे पहले की सिविल सेवा परीक्षा व्यवस्था के ऐतिहासिक सफर की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।
आजादी के बाद UPSC की भूमिका पर भी चर्चा
प्रधानमंत्री ने ब्रिटिश शासन के समय की प्रशासनिक व्यवस्था और स्वतंत्र भारत की जरूरतों के बीच अंतर का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद देश के सामने केवल स्वतंत्रता बनाए रखने की चुनौती नहीं थी, बल्कि एक नए राष्ट्र का प्रशासनिक ढांचा तैयार करना भी जरूरी था। इसी संदर्भ में पीएम मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को याद किया।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण के लिए जिस मजबूत प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता थी, उसे तैयार करने में पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रधानमंत्री के अनुसार, पटेल ने इस संस्था को मजबूत बनाकर स्वतंत्र भारत के प्रमुख संस्थानों में स्थान दिलाने में योगदान दिया।
'नेशन फर्स्ट' और 'सिटीजन फर्स्ट' पर जोर
UPSC के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री ने भविष्य की सिविल सेवा को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने 'नेशन फर्स्ट' और 'सिटीजन फर्स्ट' को दो महत्वपूर्ण कसौटियां बताया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक सेवाओं में ऐसे युवाओं को आगे आना चाहिए, जो पद के बजाय जनसेवा की भावना से प्रेरित हों। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भर्ती परीक्षा का उद्देश्य केवल उम्मीदवार के ज्ञान का आकलन करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह समझने की कोशिश भी होनी चाहिए कि कोई युवा सिविल सेवा में क्यों आना चाहता है। उनके मुताबिक, 21वीं सदी के भारत में प्रशासन को जन-केंद्रित, सक्रिय और सुशासन आधारित कार्य संस्कृति के साथ आगे बढ़ना होगा।










