उत्तराखंड में करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को लेकर सियासत लगातार तेज होती जा रही है। कांग्रेस की ओर से सरकार पर सरकारी जमीन को निजी निवेशकों के लिए उपलब्ध कराने और भविष्य में इसके निजी हाथों में जाने की आशंका जताए जाने के बाद अब भाजपा ने पलटवार किया है। भाजपा की ओर से कहा गया है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर जनता को भ्रमित कर रही है। भाजपा का कहना है कि सरकार जमीन बेचने की तैयारी नहीं कर रही, बल्कि सरकारी स्वामित्व बरकरार रखते हुए लीज मॉडल के जरिए खाली पड़ी जमीन का उपयोग निवेश और रोजगार बढ़ाने के लिए करने की योजना पर काम हो रहा है।
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता एवं धर्मपुर विधायक विनोद चमोली ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि UIIDB के पास जिस तरह से हजारों बीघा जमीन होने की बात कही जा रही है, वह तस्वीर वास्तविकता से अलग है। उनके मुताबिक UIIDB को केवल 45 एकड़ जमीन मिली है और सरकार का उद्देश्य जमीन का स्वामित्व निजी हाथों में देना नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार लीज मॉडल के माध्यम से निवेश आकर्षित करना चाहती है, जबकि जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा।
यह विवाद उस समय तेज हुआ जब नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश की करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को UIIDB के माध्यम से व्यावसायिक उपयोग और नीलामी की दिशा में ले जाने का आरोप लगाया। आर्य ने सवाल उठाया कि उत्तराखंड जैसे सीमित भू-संसाधनों वाले राज्य में इतनी बड़ी सरकारी भूमि को व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराने के पीछे सरकार की मंशा क्या है। कांग्रेस का कहना है कि इस जमीन का इस्तेमाल स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, विश्वविद्यालय, खेल सुविधाओं, सरकारी संस्थानों और स्थानीय लोगों के लिए रोजगारपरक परियोजनाओं में किया जा सकता है।
कांग्रेस ने इस मुद्दे को केवल जमीन से जुड़ा प्रशासनिक मामला नहीं माना है, बल्कि इसे उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन के अधिकार से जोड़कर राजनीतिक मुद्दा बनाया है। यशपाल आर्य ने कहा है कि राज्य की बेशकीमती सरकारी जमीन आने वाली पीढ़ियों की संपत्ति है और इसे किसी निजी हित के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो कांग्रेस सड़क से सदन तक इस मुद्दे को उठाएगी।
कांग्रेस के आरोपों के जवाब में भाजपा ने अब यह सवाल उठाया है कि अगर सरकारी जमीन वर्षों से खाली पड़ी है और उसका कोई उपयोग नहीं हो रहा, तो उसे रोजगार और निवेश के लिए इस्तेमाल करने का विरोध क्यों किया जा रहा है। भाजपा नेता विनोद चमोली के मुताबिक पर्वतीय राज्य में जमीन का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से अनुपयोगी पड़ा रहता है। यदि ऐसी जमीन पर पर्यटन, वेलनेस, शिक्षा, स्वास्थ्य और आतिथ्य क्षेत्र में निवेश आता है तो उससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
भाजपा का तर्क है कि जमीन बेचने और जमीन को लीज पर देने में बड़ा अंतर है। बिक्री की स्थिति में जमीन का स्वामित्व निजी व्यक्ति या कंपनी के पास चला जाता है, जबकि लीज मॉडल में सरकार जमीन की मालिक बनी रहती है और तय अवधि तथा शर्तों के तहत निजी निवेशक को उसका उपयोग करने का अधिकार दिया जाता है। भाजपा इसी अंतर को आधार बनाकर कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बताते हुए कह रही है कि सरकार सरकारी संपत्ति का स्वामित्व खत्म नहीं कर रही है।
विनोद चमोली ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल का रिकॉर्ड सामने रखने की बात भी कही है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस के शासनकाल में औद्योगिक और अन्य परियोजनाओं के लिए जमीन के हस्तांतरण या नीलामी के फैसले लिए गए थे, जबकि आज भाजपा सरकार जमीन को लीज मॉडल पर देकर निवेश आकर्षित करना चाहती है। भाजपा ने कांग्रेस से सवाल किया है कि जब उसके शासनकाल में जमीन का इस्तेमाल निजी और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए किया गया तो वह विकास था, लेकिन वर्तमान सरकार जमीन का स्वामित्व बरकरार रखते हुए लीज पर निवेश लाना चाहती है तो इसका विरोध क्यों किया जा रहा है।
दरअसल, 7 हजार बीघा सरकारी जमीन का आंकड़ा सामने आने के बाद उत्तराखंड में राजनीतिक बहस काफी तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से इस जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार से पूछा है कि इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी जमीन के व्यावसायिक उपयोग की जरूरत क्यों पड़ी और इससे किसे लाभ मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा है कि जिस राज्य में स्थानीय युवा रोजगार और पलायन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, वहां सरकारी जमीन का इस्तेमाल सबसे पहले स्थानीय जरूरतों को पूरा करने में होना चाहिए।
दूसरी तरफ भाजपा का कहना है कि खाली जमीन को सिर्फ इसलिए अनुपयोगी नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि वह सरकारी संपत्ति है। यदि सरकार उस जमीन का नियोजित इस्तेमाल करके निवेश आकर्षित करती है तो उससे राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है। पर्यटन, होटल, वेलनेस, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी गतिविधियों से प्रत्यक्ष रोजगार के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर परिवहन, छोटे कारोबार, हस्तशिल्प, खान-पान और अन्य सेवाओं के लिए भी अवसर पैदा हो सकते हैं। भाजपा इसी संभावित आर्थिक लाभ को अपने लीज मॉडल का प्रमुख आधार बता रही है।
हालांकि इस पूरे विवाद में जमीन की वास्तविक मात्रा को लेकर ही राजनीतिक मतभेद दिखाई दे रहा है। कांग्रेस जहां करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को UIIDB से जोड़कर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा की ओर से कहा गया है कि UIIDB को केवल 45 एकड़ जमीन मिली है। ऐसे में इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सरकार को जमीन की पूरी सूची, उसका विभागवार विवरण, उसका वर्तमान उपयोग, प्रस्तावित परियोजनाएं और लीज की शर्तें सार्वजनिक करनी होंगी। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि 7 हजार बीघा का आंकड़ा किस श्रेणी की सरकारी जमीन को मिलाकर बताया जा रहा है और UIIDB के पास वास्तविक रूप से कितनी जमीन उपलब्ध है।
कांग्रेस की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि सरकारी जमीन लंबे समय के लिए निजी निवेशकों को दी जाती है तो भविष्य में उसका स्वरूप क्या होगा। कुछ रिपोर्टों में कांग्रेस नेताओं ने लंबी अवधि की लीज, किराये के निर्धारण और व्यावसायिक उपयोग जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस को आशंका है कि लंबे समय की लीज भविष्य में जमीन के नियंत्रण को लेकर जटिल स्थिति पैदा कर सकती है।
कांग्रेस के इन सवालों के बीच भाजपा यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है कि प्रस्तावित व्यवस्था में जमीन की बिक्री नहीं होगी। भाजपा का कहना है कि सरकार का उद्देश्य जमीन से स्थायी स्वामित्व छोड़ना नहीं, बल्कि खाली सरकारी परिसंपत्तियों को आर्थिक गतिविधियों में लगाना है। यदि लीज की शर्तें स्पष्ट, पारदर्शी और सार्वजनिक रहती हैं तो सरकार के पास जमीन का मालिकाना हक बना रहेगा और तय अवधि समाप्त होने के बाद उसके उपयोग को लेकर सरकार निर्णय ले सकेगी।
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में जमीन का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। पहाड़ी राज्य में भूमि संसाधन सीमित हैं और लंबे समय से स्थानीय लोगों के अधिकार, बाहरी निवेश, पलायन और रोजगार के सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं। ऐसे में हजारों बीघा सरकारी जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल की किसी भी योजना पर विपक्ष और सामाजिक संगठनों की नजर रहना स्वाभाविक है।
इसी मुद्दे को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल ने भी विरोध दर्ज कराया है। सितंबर में UKD कार्यकर्ताओं ने UIIDB कार्यालय पहुंचकर करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को निजी कंपनियों या पूंजीपतियों को देने की प्रक्रिया का विरोध किया। संगठन ने निवेश की कुछ प्रस्तावित शर्तों को लेकर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि इससे स्थानीय युवाओं के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं।
दूसरी तरफ सरकार और भाजपा का कहना है कि निवेश को रोकने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे राज्य को आर्थिक फायदा मिले और स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। भाजपा का दावा है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन, वेलनेस, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निवेश से स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में काम मिल सकता है। इससे पलायन को रोकने में भी मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि यह दावा व्यवहार में कितना सफल होगा, यह प्रस्तावित परियोजनाओं, स्थानीय रोजगार की अनिवार्य शर्तों और निवेश की वास्तविक प्रकृति पर निर्भर करेगा।
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सरकारी जमीन से मिलने वाला आर्थिक लाभ किस तरह तय होगा। यदि जमीन लीज पर दी जाती है तो उसकी अवधि, लीज रेंट, निवेश की न्यूनतम सीमा, रोजगार की शर्तें, स्थानीय लोगों की भागीदारी, पर्यावरणीय अनुमति और परियोजना पूरी न होने की स्थिति में जमीन की वापसी जैसी शर्तें बेहद महत्वपूर्ण होंगी। सरकार यदि इन सभी बिंदुओं को सार्वजनिक करती है तो विपक्ष के कई सवालों का जवाब स्वतः मिल सकता है।
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिन जमीनों को निवेश के लिए चिन्हित किया गया है, उनका वर्तमान उपयोग क्या है और उनका स्थानीय समुदायों से क्या संबंध है। वहीं भाजपा का कहना है कि कांग्रेस केवल राजनीतिक विरोध के लिए निवेश और रोजगार से जुड़े प्रयासों का विरोध कर रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के बीच जा रहे हैं और आने वाले दिनों में यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है।
7 हजार बीघा जमीन के सवाल पर अब सबसे ज्यादा निगाह सरकार की ओर से जारी होने वाली आधिकारिक जानकारी पर है। यदि सरकार विभागवार जमीन का विवरण, UIIDB के पास उपलब्ध वास्तविक भूमि, प्रस्तावित परियोजनाओं और लीज नीति की पूरी जानकारी सामने रखती है तो विवाद के कई पहलुओं पर स्थिति साफ हो सकती है। खासकर 7 हजार बीघा और 45 एकड़ के अलग-अलग आंकड़ों को लेकर स्पष्टता जरूरी है, क्योंकि दोनों आंकड़े एक ही चीज को दर्शाते हैं या अलग-अलग श्रेणियों की जमीन को, यह सार्वजनिक दस्तावेजों से ही तय होगा।
फिलहाल भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए साफ संदेश दिया है कि सरकार जमीन बेचने के बजाय लीज मॉडल के जरिए निवेश और रोजगार बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। कांग्रेस दूसरी तरफ इसे सरकारी जमीन के संभावित व्यावसायीकरण का मामला बताते हुए सरकार से पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग कर रही है। ऐसे में उत्तराखंड में जमीन को लेकर चल रही यह राजनीतिक लड़ाई अब केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सरकारी संपत्ति के इस्तेमाल, निवेश नीति, स्थानीय रोजगार और भविष्य में जमीन के स्वामित्व जैसे बड़े सवालों से जुड़ गई है।











