उत्तराखंड में सरकारी जमीन को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी तकरार तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से प्रदेश सरकार पर करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को निजी निवेशकों को लंबे समय के लिए लीज पर देने का आरोप लगाए जाने के बाद भाजपा ने इसका जवाब दिया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के आरोपों को भ्रामक बताते हुए कहा है कि उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड यानी UIIDB को 7 हजार बीघा जमीन नहीं दी गई है। उनके अनुसार UIIDB के पास वर्तमान में केवल करीब 45 एकड़ जमीन ही उपलब्ध कराई गई है। भट्ट का कहना है कि सरकार जमीन बेचने की दिशा में नहीं बढ़ रही, बल्कि लीज मॉडल के जरिए सरकारी भूमि का उपयोग कर निवेश और रोजगार के अवसर पैदा करने की योजना पर काम किया जा रहा है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब कांग्रेस ने सरकारी भूमि के इस्तेमाल और निवेश परियोजनाओं को लेकर धामी सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस की चार्जशीट कमेटी ने हाल में आरोप लगाया कि सरकार UIIDB के माध्यम से करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को निजी निवेशकों को लंबी अवधि के लिए लीज पर देने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस ने दावा किया कि इसमें कुछ जमीन उद्यान विभाग, पोटैटो प्रोजेक्ट, ब्रीडिंग गार्डन और अन्य विभागों की खाली या कम उपयोग वाली भूमि से संबंधित है। पार्टी ने 90 साल तक की लीज, लीज रेंट के लिए कृषि सर्किल रेट और बड़े निवेशकों को जमीन उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस के इस आरोप के बाद भाजपा ने सफाई देते हुए जमीन के वास्तविक इस्तेमाल और UIIDB की भूमिका को अलग-अलग करके देखने की बात कही है। महेंद्र भट्ट के जवाब का मुख्य आधार यह है कि कांग्रेस जिस 7 हजार बीघा जमीन को UIIDB के जरिए निजी हाथों में जाने की बात कह रही है, वह पूरी जमीन बोर्ड को हस्तांतरित नहीं हुई है। भाजपा का कहना है कि UIIDB को फिलहाल करीब 45 एकड़ जमीन मिली है और इसका उद्देश्य जमीन को बेच देना नहीं, बल्कि उसका उपयोग निवेश परियोजनाओं के लिए करना है।
भाजपा की ओर से दिए गए जवाब में लीज मॉडल को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। सरकार का तर्क है कि सरकारी जमीन का मालिकाना हक सरकार के पास ही रह सकता है, जबकि परियोजनाओं के लिए जमीन निर्धारित अवधि के लिए लीज पर दी जा सकती है। इस मॉडल के जरिए ऐसी भूमि का उपयोग किया जा सकता है जो फिलहाल पूरी तरह उपयोग में नहीं आ रही है। सरकार की सोच के मुताबिक इससे निजी निवेश आकर्षित होगा, परियोजनाएं स्थापित होंगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
विवाद की शुरुआत कांग्रेस के उस आरोप से हुई जिसमें पार्टी ने कहा कि उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीन को बड़े कॉरपोरेट और निजी निवेशकों को लंबे समय के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है। कांग्रेस नेता करन माहरा ने आरोप लगाया कि करीब 7 हजार बीघा सरकारी जमीन को 90 साल तक की लीज पर देने का प्रावधान राज्य के भविष्य के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस ने यह भी पूछा कि जब आम लोगों के लिए जमीन खरीदने और भूमि उपयोग से जुड़े नियम कड़े हैं, तो बड़े निवेशकों को इतनी बड़ी सरकारी जमीन लंबे समय के लिए उपलब्ध कराने का औचित्य क्या है।
कांग्रेस ने लीज की अवधि को लेकर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि 90 साल की लंबी अवधि वाली लीज व्यावहारिक तौर पर जमीन के लंबे समय तक निजी उपयोग का रास्ता खोल सकती है। कांग्रेस ने यह आशंका भी जताई कि भविष्य में लीजहोल्ड जमीन को फ्रीहोल्ड में बदलने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि यह कांग्रेस की राजनीतिक आपत्ति और आशंका है; इसे मौजूदा व्यवस्था में जमीन के स्थायी हस्तांतरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
भाजपा का जवाब इसी बिंदु पर केंद्रित है कि लीज और बिक्री में अंतर है। सरकार के पक्ष में दिए गए तर्क के अनुसार लीज पर जमीन देने का मतलब जमीन का मालिकाना हक किसी निजी कंपनी को बेच देना नहीं होता। यदि भूमि लीज मॉडल के तहत दी जाती है तो सरकार शर्तों और अवधि के आधार पर जमीन के उपयोग को नियंत्रित कर सकती है। इसी व्यवस्था के जरिए निवेश परियोजनाओं को जमीन उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है।
महेंद्र भट्ट के अनुसार, सरकारी जमीन को निष्क्रिय छोड़ने के बजाय उसका नियोजित तरीके से इस्तेमाल करने से राज्य को आर्थिक फायदा हो सकता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में रोजगार और निवेश की चुनौती लगातार बनी रहती है। बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध कराने के साथ यदि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, कौशल विकास और स्थानीय कारोबार के अवसर पैदा होते हैं तो इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंच सकता है।
कांग्रेस हालांकि इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं है। उसका कहना है कि सरकारी जमीन किसी भी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होती, बल्कि यह जनता की संपत्ति है। इसलिए इसके इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता, स्थानीय हित और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार यह स्पष्ट करे कि कौन-कौन सी जमीन UIIDB के पास है, उसका कुल क्षेत्रफल कितना है, जमीन का मौजूदा उपयोग क्या है और भविष्य में उसे किन परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि जमीन निवेश परियोजनाओं के लिए दी जाती है तो उसका लीज रेंट किस आधार पर तय होगा। पार्टी का आरोप है कि जिन जमीनों का इस्तेमाल होटल, रिसॉर्ट, टाउनशिप, वेलनेस सेंटर या दूसरे व्यावसायिक कार्यों के लिए होना है, उनके लिए कृषि भूमि के सर्किल रेट को आधार बनाना राज्य के राजस्व के लिए नुकसानदायक हो सकता है। यह आरोप कांग्रेस ने लगाया है और सरकार की ओर से इस पर विस्तृत आधिकारिक गणना या जवाब अलग से सामने आने पर ही वास्तविक वित्तीय प्रभाव स्पष्ट होगा।
इस पूरे विवाद में UIIDB की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड राज्य में निवेश और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के नियोजन और क्रियान्वयन के लिए बनाया गया संस्थागत ढांचा है। सरकारी दस्तावेजों और पुरानी योजनाओं में भी UIIDB से जुड़े बड़े बुनियादी ढांचा और कॉरिडोर विकास कार्यों का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के तौर पर राज्य के बजट से जुड़े दस्तावेजों में हरिद्वार-ऋषिकेश विकास के लिए UIIDB को परामर्श सेवाओं से संबंधित प्रावधान का उल्लेख किया गया था।
सरकार की तरफ से जमीन को निवेश से जोड़ने के पीछे रोजगार को बड़ा आधार बताया जा रहा है। उत्तराखंड में युवाओं के पलायन की समस्या लंबे समय से राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श का विषय रही है। सरकार यदि औद्योगिक, पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी, स्वास्थ्य, शिक्षा या अन्य सेवा क्षेत्र की परियोजनाओं को जमीन उपलब्ध कराती है तो उससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर बनने की संभावना रहती है। हालांकि वास्तविक रोजगार कितना पैदा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जमीन पर कौन सी परियोजनाएं आती हैं, उनमें कितने लोगों को काम मिलता है और स्थानीय लोगों की भागीदारी कितनी सुनिश्चित की जाती है।
यही वजह है कि लीज मॉडल को लेकर पारदर्शिता का सवाल भी महत्वपूर्ण है। यदि सरकारी जमीन लीज पर दी जाती है तो परियोजना की शर्तें, लीज की अवधि, किराया, निवेश की न्यूनतम सीमा, रोजगार की शर्तें, स्थानीय लोगों को प्राथमिकता और परियोजना पूरी नहीं होने की स्थिति में जमीन वापस लेने के प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए। ऐसी जानकारी सार्वजनिक होने पर ही यह आकलन किया जा सकेगा कि जमीन का इस्तेमाल वास्तव में राज्य के आर्थिक हित में हो रहा है या नहीं।
कांग्रेस ने सरकार पर यह भी आरोप लगाया है कि हजारों बीघा जमीन को निजी निवेशकों को उपलब्ध कराने की नीति से स्थानीय लोगों और ग्राम पंचायतों के हित प्रभावित हो सकते हैं। पार्टी का तर्क है कि जिन क्षेत्रों में सरकारी जमीन उपलब्ध है, वहां स्थानीय समुदायों की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। दूसरी तरफ सरकार और भाजपा का जोर इस बात पर है कि निवेश के लिए जमीन उपलब्ध कराने का उद्देश्य राज्य में आर्थिक गतिविधियां बढ़ाना है और इसका मतलब सरकारी जमीन की बिक्री नहीं है।
इस विवाद का एक अहम पहलू यह भी है कि 7 हजार बीघा और 45 एकड़ के आंकड़ों को एक ही संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। कांग्रेस जिस करीब 7 हजार बीघा जमीन की बात कर रही है, वह उसके अनुसार संभावित या चिन्हित सरकारी लैंड बैंक से संबंधित दावा है। भाजपा की ओर से जवाब में UIIDB को वास्तव में उपलब्ध कराई गई जमीन को करीब 45 एकड़ बताया जा रहा है। इसलिए दोनों पक्ष अलग-अलग दायरे और स्थिति की जमीन की बात कर रहे हैं। इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए सरकार की ओर से जिलेवार और खसरा-वार जमीन का सार्वजनिक विवरण जारी करना सबसे स्पष्ट तरीका हो सकता है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो यह विवाद आने वाले समय में और बढ़ सकता है। उत्तराखंड में भूमि और भू-कानून पहले से ही संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे हैं। ऐसे में सरकारी जमीन के निवेश के लिए इस्तेमाल को लेकर विपक्ष सरकार को घेर सकता है। भाजपा की तरफ से भी यह तर्क दिया जा रहा है कि विपक्ष निवेश और रोजगार के अवसरों को लेकर नकारात्मक राजनीति कर रहा है।
कांग्रेस ने 90 साल की लीज, कॉरपोरेट निवेश और कृषि सर्किल रेट जैसे मुद्दों को जोड़कर सरकार की भूमि नीति पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का कहना है कि राज्य की जमीन का उपयोग स्थानीय जनता के हित में होना चाहिए। वहीं भाजपा का जवाब है कि जमीन बेची नहीं जा रही है और लीज मॉडल के जरिए उसका आर्थिक उपयोग किया जाएगा। दोनों पक्षों के बीच मूल विवाद सरकारी जमीन के स्वामित्व से ज्यादा उसके उपयोग, लीज की शर्तों, अवधि और उससे मिलने वाले सार्वजनिक लाभ को लेकर है।
यदि सरकार इस नीति के तहत आगे बढ़ती है तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जमीन के आवंटन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है। किन कंपनियों को जमीन दी जाती है, उनका चयन किस आधार पर होता है, कितना निवेश आता है, कितने रोजगार पैदा होते हैं और स्थानीय लोगों को कितना लाभ मिलता है—इन सवालों के जवाब ही इस नीति की सफलता तय करेंगे।
फिलहाल भाजपा की ओर से कांग्रेस के 7 हजार बीघा जमीन वाले आरोप का जवाब देते हुए यह कहा गया है कि UIIDB को केवल करीब 45 एकड़ जमीन मिली है और जमीन बेचने के बजाय लीज मॉडल पर विकास और रोजगार बढ़ाने की योजना है। दूसरी ओर कांग्रेस अपने आरोपों पर कायम है और सरकार से पूरी भूमि सूची, लीज की शर्तों और राजस्व संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग कर रही है। इसलिए आने वाले दिनों में यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति में सरकारी जमीन, निवेश और रोजगार के सवालों के साथ और जोर पकड़ सकता है।










