देहरादून: उत्तराखंड के हिमाच्छादित और बेहद दुर्गम इलाकों में जनगणना का काम अब शुरू होने जा रहा है। सामान्य क्षेत्रों से अलग इन बर्फीले इलाकों में जनगणना का समय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तय किया गया है। राज्य के चार जिलों के 131 से अधिक हिमाच्छादित गांवों के साथ बदरीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री नगर पंचायत क्षेत्रों में भी जनगणना की जाएगी। इन इलाकों में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी के कारण बड़ी संख्या में स्थानीय लोग निचले क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं, जिससे सामान्य समय पर घर-घर जाकर वास्तविक आबादी का आंकड़ा जुटाना मुश्किल होता है। इसी वजह से इन क्षेत्रों के लिए अलग समय निर्धारित किया गया है।
उत्तराखंड के जिन क्षेत्रों में यह विशेष जनगणना कराई जा रही है, उनमें चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिले शामिल हैं। इन जिलों में कई ऐसे गांव हैं जहां सर्दियों के महीनों में भारी बर्फ जम जाती है और रास्ते बंद होने के कारण सामान्य आवागमन भी प्रभावित हो जाता है। ऐसे में यदि इन गांवों में उसी समय जनगणना कराई जाए तो बड़ी संख्या में मकान खाली मिल सकते हैं और वास्तविक रूप से वहां रहने वाले लोगों की जानकारी दर्ज नहीं हो पाएगी। प्रशासन ने इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए इन क्षेत्रों में जनगणना का कार्यक्रम अलग रखा है।
बदरीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री जैसे धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की स्थिति भी अलग है। सर्दियों में इन स्थानों पर भारी बर्फबारी के कारण स्थानीय गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं। यहां स्थायी आबादी का एक बड़ा हिस्सा मौसम के अनुसार नीचे के क्षेत्रों में चला जाता है। ऐसे में जनगणना के लिए ऐसा समय चुना गया है जब इन क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की मौजूदगी बेहतर तरीके से सुनिश्चित हो सके। इससे जनगणना में दर्ज होने वाला आंकड़ा अधिक वास्तविक होने की उम्मीद है।
अधिकारियों के अनुसार, इन हिमाच्छादित क्षेत्रों में अनुमानित आबादी करीब 52 हजार है। इन क्षेत्रों में जनगणना का काम आसान नहीं होगा, क्योंकि कई गांव ऐसे हैं जहां पहुंचने के लिए कर्मचारियों को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ सकती है। पहाड़ी रास्ते, ऊंचाई, मौसम में अचानक बदलाव और सीमित परिवहन सुविधाएं कर्मचारियों के सामने बड़ी चुनौती होंगी। इसके बावजूद प्रशासन ने घर-घर जाकर लोगों का डेटा जुटाने की तैयारी पूरी कर ली है।
इन इलाकों में जनगणना के लिए बड़ी संख्या में प्रगणक और सुपरवाइजर लगाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक हिमाच्छादित क्षेत्रों में 162 प्रगणक और 34 सुपरवाइजर तैनात किए गए हैं। अलग-अलग गांवों और क्षेत्रों के लिए कर्मचारियों को जिम्मेदारी दी गई है, ताकि दुर्गम इलाकों में भी कोई घर और परिवार जनगणना से छूट न जाए।
जनगणना कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक परिस्थितियों की है। मैदानी इलाकों की तरह यहां एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचना आसान नहीं होता। कई जगह सड़क खत्म होने के बाद पैदल रास्ते से आगे जाना पड़ता है। कुछ गांवों तक पहुंचने में कई घंटे लग सकते हैं। बारिश, भूस्खलन या रास्ते में किसी तरह की बाधा आने पर कर्मचारियों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया को मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संचालित करना होगा।
इन क्षेत्रों में जनगणना के लिए डिजिटल माध्यम का भी इस्तेमाल किया जाएगा। डिजिटल प्रक्रिया से डेटा दर्ज करने और उसे आगे भेजने में सुविधा हो सकती है, लेकिन पहाड़ी इलाकों में इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी अपने आप में एक चुनौती है। ऐसे क्षेत्रों में नेटवर्क उपलब्धता हर जगह समान नहीं होती। कर्मचारियों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि डेटा सुरक्षित तरीके से दर्ज हो और नेटवर्क की समस्या के कारण किसी परिवार की जानकारी अधूरी न रह जाए।
जनगणना को लेकर लोगों को साइबर ठगी से बचाने की सलाह भी दी जा रही है। खासतौर पर OTP को लेकर लोगों को सतर्क रहने को कहा गया है। जनगणना के नाम पर कोई व्यक्ति यदि फोन पर OTP मांगता है तो उसे साझा नहीं करना चाहिए। आम लोगों को यह समझना जरूरी है कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ बैंकिंग, वित्तीय या निजी सुरक्षा से जुड़ा OTP साझा करने से धोखाधड़ी का खतरा हो सकता है। इसलिए जनगणना प्रक्रिया के दौरान भी नागरिकों को अपनी डिजिटल सुरक्षा का ध्यान रखना होगा।
सरकार की ओर से जनगणना प्रक्रिया को अधिक तकनीक आधारित बनाने पर जोर दिया जा रहा है। डिजिटल माध्यम से जानकारी दर्ज होने के कारण डेटा प्रबंधन और निगरानी को आसान बनाने की उम्मीद है। हालांकि दुर्गम क्षेत्रों में इंटरनेट और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता अलग-अलग हो सकती है। ऐसे में कर्मचारियों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार काम करना होगा।
उत्तराखंड के हिमाच्छादित गांवों में जनगणना कराने का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि पलायन के कारण आबादी के वास्तविक आंकड़े में अंतर न आए। पहाड़ के कई गांवों में मौसम के अनुसार लोगों की आवाजाही होती है। सर्दियों में परिवारों का एक हिस्सा निचले क्षेत्रों में चला जाता है और मौसम सुधरने के बाद वापस लौटता है। यदि जनगणना गलत समय पर की जाए तो ऐसे परिवारों की वास्तविक स्थिति का सही आकलन करना मुश्किल हो सकता है।
इसी तरह बदरीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री जैसे स्थानों पर भी मौसम के कारण आबादी की स्थिति बदलती रहती है। यात्रा सीजन के दौरान इन क्षेत्रों में लोगों की संख्या काफी बढ़ जाती है, जबकि सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण स्थानीय गतिविधियां सीमित हो जाती हैं। इसलिए इन क्षेत्रों की जनगणना के लिए मौसम को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। अधिकारियों ने इसी वजह से इन क्षेत्रों के लिए अलग समय तय किया है।
उत्तराखंड में जनगणना की यह प्रक्रिया सिर्फ आबादी गिनने तक सीमित नहीं है। जनगणना से मिलने वाला डेटा भविष्य की विकास योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। किस क्षेत्र में कितनी आबादी है, वहां कितने परिवार रहते हैं, लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति कैसी है, किस तरह की सुविधाओं की जरूरत है और किन क्षेत्रों में सरकारी संसाधनों की आवश्यकता अधिक है, इन सबकी योजना बनाने में जनगणना के आंकड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दुर्गम गांवों के लिए यह डेटा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, संचार और दूसरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सही आबादी का आंकड़ा जरूरी है। यदि किसी गांव की वास्तविक आबादी सरकारी रिकॉर्ड में कम दर्ज हो जाए तो भविष्य की योजनाओं में उस गांव की जरूरतों का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए प्रशासन की कोशिश है कि इस बार किसी भी परिवार को जनगणना से बाहर न रखा जाए।
कर्मचारियों को स्थानीय परिस्थितियों और जनगणना प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी के आधार पर काम करने के लिए तैयार किया गया है। उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि हर परिवार से निर्धारित जानकारी सही तरीके से दर्ज की जाए। लोगों की ओर से दी गई जानकारी को सावधानीपूर्वक रिकॉर्ड करना और डेटा की गोपनीयता बनाए रखना भी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से भी सहयोग की अपील की गई है। जनगणना कर्मचारी जब घर पहुंचे तो परिवार के सदस्य सही जानकारी उपलब्ध कराएं। यदि किसी सवाल को लेकर भ्रम हो तो कर्मचारी से जानकारी ली जा सकती है। साथ ही किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने, बैंकिंग जानकारी साझा करने या OTP देने से बचना जरूरी है।
दुर्गम क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी। ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम तेजी से बदल सकता है। बारिश, बर्फबारी, तेज हवाएं या रास्तों में बाधा आने पर कर्मचारियों की यात्रा प्रभावित हो सकती है। इसलिए स्थानीय प्रशासन को मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखनी होगी और जरूरत पड़ने पर कर्मचारियों के कार्यक्रम में बदलाव भी करना पड़ सकता है।
चार जिलों के 131 गांवों और तीन नगर पंचायत क्षेत्रों में यह अभियान उत्तराखंड की भौगोलिक विविधता को भी सामने लाता है। राज्य का एक हिस्सा मैदानी और आसानी से पहुंच योग्य है, जबकि दूसरा हिस्सा बेहद ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाला है। एक ही राज्य में जनगणना के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाने की जरूरत इसी वजह से पड़ती है।
पिथौरागढ़ में 35 हिमाच्छादित गांव, चमोली में 23 गांव और बदरीनाथ नगर पंचायत, रुद्रप्रयाग में चार गांव और केदारनाथ नगर पंचायत तथा उत्तरकाशी में 69 गांव और गंगोत्री नगर पंचायत इस विशेष अभियान का हिस्सा हैं। इन इलाकों में मौसम के कारण आबादी की आवाजाही और पहुंच की कठिनाइयों को देखते हुए सितंबर का समय चुना गया है।
उत्तरकाशी जिले में सबसे अधिक 69 हिमाच्छादित गांव इस प्रक्रिया में शामिल हैं। चमोली में बदरीनाथ क्षेत्र के कारण धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से भी यह अभियान महत्वपूर्ण है। रुद्रप्रयाग में केदारनाथ क्षेत्र और उत्तरकाशी में गंगोत्री क्षेत्र की मौजूदगी इसे और विशेष बनाती है। इन स्थानों की जनगणना के आंकड़े स्थानीय प्रशासन और भविष्य की विकास योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अधिकारियों का मानना है कि मौसम अनुकूल होने के दौरान इन क्षेत्रों में जनगणना कराने से वास्तविक निवासियों का डेटा बेहतर तरीके से दर्ज किया जा सकेगा। यदि बर्फबारी के चरम समय में कर्मचारी इन क्षेत्रों में पहुंचते तो कई घर बंद मिल सकते थे और लोगों के निचले क्षेत्रों में चले जाने के कारण वास्तविक आंकड़ा प्रभावित हो सकता था। इसलिए सितंबर का समय व्यावहारिक रूप से अधिक उपयुक्त माना गया है।
इस विशेष अभियान की शुरुआत के साथ जनगणना कर्मचारी अब दुर्गम गांवों की ओर रवाना होंगे। कई कर्मचारियों को ऐसे रास्तों से गुजरना होगा जहां सामान्य वाहनों की पहुंच सीमित है। उन्हें स्थानीय लोगों और प्रशासन के सहयोग से गांवों तक पहुंचना होगा। घर-घर जाकर परिवारों की जानकारी दर्ज करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी घर को गलती से छोड़ न दिया जाए।
लोगों को OTP साझा न करने की सलाह इस अभियान का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा संदेश है। आज डिजिटल धोखाधड़ी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं और सरकारी योजनाओं या जनगणना के नाम पर ठगी की कोशिश भी की जा सकती है। ऐसे में नागरिकों को किसी भी अनजान व्यक्ति को फोन पर प्राप्त OTP नहीं बताना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति खुद को जनगणना कर्मचारी बताकर संदिग्ध तरीके से जानकारी या पैसे मांगता है तो उसकी पुष्टि संबंधित प्रशासन से करनी चाहिए।
फिलहाल उत्तराखंड के हिमाच्छादित और दुर्गम क्षेत्रों में जनगणना को लेकर प्रशासन ने तैयारियां पूरी कर ली हैं। 131 से अधिक गांवों और बदरीनाथ, केदारनाथ तथा गंगोत्री के नगर पंचायत क्षेत्रों में कर्मचारी घर-घर पहुंचकर आबादी का डेटा जुटाएंगे। करीब 52 हजार की अनुमानित आबादी वाले इन क्षेत्रों में सटीक आंकड़ा जुटाना आसान नहीं होगा, लेकिन मौसम के अनुकूल समय और विशेष टीमों की तैनाती से प्रक्रिया को बेहतर तरीके से पूरा करने की उम्मीद है।
उत्तराखंड के लिए यह अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक आबादी और वहां होने वाले मौसमी पलायन को सही तरीके से दर्ज करना भविष्य की योजनाओं के लिए जरूरी है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और रोजगार से जुड़ी योजनाएं तभी प्रभावी तरीके से बनाई जा सकती हैं जब सरकार के पास क्षेत्रवार वास्तविक जनसंख्या का भरोसेमंद डेटा हो। ऐसे में दुर्गम क्षेत्रों में होने वाली यह विशेष जनगणना केवल आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में पहाड़ी क्षेत्रों के विकास की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।










