उत्तराखंड में शारदीय नवरात्र की नवमी इस बार महिला सम्मान और नारी सशक्तीकरण के संदेश के साथ खास बनाने की तैयारी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी प्रखंडों में अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं को सम्मानित करने की पहल का प्रस्ताव तैयार किया है। योजना के तहत प्रत्येक प्रखंड से नौ महिलाओं का चयन कर उन्हें ‘नौ देवियों’ के रूप में सम्मानित किए जाने की बात सामने आई है। चिकित्सा, शिक्षा, खेल, समाजसेवा समेत अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर समाज और प्रदेश की प्रगति में योगदान देने वाली महिलाओं को इस सम्मान के लिए चुना जाएगा।
शारदीय नवरात्र के दौरान देशभर में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसे में नवमी के दिन उत्तराखंड के विकासखंडों में नौ महिलाओं को सम्मानित करने की यह पहल धार्मिक परंपरा और सामाजिक सम्मान को एक साथ जोड़ने का प्रयास मानी जा रही है। प्रस्ताव के अनुसार उन महिलाओं को सामने लाया जाएगा, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में काम करते हुए समाज के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया है। इससे स्थानीय स्तर पर काम कर रही ऐसी महिलाओं को पहचान मिलने की संभावना है, जिनके योगदान की चर्चा अक्सर बड़े मंचों तक नहीं पहुंच पाती।
जानकारी के अनुसार इस संबंध में प्रस्ताव चार अक्टूबर को चंपावत में होने वाली राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में रखा जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद इस पहल को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होगी। यदि प्रस्ताव स्वीकृत होता है तो महानवमी के अवसर पर प्रदेश के प्रत्येक प्रखंड में नौ महिलाओं को सम्मानित करने का कार्यक्रम आयोजित किया जा सकता है।
इस पहल में महिलाओं के चयन के लिए उनके काम और योगदान को प्रमुख आधार बनाया जाएगा। चिकित्सा के क्षेत्र में मरीजों और समाज की सेवा करने वाली महिलाएं, शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों और युवाओं के भविष्य को आकार देने वाली शिक्षिकाएं एवं अन्य महिला कर्मी, खेल में प्रदेश और देश का प्रतिनिधित्व करने वाली खिलाड़ी, समाजसेवा में सक्रिय महिलाएं तथा दूसरे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को इसमें शामिल किया जा सकता है। इस तरह सम्मान का दायरा किसी एक पेशे या वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रही महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश होगी।
उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में जाना जाता है और यहां नवरात्र के दौरान देवी उपासना की विशेष परंपरा रही है। ऐसे में ‘नौ देवियों’ के रूप में समाज की वास्तविक जीवन में योगदान देने वाली महिलाओं का सम्मान करने का विचार सांस्कृतिक प्रतीक से भी जुड़ता है। सरकार की ओर से इस पहल के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि महिलाओं को केवल पूजा और परंपरा में सम्मान देने के बजाय उनके वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और सार्वजनिक योगदान को भी पहचान मिलनी चाहिए।
इस प्रस्तावित कार्यक्रम को महिला सशक्तीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। इसका एक उद्देश्य यह भी हो सकता है कि ग्रामीण और विकासखंड स्तर पर काम करने वाली महिलाओं की उपलब्धियों को स्थानीय समाज के सामने लाया जाए। किसी महिला ने गांव में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में काम किया हो, किसी ने शिक्षा के जरिए बच्चों के जीवन में बदलाव लाया हो, किसी खिलाड़ी ने प्रदेश का नाम रोशन किया हो या किसी महिला ने समाजसेवा और स्वरोजगार के जरिए दूसरे लोगों के लिए अवसर तैयार किए हों, ऐसे योगदानों को सार्वजनिक सम्मान देने से उनकी पहचान मजबूत हो सकती है।
राज्य सरकार पहले से ही महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ी कई योजनाएं संचालित कर रही है। इनमें नंदा गौरा योजना, मुख्यमंत्री एकल महिला स्वरोजगार योजना और मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना का उल्लेख किया गया है। इन योजनाओं का उद्देश्य अलग-अलग स्तर पर महिलाओं को सहायता, अवसर और आत्मनिर्भरता से जोड़ना है।
महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के संदर्भ में उत्तराखंड सरकार की ओर से स्वयं सहायता समूहों और ‘लखपति दीदी’ जैसी पहलों पर भी जोर दिया गया है। राज्य के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के अनुसार अगस्त 2026 तक उत्तराखंड में लखपति दीदियों की संख्या तीन लाख से अधिक हो चुकी थी। सरकार ने वर्ष 2026-27 में 1.12 लाख और महिलाओं को इस श्रेणी तक पहुंचाने का लक्ष्य भी बताया है।
इससे स्पष्ट है कि महिलाओं के सम्मान को केवल कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय आर्थिक गतिविधियों और आजीविका के अवसरों से जोड़ने की दिशा में भी योजनाएं चल रही हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बड़ी संख्या में महिलाएं स्थानीय स्तर पर अलग-अलग आर्थिक गतिविधियों से जुड़ रही हैं। ऐसी स्थिति में नवमी पर प्रखंड स्तर पर महिलाओं को सम्मानित करने का कार्यक्रम सामाजिक पहचान और आर्थिक सशक्तीकरण के संदेश को एक साथ सामने ला सकता है।
सरकारी नौकरियों में उत्तराखंड की मूल निवासी महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान भी राज्य सरकार की महिला-केंद्रित नीतियों में शामिल है। इसके साथ ही महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता से जोड़ने वाली योजनाओं को भी सरकार अपनी प्राथमिकताओं में गिनाती रही है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी अलग-अलग अवसरों पर महिलाओं की भूमिका और योगदान को रेखांकित करते रहे हैं। अगस्त 2026 में एक महिला सम्मान कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की आर्थिक भूमिका और राज्य के विकास में उनके योगदान का उल्लेख किया था। सरकार की ओर से ‘ड्रोन दीदी’, ‘सोलर सखी’ और ‘महिला सारथी’ जैसी पहलों के जरिए महिलाओं को नए आर्थिक अवसरों और तकनीक से जोड़ने की बात भी कही गई है।
ऐसे में महानवमी पर प्रस्तावित ‘नौ देवियों’ का सम्मान कार्यक्रम महिला सशक्तीकरण की इसी व्यापक नीति के स्थानीय स्वरूप के तौर पर सामने आ सकता है। खास बात यह है कि इसमें सम्मान का केंद्र बड़े शहरों या राज्य स्तर पर चर्चित चेहरों के बजाय प्रत्येक विकासखंड से चुनी जाने वाली महिलाओं को बनाया जाएगा। इससे गांवों और छोटे कस्बों में काम करने वाली महिलाओं की उपलब्धियों को भी सार्वजनिक मंच मिलने की संभावना है।
नवरात्र में देवी के नौ रूपों की पूजा के साथ महिलाओं के सम्मान को जोड़ने का यह विचार सामाजिक संदेश के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। धार्मिक आस्था के इस पर्व पर जब घर-घर और मंदिरों में देवी के विभिन्न स्वरूपों की आराधना होती है, उसी समय समाज में वास्तविक योगदान देने वाली महिलाओं को सम्मानित करने का कार्यक्रम महिला गरिमा, आत्मनिर्भरता और भागीदारी पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
सरकार के प्रस्ताव के अनुसार प्रत्येक प्रखंड में नौ महिलाओं का चयन किया जाएगा। यानी सम्मान का यह कार्यक्रम यदि पूरे प्रदेश में लागू होता है तो बड़ी संख्या में महिलाओं को एक साथ सार्वजनिक रूप से पहचान मिलेगी। चयन के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किए जाने की संभावना है, ताकि चिकित्सा, शिक्षा, खेल, समाजसेवा और अन्य क्षेत्रों में काम कर रही महिलाओं की उपलब्धियां सामने आ सकें।
इस पहल की एक खास बात यह भी है कि इसमें महिला सम्मान को स्थानीय स्तर से जोड़ने की कोशिश की गई है। किसी राज्य की महिला सशक्तीकरण नीति तभी व्यापक प्रभाव डाल सकती है जब उसका असर राजधानी और बड़े शहरों के साथ-साथ गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में भी दिखाई दे। विकासखंड स्तर पर महिलाओं को सम्मानित करने से स्थानीय समुदाय को उनके काम के बारे में जानने का अवसर मिल सकता है और दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।
उत्तराखंड में महिलाओं की भूमिका सामाजिक जीवन के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में परिवार, कृषि, स्वरोजगार, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में महिलाओं की उपलब्धियों को औपचारिक सम्मान देने की पहल स्थानीय स्तर पर उनकी भूमिका को और अधिक सार्वजनिक पहचान देने की दिशा में कदम हो सकती है।
हालांकि इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से लागू करने के लिए चार अक्टूबर की चंपावत कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव पर निर्णय होना जरूरी है। अभी उपलब्ध जानकारी के अनुसार सरकार इस पहल को कैबिनेट के सामने रखने की तैयारी में है। इसलिए कार्यक्रम की अंतिम रूपरेखा, चयन की प्रक्रिया और सम्मान समारोह से जुड़ी विस्तृत व्यवस्थाएं कैबिनेट निर्णय और उसके बाद जारी होने वाले दिशा-निर्देशों के आधार पर स्पष्ट होंगी।
यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो महानवमी के अवसर पर उत्तराखंड के अलग-अलग विकासखंडों में एक साथ महिला सम्मान कार्यक्रम आयोजित किए जाने की तस्वीर सामने आ सकती है। इससे नवरात्र के धार्मिक उत्सव के बीच महिला उपलब्धियों को भी प्रमुखता मिलेगी। सरकार इसे देवभूमि से देशभर तक नारी सम्मान और सशक्तीकरण का संदेश पहुंचाने वाली पहल के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
इस पूरी पहल का केंद्र महिलाओं की उपलब्धियों को पहचान देना है। चिकित्सा से लेकर शिक्षा तक, खेल से लेकर समाजसेवा तक और स्वरोजगार से लेकर अन्य सामाजिक क्षेत्रों तक अपनी भूमिका निभाने वाली महिलाओं को सामने लाने से यह संदेश दिया जा सकता है कि समाज के विकास में महिलाओं की भागीदारी केवल परिवार तक सीमित नहीं है। वे सार्वजनिक जीवन, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामाजिक बदलाव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
महानवमी के दिन नौ महिलाओं को ‘नौ देवियों’ के रूप में सम्मानित करने की परिकल्पना इसी प्रतीकात्मकता को मजबूत करती है। उत्तराखंड में यदि यह कार्यक्रम लागू होता है तो आने वाले वर्षों में यह नवमी के अवसर पर महिला योगदान को याद करने और सम्मानित करने की एक नियमित परंपरा का रूप भी ले सकता है। फिलहाल सभी की नजर चार अक्टूबर को चंपावत में होने वाली कैबिनेट बैठक पर है, जहां इस प्रस्ताव की अगली तस्वीर स्पष्ट होगी।












