World Hearing Day: गर्भ में ही पता चलेगा बच्चे का सुनने का स्वास्थ्य, एम्स कर रहा रिसर्च

World Hearing Day: गर्भ में ही पता चलेगा बच्चे का सुनने का स्वास्थ्य, एम्स कर रहा रिसर्च

एम्स दिल्ली के ईएनटी विभाग ने गर्भ में ही बच्चे की सुनने की क्षमता का पता लगाने के प्रयास शुरू किए हैं। इससे समय पर सुनने की समस्या की पहचान और इलाज संभव होगा। जन्म के बाद नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग के माध्यम से भी शिशुओं की सुनने की क्षमता का परीक्षण किया जाता है। कॉक्लियर इम्प्लांट और ऑडिटरी ब्रेन स्टेम तकनीकें गंभीर मामलों में मददगार साबित होती हैं।

World Hearing 2026: एम्स दिल्ली में ईएनटी विभाग ने गर्भ में ही बच्चे की सुनने की क्षमता की जांच के लिए नए टेस्ट विकसित करना शुरू किया है। इस पहल का उद्देश्य जन्म से पहले ही सुनने की समस्याओं की पहचान करना है ताकि समय पर इलाज संभव हो सके। प्रोफेसर डॉ. कपिल सिक्का के अनुसार, यह कदम शिशुओं के भाषा और संज्ञानात्मक विकास में सुधार लाने में मदद करेगा। वर्तमान में जन्म के बाद नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग की जाती है, लेकिन कई अस्पतालों में यह समय पर नहीं होती।

गर्भ में ही बच्चे के सुनने की क्षमता का पता लगाने का प्रयास

एम्स दिल्ली में ईएनटी विभाग गर्भ में ही बच्चे की सुनने की क्षमता का पता लगाने पर काम कर रहा है। प्रोफेसर डॉ. कपिल सिक्का के मुताबिक, बच्चे के जन्म से पहले सुनने की क्षमता का आकलन करने वाले टेस्ट विकसित किए जा रहे हैं। यह कदम समय से पहले सुनने की समस्या की पहचान और इलाज में मदद करेगा।

डॉ. सिक्का ने बताया कि वर्तमान में जन्म के बाद नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग करनी होती है। हालांकि कई अस्पतालों में यह स्क्रीनिंग समय पर नहीं हो पाती, जिससे बच्चों के सुनने की कमी का पता अक्सर देर से चलता है। एम्स में यूनिवर्सल नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग लागू की जा रही है।

जन्म के पहले और बाद की स्क्रीनिंग क्यों जरूरी है

जन्म के पहले बच्चे की सुनने की क्षमता का पता चलने से शुरुआती इलाज संभव होता है और भाषा विकास पर असर नहीं पड़ता। डॉ. सिक्का ने कहा कि जन्म के पहले छह महीनों में पहचान हो जाए तो सुधार की संभावना सबसे अधिक रहती है।

जन्म के बाद स्क्रीनिंग में भी बच्चों की सुनने की कमी पता लगाई जा सकती है। इसके लिए 24 से 48 घंटे के भीतर नियोनेटल हियरिंग टेस्ट किया जाता है। यह जांच प्राथमिक स्तर पर बच्चों में सुनने की समस्या की पहचान करने में मदद करती है।

सुनने की कमी का समाधान और तकनीकी मदद

डॉ. कपिल ने बताया कि जिन शिशुओं में सुनने की गंभीर कमी पाई जाती है, उन्हें कॉक्लियर इम्प्लांट से सुधारा जा सकता है। इसके अलावा ऑडिटरी ब्रेन स्टेम इम्प्लांट जैसी तकनीकें उन बच्चों में भी मदद करती हैं, जिनमें नर्व डेफनेस ज्यादा होती है।

इस तरह के उपचार से बच्चों की सुनने की क्षमता में सुधार आता है और उनका भाषाई विकास सामान्य गति से होता है। शुरुआती पहचान और तकनीकी मदद के संयोजन से भविष्य में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

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