2026 में भारत की 'Neighbourhood First' नीति की परीक्षा, पड़ोसियों से संतुलन साधना बना चुनौतीपूर्ण

2026 में भारत की 'Neighbourhood First' नीति की परीक्षा, पड़ोसियों से संतुलन साधना बना चुनौतीपूर्ण

2026 में भारत की ‘Neighbourhood First’ नीति सबसे बड़ी परीक्षा देने वाली है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता, सेना का बढ़ता प्रभाव और युवा असंतोष भारत के लिए पड़ोसी संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी कर रहे हैं।

New Delhi: साल 2026 में भारत की 'Neighbourhood First' यानी पड़ोसी पहले नीति की सबसे कठिन परीक्षा होने जा रही है। बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल तीनों ही देश राजनीतिक और सामाजिक संकटों से गुजर रहे हैं। इनमें चुनावी अस्थिरता, सेना का बढ़ता प्रभाव और युवा असंतोष शामिल हैं। इन परिस्थितियों से भारत को सीमा पार आतंकवाद, शरणार्थी संकट और कट्टरपंथ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे समय में भारत को क्षेत्रीय सहयोग, कूटनीति और रणनीतिक संवाद के जरिए संतुलन साधना होगा।

बांग्लादेश में चुनावी अस्थिरता

बांग्लादेश में 2026 की सबसे बड़ी चुनौती फरवरी में होने वाले आम चुनाव हैं। पिछले एक दशक से शेख हसीना और उनकी पार्टी आवामी लीग सत्ता में रही, लेकिन आलोचकों के मुताबिक यह मैनेज्ड डेमोक्रेसी थी। हसीना के सत्ता से हटने और नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार बनने के बाद स्थिति और जटिल हो गई। भारत विरोधी प्रदर्शन, बदले की राजनीति और प्रशासनिक ठहराव ने हालात को और अस्थिर बना दिया है।

चुनाव में मुख्य मुकाबला तीन ताकतों के बीच है। नेशनल सिटिजन्स पार्टी जो छात्र आंदोलन से उभरी है, भ्रष्टाचार विरोधी और सेक्युलर सुधारों की बात करती है, लेकिन संगठन की कमजोरी इसे चुनौती देती है। दूसरी है जमात-ए-इस्लामी, जो मदरसा नेटवर्क और सड़कों की ताकत के दम पर लौट रही है और भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। तीसरी है बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, जो लंबे समय से दबी हुई थी। पार्टी के नेता तारिक रहमान 17 साल बाद लौटे हैं और उनकी लोकप्रियता है, लेकिन वोट में इसका असर कितना होगा यह अनिश्चित है।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी अस्थिर है। गारमेंट निर्यात 50 अरब डॉलर का है, लेकिन बेरोजगारी 40% से ज्यादा है, GDP में गिरावट 4% रही है और कट्टरपंथ और शरणार्थी संकट का खतरा बढ़ रहा है। भारत के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है और पड़ोसी देश में स्थिरता बनाए रखना जरूरी है।

पाकिस्तान में सेना का बढ़ता वर्चस्व

पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति भी भारत के लिए चिंता का विषय है। 2026 में देश का लोकतंत्र कमजोर और सेना बेहद ताकतवर है। सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने पिछले वर्षों के राजनीतिक संकट का फायदा उठाकर धीरे-धीरे सत्ता पर कब्जा कर लिया है। वे अब फील्ड मार्शल और देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज हैं। 27वें संविधान संशोधन ने सेना को अभूतपूर्व शक्ति दे दी है।

इमरान खान की पार्टी PTI को राजनीति से लगभग बाहर किया जा चुका है। खुद इमरान खान जेल में हैं, लेकिन उनका जनाधार शहरी युवा और मध्यम वर्ग में मजबूत है। जेल से भेजे संदेशों में वे मुनीर को तानाशाह बताते रहे हैं।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था IMF और विदेशी मदद पर टिकी है। महंगाई, बिजली संकट और टैक्स बोझ आम नागरिकों के लिए चुनौती बन चुके हैं। सुरक्षा स्थिति भी नाजुक है। TTP के हमले बढ़ रहे हैं, अफगानिस्तान और ईरान से तनाव है और LoC पर स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में पाकिस्तान भारत के लिए ऐसा पड़ोसी है जो स्थिर नहीं और रणनीति बदलने को भी तैयार नहीं है।

नेपाल में युवाओं का असंतोष

नेपाल मार्च 2026 के चुनाव की ओर बढ़ रहा है, लेकिन माहौल सामान्य नहीं है। 2025 में युवा आंदोलनों ने प्रधानमंत्री केपी ओली की सरकार गिरा दी। 40% से ज्यादा युवा मतदाता अब सिस्टम बदलने के मूड में हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों ने युवाओं की आक्रामकता बढ़ा दी है।

युवा आंदोलनों में भारत विरोधी नारे आम हो गए हैं। भारत विरोधी हैशटैग, भारतीय उत्पादों के बहिष्कार और सीमा विवाद की चर्चा बढ़ रही है। युवाओं की मांग रोजगार, भ्रष्टाचार पर सख्ती, टेक और इको-टूरिज्म में नौकरियां और जलवायु सुरक्षा की है। नई पार्टियां जैसे नेपाल युथ वैनगार्ड पुराने दलों जैसे नेपाली कांग्रेस और CPN-UML को चुनौती दे सकती हैं। नेपाल को चीन और भारत के बीच संतुलन बनाए रखना है, लेकिन भारत विरोधी भावनाएं राजनीतिक हथियार बनती जा रही हैं।

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