आज का इतिहास: 16 मई को अटल बिहारी वाजपेयी बने भारत के 13वें प्रधानमंत्री, सिर्फ 13 दिन चली सरकार

16 मई 1996 भारतीय राजनीति के इतिहास में खास दिन माना जाता है, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। हालांकि उनकी

आज, 16 मई भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तारीख मानी जाती है। इसी दिन वर्ष 1996 में Atal Bihari Vajpayee ने भारत के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी। यह पहली बार था जब Bharatiya Janata Party के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी थी।

नई दिल्ली: 16 मई भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण तारीख मानी जाती है। इसी दिन वर्ष 1996 में Atal Bihari Vajpayee ने भारत के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। हालांकि, उनकी यह सरकार केवल 13 दिनों तक ही चल सकी। बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें 28 मई 1996 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बावजूद यह कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

वाजपेयी का वह दौर भारतीय राजनीति में गठबंधन युग की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है, जब राष्ट्रीय दलों के साथ क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका तेजी से बढ़ने लगी थी।

1996 का चुनाव: किसी को नहीं मिला स्पष्ट बहुमत

1996 के लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प चुनावों में गिने जाते हैं। अप्रैल और मई में हुए इन चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। Bharatiya Janata Party पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसने 161 सीटें जीतीं। वहीं Indian National Congress को 140 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव भी साफ दिखाई दिया। 543 सदस्यीय लोकसभा में 129 सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियों ने जीत दर्ज की, जिसने केंद्र की राजनीति का समीकरण बदल दिया। विश्लेषकों के अनुसार, यह वह दौर था जब भारतीय राजनीति दो-दलीय मुकाबले से निकलकर गठबंधन राजनीति की ओर बढ़ रही थी।

कांग्रेस में टूट का असर

1996 के चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी कई आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रही थी। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अलग होकर नई राजनीतिक पार्टियां बना ली थीं। N. D. Tiwari ने ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) बनाई, जबकि Madhavrao Scindia ने मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस का गठन किया। दक्षिण भारत में G. K. Moopanar ने तमिल मनीला कांग्रेस बनाई। इन विभाजनों का सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ और पार्टी बहुमत से काफी दूर रह गई।

चूंकि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी, इसलिए तत्कालीन राष्ट्रपति Shankar Dayal Sharma ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। 16 मई 1996 को वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उन्हें संसद में बहुमत साबित करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया।वाजपेयी ने सहयोगी दलों का समर्थन जुटाने की पूरी कोशिश की। Shiromani Akali Dal ने पंजाब में मिली अपनी सीटों के आधार पर बीजेपी का समर्थन किया। 

इसके अलावा Bahujan Samaj Party ने भी शुरुआती समर्थन का संकेत दिया था। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं और पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका।

13 दिन बाद देना पड़ा इस्तीफा

बहुमत का आंकड़ा हासिल न कर पाने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी ने 28 मई 1996 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला किया। इस्तीफे से पहले उन्होंने संसद में एक ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसे भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली भाषणों में गिना जाता है। अपने संबोधन में वाजपेयी ने कहा था कि उनकी पार्टी को मिला जनादेश वर्षों के संघर्ष और समर्पण का परिणाम है। 

उन्होंने गठबंधन राजनीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कई छोटी पार्टियां राज्यों में अलग-अलग लड़ती हैं, लेकिन दिल्ली में एकजुट हो जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी देश सेवा के लिए प्रतिबद्ध है और अपने लक्ष्य को पूरा किए बिना विश्राम नहीं करेगी।

क्यों खास है वाजपेयी का 13 दिन का कार्यकाल?

हालांकि यह सरकार केवल 13 दिन चली, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा था। यह पहली बार था जब बीजेपी केंद्र की सत्ता तक पहुंची और राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरी। आने वाले वर्षों में यही राजनीतिक आधार 1998 और फिर 1999 में वाजपेयी के नेतृत्व में स्थिर सरकार बनने का कारण बना।

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