देहरादून: पतंजलि योगपीठ के महामंत्री और योग गुरु बाबा रामदेव के करीबी सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट से जुड़े करीब 15 साल पुराने मामले में बड़ी राहत मिली है। देहरादून की विशेष CBI/तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने सोमवार को मामले में फैसला सुनाते हुए आचार्य बालकृष्ण को बरी कर दिया। अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से पेश साक्ष्यों को आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। इस मामले में उनके साथ सह-आरोपी प्रोफेसर नरेश द्विवेदी को भी राहत मिली है।
यह मामला वर्ष 2011 में सामने आया था और उस समय से ही आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ जांच और कानूनी प्रक्रिया चल रही थी। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने आरोप लगाया था कि भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। एजेंसी के मुताबिक, पासपोर्ट बनवाने के लिए बरेली स्थित पासपोर्ट कार्यालय में खुर्जा के एक संस्कृत महाविद्यालय से जुड़े शैक्षणिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए गए थे। इसी आधार पर CBI ने आपराधिक धाराओं और पासपोर्ट अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था।
मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई थी। इसके बाद CBI ने जांच शुरू की और वर्ष 2011 में FIR दर्ज की। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B, 420, 468 और 471 तथा पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत कार्रवाई की गई थी। बाद में अदालत में आरोप तय हुए और लंबे समय तक इस मामले की सुनवाई चलती रही।
CBI का आरोप था कि आचार्य बालकृष्ण ने पासपोर्ट हासिल करने के लिए जिन शैक्षणिक प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल किया, वे कथित तौर पर सही नहीं थे। जांच एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया था कि खुर्जा स्थित संस्कृत महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर नरेश द्विवेदी की भूमिका इन दस्तावेजों को उपलब्ध कराने में थी। इसी वजह से उन्हें भी मामले में सह-आरोपी बनाया गया।
मामले में बचाव पक्ष लगातार इन आरोपों का विरोध करता रहा। बचाव पक्ष की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। करीब डेढ़ दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने अभियोजन की ओर से पेश सामग्री का मूल्यांकन किया और अंततः आरोप साबित नहीं होने पर उन्हें बरी कर दिया।
इस फैसले के बाद आचार्य बालकृष्ण को लंबे समय से चल रहे इस मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। मामले की वजह से पिछले कई वर्षों से उनके नाम के साथ फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट का आरोप जुड़ा हुआ था। अब अदालत के बरी किए जाने के फैसले के बाद इस मामले में उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे की स्थिति बदल गई है।
इस मामले की कानूनी प्रक्रिया भी काफी लंबी रही। 2011 में FIR दर्ज होने के बाद CBI ने जांच पूरी कर वर्ष 2012 में चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद अदालत में सुनवाई आगे बढ़ी और 2013 में आरोप तय किए गए। बाद में आरोपों में भी बदलाव हुआ और न्यायिक प्रक्रिया अलग-अलग चरणों से गुजरती रही। उत्तराखंड हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में इस मामले से जुड़ी पिछली कार्यवाहियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2011 में FIR दर्ज होने के बाद आचार्य बालकृष्ण ने अदालत का रुख किया था। हाई कोर्ट ने जांच के दौरान उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दिया था और उनका पासपोर्ट जमा कराने का निर्देश दिया था। बाद में CBI ने चार्जशीट दाखिल की और उन्हें अदालत में पेश होना पड़ा। वर्ष 2012 में उन्हें जमानत भी मिली थी।
इसके बाद वर्ष 2013 में CBI अदालत ने आरोप तय किए। शुरुआत में कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। बाद में सत्र अदालत में हुई कार्रवाई के बाद आरोपों में बदलाव किया गया और पासपोर्ट अधिनियम तथा IPC की धारा 471 से जुड़े आरोपों के तहत मुकदमा आगे बढ़ा। यह पूरा मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा।
मामले की लंबी अवधि को देखते हुए सोमवार का फैसला आचार्य बालकृष्ण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लगभग डेढ़ दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया में कई बार अदालत में सुनवाई हुई। गवाहों के बयान, दस्तावेज और अभियोजन की ओर से पेश साक्ष्यों पर अदालत में बहस हुई। अंततः अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उन्हें आरोपों से बरी कर दिया।
आचार्य बालकृष्ण पतंजलि योगपीठ से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और बाबा रामदेव के प्रमुख सहयोगियों में उनकी गिनती होती है। पतंजलि समूह की गतिविधियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में उनके खिलाफ चल रहा यह मामला लंबे समय से सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय भी रहा था। अब अदालत के फैसले के बाद उनके समर्थकों और पतंजलि से जुड़े लोगों के बीच राहत का माहौल है।
इस मामले में अदालत के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। आपराधिक मामलों में केवल आरोप या जांच एजेंसी का दावा पर्याप्त नहीं होता, बल्कि अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोप साबित करना जरूरी होता है। अदालत ने इसी कानूनी कसौटी पर मामले का मूल्यांकन करते हुए आचार्य बालकृष्ण को बरी किया है।
फर्जी पासपोर्ट मामले की जांच के दौरान उनकी नागरिकता, शैक्षणिक दस्तावेज और पासपोर्ट हासिल करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए थे। CBI ने दावा किया था कि पासपोर्ट के लिए इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों में गड़बड़ी थी। हालांकि अदालत में अभियोजन की ओर से पेश साक्ष्य आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माने गए। यही वजह है कि लंबे समय बाद मामले में आचार्य बालकृष्ण को राहत मिली।
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि मुकदमे की प्रक्रिया कई कानूनी चरणों से गुजरी। आरोप तय होने के बाद बचाव पक्ष ने अलग-अलग न्यायिक मंचों पर अपनी दलीलें रखीं। पासपोर्ट को लेकर भी हाई कोर्ट में अलग-अलग आवेदन दाखिल हुए थे। वर्ष 2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पासपोर्ट लौटाने का आदेश दिया था, हालांकि यह आदेश मामले की अंतिम दोषसिद्धि या बरी होने से अलग प्रक्रिया का हिस्सा था।
अब देहरादून की विशेष अदालत के फैसले के बाद करीब 15 साल पुराने इस मामले का ट्रायल स्तर पर महत्वपूर्ण अध्याय पूरा हो गया है। हालांकि किसी भी फैसले के बाद आगे की कानूनी संभावनाएं संबंधित पक्षों के अधिकारों और कानून पर निर्भर करती हैं। फिलहाल अदालत के निर्णय के अनुसार आचार्य बालकृष्ण को मामले में दोषमुक्त कर दिया गया है।
इस फैसले से आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ चल रहे फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट मामले में उन्हें बड़ी राहत मिली है। लंबे समय से चले आ रहे मुकदमे के कारण उनके नाम से जुड़ा यह मामला लगातार चर्चा में रहा। अदालत के फैसले के बाद अब इस मामले में आरोपों की जगह न्यायिक रूप से बरी किए जाने का तथ्य सामने आया है।
देहरादून की अदालत में फैसला सुनाए जाने के दौरान आचार्य बालकृष्ण के मौजूद रहने की भी जानकारी सामने आई है। फैसले के बाद पतंजलि से जुड़े लोगों ने न्यायपालिका के प्रति आभार जताया। करीब डेढ़ दशक पुराने मामले में अदालत के निर्णय को उनके लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
फिलहाल आचार्य बालकृष्ण फर्जी पासपोर्ट और कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र से जुड़े मामले में बरी हो चुके हैं। CBI की ओर से लगाए गए आरोप अदालत में पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में साबित नहीं हो सके। इस तरह 2011 में शुरू हुआ यह चर्चित मामला सोमवार को देहरादून की अदालत के फैसले के साथ एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया है। करीब 15 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद आचार्य बालकृष्ण को अदालत से बड़ी राहत मिली है।








