सरकारी व्यवस्था का इंतजार छोड़ ग्रामीणों ने उठाया फावड़ा, आगरा का बुढ़ाना गांव बना मिसाल

बुढ़ाना गांव में सफाई व्यवस्था से परेशान ग्रामीणों ने खुद फावड़ा उठाया। विकास समिति ने नालियों की सिल्ट निकाली और अब पौधारोपण, जल संरक्षण व शिक्षा पर काम करेगी
सरकारी व्यवस्था का इंतजार छोड़ ग्रामीणों ने उठाया फावड़ा, आगरा का बुढ़ाना गांव बना मिसाल
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उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के फतेहाबाद क्षेत्र में स्थित बुढ़ाना गांव इन दिनों अपनी एक अलग पहल को लेकर चर्चा में है। गांव की सफाई व्यवस्था को लेकर लंबे समय से इंतजार कर रहे ग्रामीणों ने आखिरकार किसी और का इंतजार करने के बजाय खुद ही मोर्चा संभाल लिया। नालियों में जमा सिल्ट, मिट्टी और रास्तों के आसपास पसरी गंदगी को हटाने के लिए गांव के युवाओं ने फावड़ा उठाया और सफाई अभियान शुरू कर दिया। ग्रामीणों की इस पहल ने यह संदेश दिया कि किसी गांव की समस्या केवल सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि स्थानीय लोग भी सामूहिक प्रयास से अपने आसपास के माहौल में बदलाव ला सकते हैं।

फतेहाबाद के बुढ़ाना गांव में नालियों की सफाई को लेकर ग्रामीणों की शिकायतें लंबे समय से बनी हुई थीं। गांव की आबादी काफी बड़ी है और यहां करीब 35 हजार लोग रहते हैं। लगभग साढ़े सात हजार मतदाताओं वाले इस गांव में सफाई व्यवस्था का सुचारू रहना बेहद जरूरी है। नालियों में सिल्ट और मिट्टी जमा होने से पानी की निकासी प्रभावित होती है और रास्तों के आसपास गंदगी जमा रहने से ग्रामीणों को परेशानी होती है। ऐसे में बुढ़ाना विकास समिति से जुड़े युवाओं ने तय किया कि समस्या के समाधान के लिए केवल सरकारी व्यवस्था का इंतजार करना उचित नहीं होगा और उन्हें खुद आगे आना चाहिए।

ग्रामीणों के मुताबिक गांव की सफाई व्यवस्था सुधारने के लिए कई बार ग्राम पंचायत स्तर पर भी बात रखी गई थी। समिति के सदस्यों ने ग्राम पंचायत सचिव और प्रधान से सफाई कराने का आग्रह किया था। पंचायत में सफाई कर्मचारी की तैनाती होने के बावजूद ग्रामीणों को अपेक्षित स्तर पर सफाई नहीं मिल पा रही थी। इसके बाद ग्रामीणों के सामने यह सवाल था कि आखिर गांव की गलियों और नालियों की स्थिति कब सुधरेगी। इसी इंतजार के बीच बुढ़ाना विकास समिति के सदस्यों ने स्वयं सफाई करने का निर्णय लिया।

समिति से जुड़े ओमेंद्र यादव और रामशंकर यादव के अनुसार, गांव की समस्या को लेकर पंचायत स्तर पर बातचीत की गई थी, लेकिन जब सफाई व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ तो समिति ने खुद अभियान शुरू करने का फैसला लिया। ग्रामीणों ने पंचायत के अंदर चल रही कथित खींचतान या मतभेद को मुद्दा बनाने के बजाय गांव की सफाई को प्राथमिकता दी। उनका कहना था कि गांव की गंदगी को लेकर किसी विवाद में पड़ने के बजाय बेहतर यही है कि ग्रामीण मिलकर समस्या को दूर करें।

इसके बाद समिति के सदस्यों ने नालियों की सफाई शुरू की। ग्रामीणों ने नालियों में जमा सिल्ट और मिट्टी को फावड़े की मदद से बाहर निकाला। इस काम में युवाओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। आमतौर पर जिन कामों के लिए ग्रामीण सरकारी कर्मचारियों का इंतजार करते हैं, उन्हीं कामों को समिति से जुड़े लोगों ने अपने हाथों से करना शुरू कर दिया। सफाई अभियान के दौरान नालियों से काफी मात्रा में जमा गंदगी निकाली गई।

ग्रामीणों की पहल केवल गंदगी निकालने तक सीमित नहीं रहने वाली है। समिति ने यह भी तय किया है कि नालियों से निकाली गई सिल्ट को रास्ते के किनारे यूं ही नहीं छोड़ा जाएगा। सिल्ट और मिट्टी को पहले सूखने दिया जाएगा और उसके बाद उसे हटाने की जिम्मेदारी भी समिति के सदस्य उठाएंगे। इससे सफाई के बाद निकली गंदगी दोबारा रास्तों या नालियों के आसपास जमा होने की समस्या को कम किया जा सकेगा।

बुढ़ाना विकास समिति की खास बात यह है कि यह कोई अचानक बनी संस्था नहीं है। इसकी नींव करीब दो दशक पहले रखी गई थी। समिति में लगभग 100 स्थायी सदस्य जुड़े हुए हैं, जबकि जरूरत के अनुसार अन्य लोग भी सामाजिक गतिविधियों में सहयोग करते हैं। समिति से भूतपूर्व सैनिकों, शिक्षकों और अलग-अलग सरकारी तथा अन्य सेवाओं से जुड़े लोग भी जुड़े रहे हैं। समय के साथ समिति के कई सदस्य अपने रोजगार और नौकरी के कारण अलग-अलग जगह चले गए, लेकिन सामाजिक कार्यों से उनका जुड़ाव बना रहा।

समिति के सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार छोटी-छोटी राशि भी एकत्र करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सदस्य करीब 20 से 50 रुपये तक का चंदा देते हैं। इसी सामूहिक सहयोग से सामाजिक गतिविधियों में शामिल लोगों के लिए जरूरी व्यवस्थाएं की जाती हैं। इस तरह समिति किसी बड़े आर्थिक संसाधन के बजाय ग्रामीणों की भागीदारी और सामूहिक श्रम के आधार पर अपने काम आगे बढ़ाती रही है।

बुढ़ाना विकास समिति ने पहले भी सामाजिक मुद्दों से जुड़े काम किए हैं। आसपास के क्षेत्रों में भी समिति की गतिविधियां रही हैं। कुंआखेड़ा में शहीद कैप्टन शुभम गुप्ता के नाम से निश्शुल्क कोचिंग सेंटर शुरू करने की पहल भी समिति से जुड़ी रही है। इसके अलावा गांव में शराबबंदी को लेकर जागरूकता अभियान चलाने की जानकारी भी सामने आई है। इससे पता चलता है कि समिति की गतिविधियां केवल सफाई तक सीमित नहीं रही हैं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और शिक्षा जैसे मुद्दों को भी इसमें शामिल किया गया है।

अब समिति ने गांव के लिए चार प्रमुख क्षेत्रों को अपने आगामी कार्यों में शामिल करने का फैसला किया है। इनमें सफाई, पौधारोपण, जल संरक्षण और शिक्षा शामिल हैं। सफाई अभियान के जरिए गांव के रास्तों और नालियों को बेहतर रखने की कोशिश की जाएगी। पौधारोपण के जरिए गांव में हरियाली बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। जल संरक्षण के तहत पानी को बचाने और उसके महत्व को लेकर ग्रामीणों के बीच जागरूकता बढ़ाने की योजना है। शिक्षा के क्षेत्र में जरूरतमंद बच्चों को सहयोग देने की दिशा में भी समिति काम करने की तैयारी कर रही है।

ग्रामीणों का यह अभियान ऐसे समय में सामने आया है जब गांवों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकारी तंत्र और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय की जरूरत लगातार महसूस की जाती है। सफाई जैसी रोजमर्रा की व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी होने से कई समस्याओं को तेजी से दूर किया जा सकता है। हालांकि सामुदायिक पहल सरकारी जिम्मेदारियों का विकल्प नहीं है, लेकिन इससे स्थानीय स्तर पर समस्या के समाधान में सहयोग जरूर मिल सकता है।

बुढ़ाना के ग्रामीणों ने जिस तरीके से सफाई अभियान शुरू किया, उसमें सामूहिक श्रम की भावना दिखाई देती है। किसी एक व्यक्ति के घर या निजी जमीन की सफाई के बजाय सार्वजनिक रास्तों और नालियों की सफाई के लिए लोग एक साथ आगे आए। इससे ग्रामीणों के बीच यह संदेश भी गया कि गांव की सार्वजनिक समस्याओं को लेकर सभी लोगों की जिम्मेदारी बनती है।

बड़ी आबादी वाले गांव में नालियों की नियमित सफाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नालियों में सिल्ट जमा होने पर बारिश के दौरान पानी की निकासी प्रभावित हो सकती है। रास्तों पर पानी जमा होने से लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है और गंदगी फैलने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में समय-समय पर नालियों की सफाई और निकली हुई गंदगी को वहां से हटाना जरूरी होता है। बुढ़ाना में ग्रामीणों ने इसी जरूरत को देखते हुए अपने स्तर पर काम शुरू किया है।

इस अभियान में युवाओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर युवा रोजगार, पढ़ाई या दूसरे कामों के लिए गांव से बाहर चले जाते हैं, लेकिन बुढ़ाना में विकास समिति के माध्यम से युवाओं और अन्य सामाजिक रूप से सक्रिय लोगों को गांव की समस्याओं से जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है। सफाई के लिए खुद फावड़ा उठाना इस बात का प्रतीक है कि समस्या पर केवल चर्चा करने के बजाय उसे दूर करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से काम भी किया जा सकता है।

ग्रामीणों के मुताबिक, उनका उद्देश्य किसी सरकारी विभाग या पंचायत से टकराव पैदा करना नहीं है। समिति ने गांव की समस्या को प्राथमिकता देते हुए सफाई का काम अपने स्तर पर शुरू किया है। स्थानीय स्तर पर प्रशासन और पंचायत व्यवस्था की अपनी जिम्मेदारियां हैं, लेकिन ग्रामीणों की भागीदारी से व्यवस्था को सहयोग मिल सकता है। समिति आगे भी इसी तरह सामूहिक सहयोग के माध्यम से गांव की समस्याओं को हल करने की कोशिश करना चाहती है।

बुढ़ाना विकास समिति की करीब 20 वर्ष की यात्रा भी इस पहल को खास बनाती है। किसी सामाजिक संस्था की गतिविधियां लंबे समय तक तभी चल सकती हैं जब लोगों में उसके प्रति विश्वास और भागीदारी बनी रहे। यहां सदस्यों द्वारा छोटी-छोटी राशि का सहयोग और जरूरत के समय सामूहिक श्रम देना इस मॉडल की खासियत है। समिति ने बड़े संसाधनों के बजाय स्थानीय लोगों के सहयोग को आधार बनाया है।

अब ग्रामीणों की नजर इस बात पर है कि सफाई अभियान को नियमित रूप कैसे दिया जाए। एक बार नाली साफ करने से समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं होती। नालियों में दोबारा सिल्ट जमा हो सकती है, इसलिए नियमित सफाई जरूरी होगी। इसके साथ ही कूड़ा खुले में न फेंकने और सार्वजनिक स्थानों को साफ रखने के लिए लोगों को जागरूक करना भी महत्वपूर्ण होगा। समिति ने जिस तरह सफाई के साथ पौधारोपण, जल संरक्षण और शिक्षा को जोड़ने की योजना बनाई है, उससे अभियान को लंबे समय तक जारी रखने का प्रयास दिखाई देता है।

गांव के विकास में शिक्षा को शामिल करने का फैसला भी महत्वपूर्ण है। जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा में सहयोग मिलने से उन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। समिति पहले ही निश्शुल्क कोचिंग सेंटर जैसी पहल से जुड़ी रही है। ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने से ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता उपलब्ध हो सकती है।

इसी तरह जल संरक्षण पर ध्यान देना भी ग्रामीण क्षेत्र के लिए उपयोगी हो सकता है। पानी की उपलब्धता और उसके सही इस्तेमाल से जुड़ी समस्याएं आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती हैं। यदि गांव के लोग वर्षा जल, पानी की बर्बादी रोकने और जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर जागरूक होते हैं तो इसका फायदा लंबे समय तक मिल सकता है। समिति ने अपने अगले चरण में इस विषय को शामिल करके गांव के विकास को केवल सफाई तक सीमित नहीं रखा है।

पौधारोपण के जरिए गांव के सार्वजनिक स्थानों को हराभरा बनाने की योजना भी समिति के एजेंडे में है। पेड़-पौधे गांव के वातावरण को बेहतर बनाने के साथ गर्मी और धूल जैसी समस्याओं को कम करने में भी मदद कर सकते हैं। हालांकि पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल और संरक्षण भी जरूरी होगा। समिति यदि लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल की व्यवस्था करती है तो इस अभियान का असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।

बुढ़ाना गांव की यह कहानी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यहां ग्रामीणों ने समस्या के सामने केवल शिकायत करने के बजाय खुद काम शुरू किया। सफाई व्यवस्था में कमी महसूस होने के बाद युवाओं का फावड़ा लेकर नालियों में उतरना सामुदायिक भागीदारी का उदाहरण बन गया। यह पहल दूसरे गांवों के लिए भी एक मॉडल हो सकती है कि स्थानीय स्तर पर लोग मिलकर छोटे-छोटे कामों को आगे बढ़ा सकते हैं।

हालांकि ग्रामीणों की यह पहल यह भी स्पष्ट करती है कि स्थानीय समुदाय की भागीदारी और सरकारी व्यवस्था दोनों एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। सफाई कर्मचारियों, पंचायत और स्थानीय प्रशासन की नियमित जिम्मेदारियां अपनी जगह हैं, जबकि ग्रामीणों की भागीदारी से जागरूकता और निगरानी मजबूत हो सकती है। बुढ़ाना में फिलहाल ग्रामीणों ने जिस तरह सफाई का बीड़ा उठाया है, उससे गांव की तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हुई है।

आगरा के फतेहाबाद क्षेत्र का बुढ़ाना गांव अब केवल अपनी आबादी या पंचायत के कारण नहीं, बल्कि ग्रामीणों की इस सामूहिक पहल के कारण भी चर्चा में है। नालियों की सिल्ट निकालने से शुरू हुआ यह अभियान आगे पौधारोपण, जल संरक्षण और शिक्षा तक पहुंचाने की योजना है। करीब दो दशक पहले बनाई गई विकास समिति अब फिर से ग्रामीणों को एकजुट कर गांव की बुनियादी समस्याओं पर काम करने की कोशिश कर रही है। सरकारी व्यवस्था से अपेक्षित सफाई का इंतजार करने के बजाय ग्रामीणों का खुद आगे आना यह दिखाता है कि सामूहिक इच्छा और श्रम से स्थानीय स्तर पर बदलाव की शुरुआत की जा सकती है।

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